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कल्याण में ₹1.64 करोड़ का म्यूल फ्रॉड: दोस्त पर ठीकरा फोड़ बचने की कोशिश में ऑटो चालक?
कल्याण के कोळसेवाडी इलाके में सामने आए करीब 1.64 करोड़ रुपये के साइबर और वित्तीय धोखाधड़ी मामले ने कानून व्यवस्था और जांच एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। पहली नजर में यह मामला एक शातिर ठग द्वारा अपने सीधे-साधे दोस्त को झांसा देकर फंसाने की पटकथा जैसा दिखता है, लेकिन शिकायतकर्ता के बयानों और विरोधाभासों ने पूरी कहानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जांच विशेषज्ञों और कानूनी जानकारों की मानें तो यह करोड़ों की ठगी में मिलीभगत कर बाद में खुद को ‘कानून के शिकंजे’ से बचाने की एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा प्रतीत हो रहा है।
Vinod Tiwari18 सित. 2026, 07:47 PM IST

क्या है पूरा मामला?
कोळसेवाडी पुलिस थाने में दर्ज एफआईआर (क्र. 0539/2026) के मुताबिक, पेशे से ऑटो रिक्शा चालक मुकेश गोपीनाथ जाधव (45) ने अपने बचपन के दोस्त शैलेश सुभाष मोरे (निवासी लोकग्राम, कल्याण पूर्व) के खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात (BNS धारा 318(4) व 316(2)) की शिकायत दर्ज कराई है। शिकायतकर्ता का दावा है कि शैलेश ने फल और सब्जी के आयात-निर्यात (इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट) व्यवसाय का बहाना बनाकर कहा कि खराब सिबिल (CIBIL) स्कोर के कारण उसे बैंक लोन और नया खाता नहीं मिल रहा है। मुकेश ने दोस्ती के नाम पर अपने निजी पहचान दस्तावेज सौंप दिए। इसके बाद दोनों ने आईडीबीआई बैंक, कैथोलिक सीरियन बैंक, सर्वोदय बैंक और सहयोग मल्टीस्टेट क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसाइटी में बाकायदा करंट अकाउंट खुलवाए। सिम कार्ड, चेकबुक और एटीएम कार्ड शैलेश के पास रहे और मार्च 2024 से जून 2026 के बीच इन खातों से 1 करोड़ 64 लाख 10 हजार 733 रुपये का भारी-भरकम लेन-देन हुआ। जब समाचार पत्रों में साइबर फ्रॉड के लिए फर्जी खातों के इस्तेमाल की खबरें आईं, तब मुकेश ने ठाणे क्राइम ब्रांच में शिकायत दी।
'बचपन का दोस्त' पर पास में एक तस्वीर तक नहीं!
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला और संदेहास्पद बात सामने आई जब हमने शिकायतकर्ता मुकेश जाधव से आरोपी शैलेश मोरे के बारे में बुनियादी जानकारी और पहचान मांगी गई। पुलिस को दिए गए शिकायत में मुकेश ने दावा किया कि शैलेश उसका बचपन का जिगरी दोस्त है, जिसके कहने पर उसने अपने नाम से चार-चार करंट अकाउंट खुलवा दिए और करोड़ों का लेन-देन होने दिया। लेकिन जब दुनियादारी 24x7 टीम द्वारा आरोपी की तस्वीर मांगी, तो शिकायतकर्ता ने हाथ खड़े करते हुए कहा कि उसके पास उस दोस्त की एक भी फोटो तक उपलब्ध नहीं है। आज के डिजिटल युग में बिना कुछ सोचे समझे और आँख मुदकर अपने बचपन के दोस्त को अपने नाम के बैंक अकाउंट और चेकबुक देने की कहानी शायद ही पुलिस के गले उतरे । इससे यह प्रबल शंका उत्पन्न हो रही है कि कहीं यह सिंडिकेट के साथ मिलीभगत कर करोड़ों की ठगी को अंजाम देने और बाद में पुलिस कार्रवाई से बचने के लिए खुद को ‘अज्ञानी व ठगा हुआ पीड़ित’ दिखाने की पूर्व-नियोजित चाल तो नहीं है।
खुद को बचाने का कानूनी पैंतरा?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम में कई ऐसे बिंदु हैं जो शिकायतकर्ता को कठघरे में खड़ा करते हैं:
* सक्रिय भूमिका: मुकेश केवल कागजात देकर नहीं हटा, बल्कि उसने खुद बैंकों में जाकर करंट अकाउंट के फॉर्म पर हस्ताक्षर किए, सिम कार्ड खरीदे और कई मौकों पर खुद बैंक जाकर मोटी नकदी (Cash) की निकासी की।
* म्यूल अकाउंट और कमीशन का खेल: देश भर में साइबर ठगी की रकम को खपाने के लिए ऐसे ही 'म्यूल खातों' का इस्तेमाल होता है। अमूमन खाताधारक को इसके एवज में मोटा कमीशन मिलता है।
* अग्रिम एफआईआर का कवर: जब साइबर अपराधों में देशभर से शिकायतें दर्ज होती हैं और बैंक खाते फ्रीज होने लगते हैं, तो सबसे पहले खाताधारक पर गिरफ्तारी की तलवार लटकती है। जानकारों का मानना है कि गिरफ्तारी से बचने और कानूनी ढाल तैयार करने के लिए पहले ही खुद को पीड़ित बताते हुए एफआईआर दर्ज करा दी गई।
पुलिस की रडार पर शिकायतकर्ता
पुलिस अधिकारी भले ही शैलेश मोरे की तलाश में जुटे हों, लेकिन जांच का दायरा केवल उसी तक सीमित नहीं है। ठाणे क्राइम ब्रांच यूनिट-3 इस बात की गहराई से छानबीन कर रही है कि नकदी निकासी और खाता संचालन के बदले मुकेश को क्या वित्तीय लाभ मिला? यदि जांच में उसकी संलिप्तता पाई जाती है, तो भारतीय न्याय संहिता के तहत आपराधिक षड्यंत्र (Criminal Conspiracy) की धाराओं में उसे भी सह-आरोपी बनाया जाना तय माना जा रहा है।
