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13 साल पुराने जमीन विवाद में अपील खारिज, भिवंडी जिला कोर्ट ने 1975 की बिक्री को वैध मानने से किया इनकार

भिवंडी जिला कोर्ट ने पालघर के वाडा में 4.24 एकड़ जमीन से जुड़े करीब 13 साल पुराने विवाद में अपीलकर्ता को राहत नहीं दी। जिला जज-2 एन.के. करांडे की अदालत ने 17 सितंबर 2026 को अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट ने पाया कि 1975 की जमीन बिक्री के लिए जरूरी अनुमति नहीं ली गई थी और अपीलकर्ता जमीन पर अपना वैध अधिकार साबित नहीं कर सका।

Sonali18 सित. 2026, 05:57 PM IST
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13 साल पुराने जमीन विवाद में अपील खारिज, भिवंडी जिला कोर्ट ने 1975 की बिक्री को वैध मानने से किया इनकार

भिवंडी जिला कोर्ट ने करीब 13 साल पुराने जमीन विवाद में अपीलकर्ता को राहत देने से इनकार करते हुए उसकी Regular Civil Appeal खारिज कर दी। जिला जज-2 एन.के. करांडे की अदालत ने 17 सितंबर 2026 को दिए फैसले में ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें जमीन से जुड़े दावे वाला सिविल सूट खारिज कर दिया गया था। अदालत ने अपीलकर्ता पर मुकदमे का खर्च भी लगाया। मामला पालघर जिले के वाडा तालुका के काटी स्थित Block No. 41 की पूर्वी तरफ की 4.24 एकड़ जमीन से जुड़ा था। अपीलकर्ता परशुराम मिथु भोईर (पाटील) ने 20 मई 2022 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। ट्रायल कोर्ट ने Regular Civil Suit No.110/2014 को लागत सहित खारिज किया था। अपीलकर्ता का दावा था कि जमीन पर उसके भाई गणपत मिथु भोईर का कब्जा था और उनके पिता जमीन पर बतौर किरायेदार खेती करते थे। उसके अनुसार मूल मालिक सदाशिव बालकृष्ण दीक्षित ने 13 मार्च 1975 को 3,000 रुपये के बदले रजिस्टर्ड बिक्री विलेख के जरिए जमीन गणपत मिथु भोईर को बेची थी। हालांकि, इस बिक्री को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराने की कोशिश के बावजूद संबंधित रिकॉर्ड में बदलाव नहीं हुआ। विवाद में एक अहम तथ्य यह सामने आया कि 1962 से नारायण हरि पाटील का नाम जमीन के राजस्व रिकॉर्ड में संरक्षित किरायेदार के रूप में दर्ज था। अदालत के सामने अपीलकर्ता ने यह भी स्वीकार किया कि उसके भाई ने उस म्यूटेशन एंट्री पर आपत्ति नहीं उठाई थी। बाद में नारायण हरि पाटील के कानूनी उत्तराधिकारियों के नाम भी राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हुए।


जिला अदालत ने पाया कि 1975 की बिक्री के संबंध में बॉम्बे टेनेंसी एंड एग्रीकल्चरल लैंड एक्ट की धारा 43 के तहत आवश्यक अनुमति नहीं ली गई थी। अदालत ने माना कि इस अनुमति के अभाव में अपीलकर्ता 13 मार्च 1975 की बिक्री विलेख के आधार पर जमीन पर वैध अधिकार साबित नहीं कर सका। वहीं, विवादित जमीन के एक हिस्से की 14 नवंबर 2014 को प्रतिवादी नंबर 8 के पक्ष में बिक्री भी हुई थी। अदालत के अनुसार संबंधित रिकॉर्ड से पता चलता है कि बिक्री से पहले जमीन पर लगी हस्तांतरण संबंधी पाबंदी हटाई गई थी। इसलिए 2014 की बिक्री विलेख को शून्य या अवैध घोषित करने का आधार भी अपीलकर्ता साबित नहीं कर सका। अदालत ने यह भी कहा कि अपीलकर्ता जमीन पर कब्जे में नहीं था और वह अपना कानूनी अधिकार साबित करने में असफल रहा। ऐसे में जमीन पर रोक या हस्तक्षेप से जुड़ी राहत देने का सवाल भी नहीं उठता।

जिला जज एन.के. करांडे ने ट्रायल कोर्ट के फैसले और साक्ष्यों की समीक्षा के बाद कहा कि निचली अदालत ने दोनों पक्षों के साक्ष्यों का उचित तरीके से मूल्यांकन किया था और उसके फैसले में हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। अदालत ने Regular Civil Appeal No.29/2023, जिसे पहले Regular Civil Appeal No.66/2022 के रूप में दर्ज किया गया था, लागत सहित खारिज कर दी। साथ ही 20 मई 2022 को सिविल जज जूनियर डिवीजन, वाडा द्वारा Regular Civil Suit No.110/2014 में पारित निर्णय और डिक्री को बरकरार रखा।