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ठाणे में टोइंग क्रेन को लेकर पुलिसकर्मी से विवाद, पुलिस पर हाथ उठाने और धमकी देने के आरोपों में आरोपी बरी
ठाणे में टोइंग क्रेन को लेकर पुलिसकर्मी से विवाद और धमकी देने के करीब 9 साल पुराने मामले में आरोपी शेरबहादुर सुरेश सिंह को कोर्ट से राहत मिली है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एस.एस. रेंगे ने IPC की धारा 353, 504 और 506 के तहत आरोपी को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।

ठाणे:
टोइंग क्रेन के जरिए स्कूल के बाहर खड़ी दोपहिया गाड़ियों को हटाने के दौरान पुलिसकर्मी से कथित विवाद और धमकी देने के करीब नौ साल पुराने मामले में ठाणे सेशन कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एस.एस. रेंगे ने 17 सितंबर 2026 को दिए फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 353, 504 और 506 के आवश्यक तत्वों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। मामला 29 सितंबर 2017 का है। अभियोजन के अनुसार, नंदकुमार दादासाहेब भोसले कपुर्बावड़ी ट्रैफिक शाखा में पुलिस नाइक के रूप में तैनात थे और मिनी क्रेन नंबर-2 पर ड्यूटी कर रहे थे। ट्रैफिक कंट्रोल रूम को हरिकृष्ण न्यू इंग्लिश स्कूल, नालपाड़ा के सामने कई दोपहिया वाहन खड़े होने की शिकायत मिली थी। इसके बाद ट्रैफिक कर्मचारी टोइंग क्रेन लेकर मौके पर पहुंचे। अभियोजन का आरोप था कि टोइंग की कार्रवाई शुरू होते ही शेरबहादुर सुरेश सिंह मौके पर पहुंचे और वाहनों को हटाने का विरोध किया। आरोप था कि उन्होंने पुलिसकर्मी के साथ गाली-गलौज की, क्रेन जलाने और पुलिसकर्मी के हाथ-पैर तोड़ने की धमकी दी तथा क्रेन का दरवाजा खोलकर पुलिसकर्मी को बाहर खींचने का प्रयास किया। बाद में पुलिस को बुलाया गया और आरोपी को चितलसर पुलिस स्टेशन ले जाया गया। इस मामले में शुरुआत में IPC की धारा 353, 323, 504 और 506 के तहत FIR दर्ज हुई थी। जांच के बाद धारा 323 के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं मिलने पर चार्जशीट केवल धारा 353, 504 और 506 के तहत दाखिल की गई। आरोपी ने आरोपों से इनकार करते हुए खुद को झूठा फंसाए जाने की बात कही।
कोर्ट ने अभियोजन के गवाहों की गवाही में कई महत्वपूर्ण कमियां पाईं। एक गवाह ने स्वीकार किया कि आरोपी क्रेन के दस्तावेज मांग रहा था और इसी बात को लेकर विवाद शुरू हुआ था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि क्रेन का रजिस्ट्रेशन नंबर, मालिकाना दस्तावेज, अनुबंध या पुलिस द्वारा क्रेन के इस्तेमाल का अधिकृत आधार रिकॉर्ड पर पेश नहीं किया गया। अदालत ने यह भी पाया कि घटनास्थल पर नो-पार्किंग का कोई बोर्ड नहीं था। मौके पर स्कूल के कर्मचारी, विद्यार्थी, अभिभावक और अन्य लोग मौजूद थे, लेकिन अभियोजन ने किसी स्वतंत्र गवाह की गवाही नहीं कराई। एक गवाह ने अदालत में आरोपी द्वारा पुलिसकर्मी का कॉलर पकड़कर खींचने की बात कही, लेकिन यह तथ्य उसके पुलिस बयान में दर्ज नहीं था।
धारा 504 के संबंध में कोर्ट ने कहा कि केवल कथित रूप से गाली देने से अपराध साबित नहीं होता। अभियोजन को यह भी साबित करना जरूरी था कि जानबूझकर अपमान करने के साथ ऐसी मंशा या जानकारी थी जिससे सार्वजनिक शांति भंग होने की संभावना थी। इसी तरह धारा 506 के तहत कथित धमकियों के बावजूद आरोपी की ओर से वास्तविक रूप से भय पैदा करने की आवश्यक आपराधिक मंशा संदेह से परे साबित नहीं हुई। अदालत ने माना कि मौके पर विवाद हुआ था, लेकिन विवाद होना अपने आप में धारा 353, 504 और 506 के अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अभियोजन की गवाही में मौजूद विरोधाभास, महत्वपूर्ण तथ्यों का बाद में सामने आना और स्वतंत्र corroboration का अभाव आरोपी के पक्ष में जाता है। अंततः कोर्ट ने शेरबहादुर सुरेश सिंह को तीनों धाराओं के आरोपों से बरी कर दिया। उनका जमानत बांड रद्द कर दिया गया और जमानतदार को मुक्त कर दिया गया। साथ ही CrPC की धारा 437-A के अनुपालन के लिए ₹15,000 के PR बॉन्ड और इतनी ही राशि के एक जमानतदार का बॉन्ड जमा करने का निर्देश दिया गया।
