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डिजिटल पहचान का गलत इस्तेमाल कर ऑनलाइन धोखाधड़ी का आरोप, IT Act और BNS की धाराओं में FIR
डिजिटल पहचान का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल कर धोखाधड़ी किए जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि कंप्यूटर या संचार उपकरण के जरिए किसी अन्य व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल कर धोखाधड़ी की गई। मामले में IT Act की धारा 66(C), 66(D) और भारतीय न्याय संहिता की धारा 3(5), 318(4) के तहत FIR दर्ज कर पुलिस ने जांच शुरू कर दी है।

भिवंडी में डिजिटल माध्यम से पहचान का कथित तौर पर गलत इस्तेमाल कर धोखाधड़ी किए जाने का मामला सामने आया है। इस मामले में पुलिस ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। FIR में IT Act की धारा 66(C), 66(D) तथा BNS की धारा 3(5) और 318(4) लगाई गई हैं। पुलिस के अनुसार, मामले में डिजिटल पहचान से जुड़ी जानकारी के कथित दुरुपयोग और कंप्यूटर या संचार उपकरण के माध्यम से किसी अन्य व्यक्ति का रूप धारण कर धोखाधड़ी किए जाने के आरोपों की जांच की जा रही है। FIR में शामिल धाराएं मुख्य रूप से ऑनलाइन पहचान के दुरुपयोग, डिजिटल माध्यम से प्रतिरूपण और धोखाधड़ी से संबंधित हैं।
क्या कहती है IT Act की धारा 66(C)?
सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66(C) किसी दूसरे व्यक्ति के इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर, पासवर्ड या अन्य विशिष्ट पहचान सुविधा का धोखाधड़ीपूर्ण या बेईमानी से इस्तेमाल करने से संबंधित है। डिजिटल युग में किसी व्यक्ति की लॉगिन जानकारी, पासवर्ड या अन्य विशिष्ट डिजिटल पहचान का गलत इस्तेमाल इस प्रावधान के दायरे में आ सकता है।
धारा 66(D) ऑनलाइन प्रतिरूपण से जुड़ी
IT Act की धारा 66(D) कंप्यूटर संसाधन या संचार उपकरण के माध्यम से किसी अन्य व्यक्ति का रूप धारण कर धोखाधड़ी करने से संबंधित है। यानी यदि किसी व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल डिजिटल माध्यम से किसी दूसरे व्यक्ति को धोखा देने के लिए किया जाता है, तो इस धारा के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
BNS की धारा 3(5) भी FIR में शामिल
मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 3(5) भी लगाई गई है। यह प्रावधान तब लागू होता है जब कई व्यक्तियों द्वारा साझा मंशा के तहत आपराधिक कृत्य किए जाने का आरोप हो। ऐसे मामलों में जांच के दौरान प्रत्येक आरोपी की भूमिका और कथित साझा मंशा को देखा जाता है।
धारा 318(4) के तहत धोखाधड़ी का आरोप
BNS की धारा 318(4) धोखाधड़ी के उस गंभीर रूप से संबंधित है, जिसमें किसी व्यक्ति को बेईमानी से संपत्ति देने या किसी मूल्यवान प्रतिभूति को बनाने, बदलने या नष्ट करने के लिए प्रेरित किया जाता है। इस मामले में पुलिस इन धाराओं के तहत दर्ज आरोपों से जुड़े सभी तथ्यों और साक्ष्यों की जांच कर रही है।
पुलिस ने शुरू की जांच
FIR दर्ज होने के बाद पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। जांच के दौरान कथित डिजिटल पहचान के इस्तेमाल, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, मोबाइल फोन, कंप्यूटर या अन्य संचार उपकरणों और संभावित वित्तीय लेन-देन से जुड़े साक्ष्यों की जांच की जा सकती है। इसके अलावा पुलिस यह भी पता लगाएगी कि कथित घटना में कौन-कौन लोग शामिल थे और प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका क्या रही।
डिजिटल धोखाधड़ी के मामलों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अहम
ऐसे मामलों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। पुलिस आमतौर पर डिजिटल रिकॉर्ड, चैट, कॉल डिटेल, ई-मेल, लॉगिन गतिविधि, बैंकिंग रिकॉर्ड और संबंधित डिवाइस से प्राप्त जानकारी की जांच कर सकती है। हालांकि, इस मामले में वास्तविक घटना और आरोपों की पुष्टि जांच के बाद उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही होगी।
FIR आरोपों का दस्तावेज है, दोष सिद्धि नहीं
पुलिस द्वारा FIR दर्ज किया जाना आरोपों की जांच की शुरुआत है। FIR में जिन धाराओं का उल्लेख किया गया है, उनके आधार पर पुलिस साक्ष्य जुटाकर मामले की आगे की कार्रवाई करेगी। आरोपित व्यक्तियों के खिलाफ अपराध सिद्ध होना अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
