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अनाथ या परित्यक्त नहीं है बच्चा तो CWC को कस्टडी लेने का अधिकार नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट ने दत्तक माता-पिता को सौंपी कस्टडी

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि जो बच्चा न तो अनाथ है और न ही परित्यक्त, उसके मामले में बाल कल्याण समिति (CWC) को कस्टडी लेने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने माना कि गोद लेने की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था, लेकिन इस आधार पर CWC का कस्टडी संबंधी आदेश उचित नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने CWC का आदेश रद्द करते हुए बच्चे की कस्टडी दत्तक माता-पिता को वापस सौंपने का निर्देश दिया।

Sonali20 सित. 2026, 06:03 PM IST
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अनाथ या परित्यक्त नहीं है बच्चा तो CWC को कस्टडी लेने का अधिकार नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट ने दत्तक माता-पिता को सौंपी कस्टडी

बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी बच्चे को गोद लेने की निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किए जाने मात्र से बाल कल्याण समिति (CWC) को उसकी कस्टडी लेने का अधिकार नहीं मिल जाता। कोर्ट ने कहा कि CWC का अधिकार क्षेत्र केवल उन बच्चों तक है, जो किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत “देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चे” की श्रेणी में आते हैं।

अनाथ या परित्यक्त नहीं है बच्चा तो CWC नहीं ले सकती कस्टडी, बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि जो बच्चा न तो अनाथ है और न ही परित्यक्त, उसके मामले में बाल कल्याण समिति (Child Welfare Committee-CWC) केवल इसलिए कस्टडी नहीं ले सकती कि उसे गोद लेने की निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था। कोर्ट ने CWC के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत बच्चे की कस्टडी उसके दत्तक माता-पिता से लेकर जैविक माता-पिता को सौंप दी गई थी। यह फैसला न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फाल्के और न्यायमूर्ति निवेदिता पी. मेहता की खंडपीठ ने Nilima Dilip Kannurwar v. Child Welfare Committee मामले में सुनाया। याचिका में 25 मई 2026 को चंद्रपुर की CWC द्वारा पारित आदेश को चुनौती दी गई थी।

मंदिर में हुआ था गोद लेने का समारोह

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, बच्चे के जैविक माता-पिता ने अपनी सहमति से अपने तीसरे बच्चे को उन्हें गोद देने का फैसला किया था। अप्रैल 2026 में चंद्रपुर के महाकाली मंदिर में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार गोद लेने का समारोह हुआ। इसके बाद दोनों पक्षों ने गोद लेने का एक दस्तावेज तैयार किया, जिसे नोटरी कराया गया था। हालांकि, राज्य की ओर से दलील दी गई कि बच्चे को गोद देने की प्रक्रिया कानून के अनुसार नहीं अपनाई गई थी। हाईकोर्ट ने भी माना कि गोद लेने की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल नोटरी कराया गया गोदनामा वैध दत्तक ग्रहण के लिए पर्याप्त नहीं है और CARA से संबंधित निर्धारित प्रक्रिया का भी पालन किया जाना चाहिए था।

प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ, लेकिन CWC को कस्टडी लेने का अधिकार नहीं

कोर्ट ने गोद लेने की प्रक्रिया में खामी और CWC के अधिकार क्षेत्र को अलग-अलग मुद्दे माना। पीठ ने कहा कि केवल इसलिए कि गोद लेने की कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं हुई, बच्चा अपने आप “देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चे” की श्रेणी में नहीं आ जाता। अदालत ने किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 2(14) और संबंधित प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि CWC को उन्हीं बच्चों के संबंध में अधिकार प्राप्त है, जो कानून के तहत देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता वाली श्रेणी में आते हैं। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में बच्चा न तो अनाथ था और न ही परित्यक्त। इसलिए CWC द्वारा बच्चे की कस्टडी लेना और उसे जैविक माता-पिता को सौंपने का आदेश देना उचित नहीं था।

CWC का आदेश रद्द, दत्तक माता-पिता को कस्टडी लौटाने का निर्देश

हाईकोर्ट ने 25 मई 2026 के CWC आदेश को रद्द कर दिया और जैविक माता-पिता को बच्चे की कस्टडी याचिकाकर्ताओं को सौंपने का निर्देश दिया। हालांकि, फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि केवल नोटरीकृत दस्तावेज के आधार पर याचिकाकर्ताओं को वैध दत्तक माता-पिता का कानूनी अधिकार स्वतः प्राप्त नहीं होता। मामले का शीर्षक Nilima Dilip Kannurwar v. Child Welfare Committee है और यह Criminal Writ Petition No. 530 of 2026 के रूप में दर्ज है। मामले में पीठ ने CWC के अधिकार क्षेत्र की सीमा और बच्चे की कस्टडी के प्रश्न को अलग-अलग आधार पर देखा।