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“क्या महिलाएं LPG सिलेंडर नहीं उठा सकतीं?” जेंडर के आधार पर नौकरी से वंचित महिला को सुप्रीम कोर्ट से ₹12 लाख मुआवजा
जेंडर के आधार पर नौकरी से वंचित की गई एक महिला के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन को कड़ी फटकार लगाई है। महिला LPG बॉटलिंग प्लांट में रिफिलिंग हेल्पर के पद के लिए योग्य थी, लेकिन उसे नियुक्ति नहीं दी गई। कंपनी की ओर से काम में LPG सिलेंडर उठाने और नाइट शिफ्ट का हवाला दिया गया। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया, “क्या आपको लगता है महिलाएं LPG सिलेंडर नहीं उठा सकतीं?” कोर्ट ने महिला को ₹12 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया।

नई दिल्ली:
क्या सिर्फ इसलिए किसी महिला को नौकरी से वंचित किया जा सकता है कि काम में LPG सिलेंडर उठाना और नाइट शिफ्ट करना शामिल है? सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (IOCL) को कड़ी फटकार लगाते हुए महिला को ₹12 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि किसी महिला को केवल उसके जेंडर के आधार पर रोजगार का अवसर न देना उसकी गरिमा के खिलाफ है। मामला हरियाणा के गुड़ा गांव की रहने वाली सुमित्रा से जुड़ा है। वह IOCL के LPG बॉटलिंग प्लांट में कैजुअल खलासी/प्यून/रिफिलिंग हेल्पर के पद के लिए इंटरव्यू में शामिल हुई थीं। स्थानीय समिति ने कुल 49 लोगों के नाम रोजगार के लिए सुझाए थे, जिनमें सुमित्रा भी शामिल थीं। इनमें से 43 उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र जारी कर दिए गए, लेकिन सुमित्रा को नियुक्ति नहीं दी गई।
‘महिला सिलेंडर कैसे उठाएगी’ तर्क पर कोर्ट की आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट में IOCL की ओर से दलील दी गई कि यह काम शारीरिक मेहनत वाला है, जिसमें LPG सिलेंडर उठाने के साथ नाइट शिफ्ट भी करनी पड़ती है। इसी आधार पर महिला की उपयुक्तता पर सवाल उठाया गया था। इस पर पीठ ने सवाल किया कि क्या सिर्फ महिला होने के कारण उसे नियुक्ति से वंचित किया जा सकता है। जस्टिस अरविंद कुमार ने कहा कि महिलाएं अपने घरों में रोज LPG सिलेंडर उठाती हैं और जब घर में पुरुष मौजूद नहीं होते तो वही गैस सिलेंडर बदलती हैं। कोर्ट ने इस तरह के आधार पर महिला को नौकरी से दूर रखने को उसकी गरिमा के खिलाफ बताया।
ट्रायल कोर्ट ने महिला के पक्ष में दिया था फैसला
निचली अदालत ने पाया था कि महिला निर्धारित योग्यता पूरी करती थीं और एक बचाव पक्ष के गवाह की गवाही से यह बात सामने आई थी कि उन्हें महिला होने के कारण नियुक्ति नहीं दी गई। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें कैजुअल कर्मचारी या प्रशासनिक पद/प्यून जैसे पद पर समायोजित करने का निर्देश दिया था। हालांकि, प्रथम अपीलीय अदालत ने इस फैसले को पलट दिया। अदालत ने माना कि महिला का नाम केवल सिफारिश के लिए भेजा गया था और उनका अंतिम चयन नहीं हुआ था। इसके बाद मामला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने 14 अक्टूबर 2025 को प्रथम अपीलीय अदालत के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि केवल सिफारिश से नियुक्ति का कानूनी या निहित अधिकार पैदा नहीं होता।
रिटायरमेंट की उम्र के कारण नियुक्ति के बजाय ₹12 लाख मुआवजा
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने तक महिला रिटायरमेंट की उम्र पार कर चुकी थीं। ऐसे में अब उन्हें नौकरी पर नियुक्त करना व्यावहारिक नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने इस स्थिति को देखते हुए नियुक्ति के बजाय ₹12 लाख का एकमुश्त मुआवजा देने का आदेश दिया। पीठ ने कहा कि महिला ने अपने अधिकार के लिए लंबे समय तक कानूनी लड़ाई जारी रखी। इसलिए उन्हें केवल इस आधार पर राहत से वंचित नहीं किया जा सकता कि अब उनकी नियुक्ति की उम्र निकल चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने IOCL को ₹12 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया। यह मामला ‘Sumitra v. Indian Oil Corporation Ltd.’ के नाम से सुप्रीम कोर्ट में सामने आया था और इसमें पीठ ने रोजगार में समान अवसर तथा जेंडर के आधार पर भेदभाव से जुड़े मुद्दे पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
