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किरायेदारी खत्म होने के बाद भी कब्जा नहीं छोड़ा, कल्याण कोर्ट ने अपील खारिज कर संपत्ति खाली करने का आदेश बरकरार रखा
खुले प्लॉट की किरायेदारी विवाद में कल्याण कोर्ट ने किरायेदारों की अपील खारिज कर निचली अदालत का कब्जा देने का आदेश बरकरार रखा। कोर्ट ने माना कि किरायेदारी खत्म करने का नोटिस वैध था।

कल्याण:
खुले प्लॉट की किरायेदारी से जुड़े विवाद में कल्याण के जिला न्यायाधीश-5 की अदालत ने मूल अदालत के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए अपील खारिज कर दी है। अदालत ने माना कि पक्षकारों के बीच मकान मालिक-किरायेदार का संबंध और किरायेदारी समाप्त करने के लिए दिए गए नोटिस से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य विवादित नहीं थे। ऐसे में निचली अदालत द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 12 नियम 6 के तहत दिए गए कब्जे के फैसले को सही माना गया। यह फैसला जिला न्यायाधीश-5, कल्याण की न्यायाधीश वी. ए. पाटरवले ने नियमित सिविल अपील नंबर 41/2025 में 17 सितंबर 2026 को सुनाया।
क्या था पूरा मामला
मामला R.C.S. No.489/2021 से जुड़ा था। मूल वाद में वादी पक्ष ने ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 108 और 111 के तहत संपत्ति का कब्जा वापस दिलाने की मांग की थी। वादी पक्ष का कहना था कि विवादित संपत्ति एक खुला प्लॉट था, जिसे प्रतिवादी पक्ष के पूर्वज को लीज पर दिया गया था। वादी के अनुसार, वर्ष 2006 से किराया नहीं दिया गया था। साथ ही आरोप था कि खुले प्लॉट पर प्रतिवादी पक्ष ने एक कमरा और शौचालय का निर्माण कर लिया तथा इसके लिए संबंधित अधिकारियों से अनुमति भी नहीं ली गई। इन परिस्थितियों को लीज की शर्तों का उल्लंघन बताते हुए कब्जा वापस लेने के लिए मुकदमा दायर किया गया था।
नोटिस देने के बाद दायर हुआ था मुकदमा
मुकदमा दायर करने से पहले प्रतिवादी पक्ष को किरायेदारी समाप्त करने का नोटिस दिया गया था। प्रतिवादियों ने नोटिस का जवाब दिया और बाद में अदालत में लिखित बयान भी दाखिल किया। अपील में प्रतिवादियों का तर्क था कि उन्होंने वादी की सभी बातों से इनकार किया था और कोई स्पष्ट स्वीकारोक्ति नहीं की थी। उनका कहना था कि मामला विवादित तथ्यों से जुड़ा था, इसलिए निचली अदालत को पूरी सुनवाई और साक्ष्य के बाद फैसला करना चाहिए था।
ट्रायल कोर्ट ने स्वीकारोक्ति के आधार पर दिया था फैसला
निचली अदालत ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 12 नियम 6 के तहत स्वीकारोक्ति के आधार पर वादी के पक्ष में कब्जे का आदेश दिया था। इसके खिलाफ प्रतिवादी पक्ष ने जिला अदालत में अपील दायर की। अपीलकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट के Pushpa बनाम Dayawati मामले का हवाला दिया गया। दलील दी गई कि जहां विवादित और विचारणीय मुद्दे मौजूद हों, वहां केवल कथित स्वीकारोक्ति के आधार पर मुकदमे का फैसला नहीं किया जा सकता।
कल्याण कोर्ट ने क्यों खारिज की अपील?
जिला न्यायाधीश ने रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद कहा कि मौजूदा मामले में स्थिति अलग है। अदालत ने पाया कि प्रतिवादी पक्ष ने अपने लिखित बयान में यह स्वीकार किया था कि विवादित जमीन खुला प्लॉट था और वह लीज पर दी गई थी। अदालत ने यह भी पाया कि ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट की धारा 106 के तहत किरायेदारी समाप्त करने का नोटिस दिया गया था और नोटिस का जवाब भी दिया गया। नोटिस की वैधता को लेकर कोई विशेष आपत्ति नहीं उठाई गई। कोर्ट ने कहा कि जब लीज की कोई निश्चित अवधि तय नहीं होती है, तो ऐसी लीज को महीने-दर-महीने की लीज माना जा सकता है और कानून के अनुसार निर्धारित अवधि का नोटिस देकर किरायेदारी समाप्त की जा सकती है।
मकान मालिक-किरायेदार संबंध और नोटिस अहम तथ्य
अदालत ने कहा कि इस मामले में दो महत्वपूर्ण तथ्य सामने थे—पहला, पक्षकारों के बीच मकान मालिक और किरायेदार का कानूनी संबंध और दूसरा, धारा 106 के तहत नोटिस देकर किरायेदारी समाप्त किया जाना। प्रतिवादी पक्ष की ओर से इन दोनों तथ्यों के संबंध में कोई स्पष्ट और ठोस बचाव सामने नहीं रखा गया। इसी आधार पर जिला अदालत ने माना कि निचली अदालत ने स्वीकारोक्ति के आधार पर कब्जे का आदेश देकर कोई कानूनी गलती नहीं की थी।
अपील खारिज, लागत भी लगाई
कल्याण जिला अदालत ने मूल अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए Regular Civil Appeal No.41/2025 को लागत के साथ खारिज कर दिया। अदालत ने संबंधित डिक्री तैयार करने और रिकॉर्ड व कार्यवाही को ट्रायल कोर्ट भेजने का भी निर्देश दिया। यह आदेश 17 सितंबर 2026 को जिला न्यायाधीश-5, कल्याण की अदालत ने पारित किया।
