law-order
माइक्रोस्कोपिक जांच के आधार पर खाद्य मिलावट साबित नहीं की जा सकती, बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला
बॉम्बे हाईकोर्ट ने खाद्य मिलावट से जुड़े मामले में कहा है कि केवल माइक्रोस्कोपिक जांच के आधार पर खाद्य पदार्थ में मिलावट साबित नहीं की जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि Prevention of Food Adulteration Act, 1954 में माइक्रोस्कोपिक जांच को विश्लेषणात्मक या रासायनिक परीक्षण के रूप में मान्यता नहीं दी गई है, इसलिए ऐसी जांच के नतीजों की कानूनी मान्यता नहीं है।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने खाद्य मिलावट से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि माइक्रोस्कोपिक जांच (Microscopic Examination) को खाद्य पदार्थों की मिलावट साबित करने के लिए वैध विश्लेषणात्मक या रासायनिक परीक्षण नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि Prevention of Food Adulteration Act, 1954 में माइक्रोस्कोपिक जांच को किसी मान्य परीक्षण के रूप में निर्धारित या स्वीकार नहीं किया गया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल माइक्रोस्कोप के जरिए की गई जांच के परिणामों के आधार पर किसी खाद्य पदार्थ को मिलावटी घोषित नहीं किया जा सकता। ऐसी जांच के नतीजों को कानून के तहत आवश्यक विश्लेषणात्मक परीक्षण का दर्जा प्राप्त नहीं है।
कानून में माइक्रोस्कोपिक जांच को मान्यता नहीं
मामले की सुनवाई बॉम्बे हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति अभय की पीठ ने की। कोर्ट ने Prevention of Food Adulteration Act, 1954 के प्रावधानों पर विचार करते हुए कहा कि अधिनियम में खाद्य पदार्थों की जांच के लिए निर्धारित वैज्ञानिक और विश्लेषणात्मक प्रक्रियाओं का पालन आवश्यक है।
पीठ ने पाया कि माइक्रोस्कोपिक जांच अपने आप में न तो रासायनिक विश्लेषण है और न ही ऐसा विश्लेषणात्मक परीक्षण, जिसे अधिनियम के तहत खाद्य मिलावट साबित करने के लिए आधार बनाया जा सके।
माइक्रोस्कोपिक रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल
अदालत ने कहा कि जब कानून किसी विशेष प्रकार की जांच को खाद्य मिलावट निर्धारित करने के लिए मान्यता नहीं देता, तो उस जांच के परिणामों को कानूनी रूप से निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। इस मामले में माइक्रोस्कोपिक जांच के आधार पर खाद्य पदार्थ में कथित मिलावट का निष्कर्ष निकाला गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसी जांच के परिणामों को वैधानिक विश्लेषणात्मक परीक्षण का दर्जा नहीं दिया जा सकता और उनकी कोई कानूनी मान्यता नहीं है।
खाद्य मिलावट के मामलों में वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी
फैसले में अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि खाद्य मिलावट से संबंधित कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया और मान्य परीक्षणों के आधार पर होनी चाहिए। केवल ऐसी जांच, जिसे संबंधित कानून में विश्लेषणात्मक परीक्षण के रूप में मान्यता नहीं मिली है, उसके आधार पर किसी व्यक्ति को खाद्य मिलावट के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। हाईकोर्ट की यह टिप्पणी Prevention of Food Adulteration Act, 1954 के तहत दर्ज खाद्य मिलावट के मामलों में जांच और वैज्ञानिक साक्ष्य की भूमिका को स्पष्ट करती है।
