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30 लाख का इनामी TPC कमांडर बृजेश गंझू वाराणसी में मारा गया, NIA भी कर रही थी तलाश; 39 मामलों में था वांटेड
वाराणसी के रामनगर इलाके में यूपी ATS के साथ हुई मुठभेड़ में 30 लाख रुपये का इनामी नक्सली कमांडर बृजेश गंझू उर्फ गोपाल सिंह भोक्ता मारा गया। पुलिस के मुताबिक वह झारखंड के प्रतिबंधित संगठन तृतीय प्रस्तुति कमेटी (TPC) का वरिष्ठ कमांडर था। उसके खिलाफ हत्या, अपहरण, रंगदारी, आपराधिक साजिश, हथियारों से जुड़े अपराध और UAPA समेत कई धाराओं में 39 मामले दर्ज थे। उस पर झारखंड सरकार ने 25 लाख और NIA ने 5 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था। NIA की वांटेड सूची में भी उसका नाम दर्ज था।

वाराणसी: उत्तर प्रदेश के वाराणसी में रविवार सुबह यूपी ATS की कार्रवाई में झारखंड के 30 लाख रुपये के इनामी नक्सली कमांडर बृजेश गंझू उर्फ गोपाल सिंह भोक्ता की मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक बृजेश प्रतिबंधित संगठन तृतीय प्रस्तुति कमेटी (TPC) का वरिष्ठ कमांडर था और लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों की तलाश में था। उसके खिलाफ झारखंड में दर्ज मामलों की संख्या 39 बताई गई है। बृजेश गंझू के खिलाफ घोषित कुल इनाम 30 लाख रुपये था। इसमें 25 लाख रुपये झारखंड सरकार और 5 लाख रुपये राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की ओर से घोषित किए गए थे। NIA की आधिकारिक वांटेड सूची में उसका नाम गोपाल सिंह भोक्ता उर्फ ब्रिजेश गंझू के तौर पर दर्ज है। NIA रिकॉर्ड में उसके खिलाफ RC-06/2018/NIA/DLI और RC-22/2018/NIA/DLI मामलों का उल्लेख है।
TPC का वरिष्ठ कमांडर था बृजेश
पुलिस के मुताबिक बृजेश गंझू झारखंड में सक्रिय प्रतिबंधित संगठन TPC से जुड़ा था। उसे संगठन का वरिष्ठ कमांडर बताया गया है। TPC को माओवादी आंदोलन से अलग हुआ संगठन बताया जाता है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार बृजेश पर संगठन की गतिविधियों को चलाने, रंगदारी वसूली और अन्य आपराधिक गतिविधियों से जुड़े आरोप थे। उसके खिलाफ दर्ज मामलों का सिलसिला काफी पुराना बताया गया है। उपलब्ध पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार उसके खिलाफ शुरुआती मामले 1996 से दर्ज हैं। इसके बाद 1998, 2001 और आगे के वर्षों में झारखंड के अलग-अलग थानों में उसके खिलाफ कई मामले दर्ज होते रहे।
39 मामलों में था वांटेड
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार बृजेश गंझू के खिलाफ 39 मामले दर्ज थे। ये मामले झारखंड के सिमरिया, टंडवा, लावालौंग, सदर, पिपरवार, पत्थलगड्डा, मयूरहंड, गिद्धौर, हंटरगंज और वशिष्ठनगर समेत कई थाना क्षेत्रों से जुड़े थे। इन मामलों में हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण, दंगा, सरकारी कर्मचारियों पर हमला, रंगदारी, आपराधिक साजिश, अवैध हथियार, संपत्ति को नुकसान और गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम यानी UAPA से जुड़ी धाराएं शामिल थीं।
टंडवा और कोयला क्षेत्र से जुड़ा मामला
बृजेश गंझू का नाम टंडवा क्षेत्र से जुड़े मामलों में भी सामने आया था। उपलब्ध केस रिकॉर्ड के अनुसार टंडवा थाना केस नंबर 02/2016 में उस पर रंगदारी, आपराधिक साजिश और हथियारों से जुड़े आरोप लगाए गए थे। बाद की जांच में इस मामले में UAPA की धाराएं भी जोड़ी गईं। मामले की जांच बाद में NIA ने अपने हाथ में ली। जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा झारखंड के मगध और आम्रपाली कोयला परियोजना क्षेत्र में कथित वसूली नेटवर्क से जुड़ा था। एजेंसियों के रिकॉर्ड में TPC से जुड़े लोगों द्वारा लेवी वसूली और संगठन की गतिविधियों के लिए धन जुटाने के आरोपों की जांच का उल्लेख मिलता है। हालांकि, इन आरोपों को केस रिकॉर्ड में दर्ज आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए, न कि प्रत्येक मामले में न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में।
वाराणसी में कैसे पहुंचा?
अब तक सामने आई पुलिस जानकारी के मुताबिक ATS को बृजेश गंझू के वाराणसी में मौजूद होने की सूचना मिली थी। 20 सितंबर की सुबह वह एक सहयोगी के साथ बाइक से टेंगरा मोड़ से मुगलसराय की ओर, रामनगर के रास्ते जा रहा था। सूचना के आधार पर ATS टीम ने उसे रोकने की कोशिश की।
पुलिस के मुताबिक बृजेश ने रुकने के बजाय फायरिंग शुरू कर दी। इसके बाद हुई मुठभेड़ में वह घायल हो गया। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।
ATS के दो पुलिसकर्मी सुरक्षित
पुलिस के मुताबिक मुठभेड़ के दौरान बृजेश की ओर से चली गोलियां यूपी ATS के डिप्टी एसपी विपिन राय और हेड कांस्टेबल नितेंद्र कृष्ण की बुलेटप्रूफ जैकेट से टकराईं। दोनों पुलिसकर्मी सुरक्षित रहे। पुलिस ने बताया कि कार्रवाई के दौरान बृजेश के साथ मौजूद व्यक्ति मौके से निकल गया और उसकी भूमिका की जांच की जा रही है। यह भी जांच का विषय है कि बृजेश वाराणसी में किस उद्देश्य से आया था और वहां उसका कोई स्थानीय संपर्क या नेटवर्क था या नहीं। इन सवालों पर अभी आधिकारिक जांच पूरी नहीं हुई है।
NIA की वांटेड लिस्ट में भी था नाम
बृजेश गंझू की तलाश सिर्फ झारखंड पुलिस तक सीमित नहीं थी। NIA की आधिकारिक Most Wanted सूची में उसका नाम गोपाल सिंह भोक्ता के रूप में दर्ज था। वहां उसका उपनाम ब्रिजेश गंझू दिया गया है और उसके खिलाफ दो NIA मामलों—RC-06/2018/NIA/DLI और RC-22/2018/NIA/DLI—का उल्लेख है। इस तरह वाराणसी की कार्रवाई से पहले बृजेश लंबे समय से कई एजेंसियों के रडार पर था। झारखंड में उसके खिलाफ पुराने आपराधिक मामलों और NIA की जांच के चलते उसकी तलाश लगातार जारी थी।
कभी पंचायत मुखिया भी चुना गया था
बृजेश गंझू की पृष्ठभूमि का एक अलग पहलू यह भी बताया गया है कि वह 2010 में लावालौंग पंचायत का निर्विरोध मुखिया चुना गया था। बाद में उसका नाम उग्रवादी गतिविधियों से जुड़े मामलों में सामने आता रहा। यह तथ्य उसके सार्वजनिक जीवन और बाद में सामने आए आपराधिक रिकॉर्ड के बीच का विरोधाभास दिखाता है। वाराणसी में हुई कार्रवाई के बाद अब जांच एजेंसियां उसके साथ मौजूद व्यक्ति, वाराणसी में उसके संभावित संपर्कों और यहां आने के उद्देश्य की जानकारी जुटा रही हैं। पुलिस के मुताबिक
उसकी मौत के साथ एक लंबे समय से फरार चल रहे 30 लाख रुपये के इनामी आरोपी की तलाश खत्म हुई है, लेकिन उससे जुड़े नेटवर्क की जांच आगे जारी रह सकती है।
नोट: “39 मामले” का आंकड़ा मौजूदा पुलिस रिकॉर्ड/रिपोर्टों में दिया गया है। कुछ शुरुआती मीडिया रिपोर्टों में मामलों की संख्या अलग तरीके से बताई गई है, इसलिए कॉपी में 39 को पुलिस रिकॉर्ड के संदर्भ में रखना अधिक सटीक है
