law-order
जकात वसूली में ₹35,818 के गबन का आरोप, 19 साल बाद कोर्ट ने तीनों आरोपियों को किया बरी
कल्याण में जकात वसूली के दौरान ₹35,818 के कथित गबन के 19 साल पुराने मामले में अदालत ने तीन आरोपियों को बरी कर दिया। मुख्य शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों के कोर्ट में पेश नहीं होने के कारण अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।

कल्याण:
जकात वसूली के दौरान कथित तौर पर कंपनी के साथ ₹35,818 की धोखाधड़ी और गबन के करीब 19 साल पुराने मामले में कल्याण की अदालत ने तीन आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं रहा। मामले में शिकायतकर्ता समेत प्रमुख गवाहों को बार-बार समन जारी किए जाने के बावजूद वे अदालत में उपस्थित नहीं हुए। न्यायदंडाधिकारी प्रथम श्रेणी, न्यायालय क्रमांक 3, कल्याण के पीठासीन अधिकारी निलेश प्रभाकर वासाडे ने 16 सितंबर 2026 को यह फैसला सुनाया। आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 406 और 408 के साथ धारा 34 के तहत मामला चलाया गया था।
क्या था पूरा मामला?
अभियोजन के अनुसार, मामला 27 मार्च 2006 से 8 सितंबर 2006 के बीच का है। कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका के जकात नाका क्रमांक 16, नांदीवली गांव, डोंबिवली पूर्व में मेसर्स कोनार्क इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड को जकात वसूली का ठेका मिला था। आरोप था कि प्रवीण प्रकाश चव्हाण, विकास कृष्णाजी पष्टे और संतोष संपत जाधव वहां जकात वसूली का काम करते थे। तीनों पर आपस में मिलीभगत कर जकात की मूल रसीद पर कम राशि दर्शाने और कार्बन कॉपी पर अधिक राशि लिखकर वह रकम वसूलने का आरोप लगाया गया था। अभियोजन का दावा था कि इस तरीके से कंपनी को कुल ₹35,818 का नुकसान पहुंचाया गया और रकम का कथित तौर पर गबन किया गया। शिकायत के बाद मानपाड़ा पुलिस थाने में अपराध क्रमांक I-229/2006 दर्ज किया गया और जांच के बाद तीनों आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई।
2013 में तय हुए थे आरोप
मामले में चार्जशीट 22 नवंबर 2006 को दाखिल हुई थी, जबकि आरोप 30 अक्टूबर 2013 को तय किए गए। इसके बाद 31 दिसंबर 2013 से अभियोजन का साक्ष्य शुरू हुआ। करीब 19 साल बाद 16 सितंबर 2026 को अदालत ने मामले में फैसला सुनाया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने आरोप साबित करने के लिए शिकायतकर्ता, स्वतंत्र गवाह, पंच गवाह और जांच अधिकारी को अदालत में पेश करने की कोशिश की, लेकिन वे उपस्थित नहीं हुए। अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, इन गवाहों को कई बार समन जारी किए गए। बाद में समन की तामील करने वाले पुलिस कर्मचारी को अदालत में गवाह के रूप में पेश किया गया।
गवाह नहीं आए तो कमजोर हुआ अभियोजन का मामला
समन तामील कराने वाले पुलिस कर्मचारी ने अदालत को बताया कि वह संबंधित गवाहों को दिए गए पते पर लेकर/समन देने के लिए गया था, लेकिन वे वहां नहीं मिले। इसके संबंध में रिपोर्ट भी अदालत के रिकॉर्ड पर पेश की गई। अदालत ने माना कि शिकायतकर्ता और अन्य महत्वपूर्ण गवाहों की गवाही के अभाव में आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं आई। अभियोजन यह स्थापित नहीं कर सका कि तीनों आरोपियों ने मिलकर कंपनी की रकम का आपराधिक न्यासभंग या गबन किया था।
संदेह का लाभ, तीनों आरोपी बरी
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए हैं। ऐसे में तीनों आरोपी बरी किए जाने के हकदार हैं। कोर्ट ने तीनों आरोपियों प्रवीण प्रकाश चव्हाण, विकास कृष्णाजी पष्टे और संतोष संपत जाधव को IPC की धारा 406 और 408 के साथ धारा 34 के तहत लगाए गए आरोपों से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 248(1) के तहत निर्दोष मुक्त कर दिया। अदालत ने आरोपियों और उनके जमानतदारों के बंधपत्र रद्द करने का आदेश भी दिया। जब्त मुद्देमाल को अपील की अवधि समाप्त होने के बाद नियमों के अनुसार नष्ट करने का निर्देश दिया गया। न्यायालय ने फैसले की एक प्रति शिकायतकर्ता को उपलब्ध कराने के लिए ठाणे जिलाधिकारी को भेजने का भी आदेश दिया।
