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POCSO में दोष की धारणा अंतिम नहीं, सबूत कमजोर हों तो आरोपी को मिल सकता है लाभ

POCSO Act के तहत दोष की वैधानिक धारणा को सुप्रीम कोर्ट ने पूर्ण और अटल नहीं माना है। 17 सितंबर 2026 को जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने एक अहम मामले में आरोपी को बरी करते हुए कहा कि अभियोजन की कहानी में गंभीर विरोधाभास हों और मेडिकल व फोरेंसिक सबूत आरोपों का समर्थन न करें, तो केवल POCSO की धारा 29 और 30 के तहत बनी presumption के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। कोर्ट ने इसी आधार पर दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला पलट दिया।

Sonali18 सित. 2026, 05:27 PM IST
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POCSO में दोष की धारणा अंतिम नहीं, सबूत कमजोर हों तो आरोपी को मिल सकता है लाभ

नई दिल्ली: 

सुप्रीम कोर्ट ने POCSO Act के तहत दोष की वैधानिक धारणा को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि धारा 29 और 30 के तहत बनी presumption of guilt यानी दोष की धारणा पूर्ण और अंतिम नहीं है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन को पहले उन बुनियादी तथ्यों को विश्वसनीय साक्ष्यों से स्थापित करना होगा, जिनके आधार पर यह धारणा लागू होती है। यदि अभियोजन की कहानी में गंभीर विरोधाभास और मेडिकल व फोरेंसिक साक्ष्यों का समर्थन नहीं मिलता है, तो आरोपी इस धारणा को rebut कर सकता है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने 17 सितंबर 2026 को ‘Deepak (In JC) v. State Govt. of NCT Delhi’ मामले में यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को दोषी ठहराए जाने और सजा दिए जाने को बरकरार रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन द्वारा आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं किए जाने पर आरोपी को बरी कर दिया।


मामले में आरोप था कि शिकायतकर्ता की करीब ढाई साल की बच्ची खेलते समय लापता हो गई थी और बाद में उसे आरोपी के साथ पास के एक पार्क में पाया गया। घर लौटने पर उसके कपड़ों पर खून दिखाई देने का दावा किया गया और आरोप था कि बच्ची ने आरोपी का नाम बताया। मामले में IPC की धारा 363 और POCSO Act के तहत कार्रवाई की गई थी। ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को POCSO की धारा 6 के तहत 10 साल की कठोर कैद और जुर्माने तथा IPC की धारा 363 के तहत एक साल की कठोर कैद की सजा सुनाई थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी दोषसिद्धि को बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्यों की जांच करते हुए शिकायतकर्ता और शुरुआती तौर पर बच्ची की जांच करने वाले निजी डॉक्टर के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास पाए। बच्ची को डॉक्टर के पास कब लाया गया और उसके साथ कौन मौजूद था, इन महत्वपूर्ण तथ्यों को लेकर दोनों के बयानों में अंतर था। कोर्ट ने कहा कि इन विरोधाभासों को मामूली या महत्वहीन मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने मेडिकल और फोरेंसिक साक्ष्यों को भी अभियोजन की कहानी के अनुरूप नहीं पाया। AIIMS में बच्ची की जांच करने वाले डॉक्टर को कोई चोट या वल्वा क्षेत्र में खून के निशान नहीं मिले थे। मेडिकल रिकॉर्ड में हाइमन भी सामान्य और बिना किसी असामान्यता के पाया गया। इसके अलावा FSL जांच में भेजे गए सातों पैकेटों में वीर्य या किसी पुरुष का DNA नहीं मिला और बच्ची के कपड़ों पर भी खून की पुष्टि नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल चोट या वीर्य की अनुपस्थिति को हर मामले में यौन हमले से इनकार करने का आधार नहीं माना जा सकता। लेकिन इस मामले में मेडिकल रिपोर्ट और FSL रिपोर्ट को अन्य साक्ष्यों के साथ पढ़ने पर कोर्ट ने पाया कि अभियोजन की ओर से बताई गई penetrative sexual assault की कहानी को समर्थन नहीं मिलता।

POCSO की धारा 29 और 30 पर क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने POCSO Act की धारा 29 और 30 की विस्तार से व्याख्या की। कोर्ट के अनुसार धारा 29 के तहत दोष की धारणा तभी प्रभावी होती है जब अभियोजन पहले उन foundational facts को स्थापित करे, जिनके आधार पर यह वैधानिक धारणा लागू हो सकती है। वहीं धारा 30 आरोपी की culpable mental state को लेकर धारणा बनाती है, जिसे आरोपी rebut कर सकता है। पीठ ने कहा कि POCSO में presumption का प्रावधान होने का मतलब यह नहीं है कि अदालत अभियोजन की हर कहानी को बिना जांचे स्वीकार कर ले। अभियोजन पर अपराध को संदेह से परे साबित करने का मूल दायित्व बना रहता है। आरोपी को presumption rebut करने के लिए ‘preponderance of probability’ के स्तर पर अपना बचाव स्थापित करना होता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि अभियोजन के साक्ष्यों में विरोधाभास हों, मेडिकल और फोरेंसिक सबूत कहानी का समर्थन न करते हों और आरोपी उन कमियों को प्रभावी ढंग से सामने रख देता है, तो दोष की वैधानिक धारणा प्रभावी नहीं रह सकती। इन परिस्थितियों में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अभियोजन आरोपी के खिलाफ मामला संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। इसके बाद कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द करते हुए आरोपी को बरी कर दिया।