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22 साल तक मूल भूमिधर ने नहीं दी बेदखली को चुनौती, अब वारिस राहत नहीं मांग सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शहरी भूमि सीमा कानून से जुड़े मामले में कहा है कि यदि मूल भूमिधर को कानून के तहत जमीन से बेदखल किए जाने के बाद उसने उस कार्रवाई को चुनौती नहीं दी, तो उसके कानूनी वारिस वर्षों बाद राहत का दावा नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा कि 22 साल की देरी के बाद वारिस न तो राजस्व रिकॉर्ड में सुधार के लिए रिट मांग सकते हैं और न ही Urban Land (Ceiling and Regulation) Repeal Act, 1999 के तहत लाभ का दावा कर सकते हैं।

Sonali20 सित. 2026, 06:06 PM IST
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22 साल तक मूल भूमिधर ने नहीं दी बेदखली को चुनौती, अब वारिस राहत नहीं मांग सकते: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शहरी भूमि सीमा कानून से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि मूल भूमिधर को कानून के तहत भूमि से बेदखल किए जाने के बाद उसने उस कार्रवाई को चुनौती नहीं दी, तो उसके कानूनी वारिस वर्षों बाद उस बेदखली को चुनौती देकर राहत नहीं मांग सकते। अदालत ने कहा कि लंबे समय तक चुप रहने के बाद वारिस राजस्व अभिलेखों में सुधार या Urban Land (Ceiling and Regulation) Repeal Act, 1999 का लाभ लेने के लिए रिट ऑफ मैंडमस की मांग नहीं कर सकते। मामले में याचिकाकर्ताओं ने अपने पूर्वज की भूमि से संबंधित राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव और शहरी भूमि सीमा कानून के तहत कार्रवाई के संबंध में राहत की मांग की थी। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि उनके पूर्वज के पास संबंधित भूमि पर अधिकार था और बाद में उन्हें कानून के तहत उपलब्ध राहत का लाभ मिलना चाहिए।

हालांकि, अदालत के समक्ष यह तथ्य सामने आया कि मूल भूमिधर को उत्तर प्रदेश शहरी भूमि (सीलिंग और विनियमन) अधिनियम, 1976 की धारा 10(5) या धारा 10(6) के तहत भूमि से बेदखल कर दिया गया था। इसके बावजूद मूल भूमिधर ने अपनी बेदखली की कार्रवाई को उचित समय के भीतर किसी सक्षम न्यायालय या प्राधिकरण के समक्ष चुनौती नहीं दी।

22 साल बाद वारिसों ने उठाया मामला

हाईकोर्ट ने पाया कि मूल भूमिधर की बेदखली के बाद करीब 22 वर्षों तक इस कार्रवाई के खिलाफ कोई प्रभावी कानूनी कदम नहीं उठाया गया। इसके बाद उनके कानूनी वारिसों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और राजस्व अभिलेखों में सुधार के साथ-साथ Urban Land (Ceiling and Regulation) Repeal Act, 1999 के तहत राहत की मांग की। अदालत ने कहा कि केवल उत्तराधिकारी होने के आधार पर वारिस उस अधिकार को दोबारा जीवित नहीं कर सकते, जिसे मूल भूमिधर ने अपने जीवनकाल में चुनौती नहीं दी थी। यदि मूल भूमिधर ने बेदखली को स्वीकार कर लिया या उसके खिलाफ समय पर कोई कानूनी चुनौती नहीं दी, तो उसके वारिस दशकों बाद उसी मुद्दे को उठाकर राहत का दावा नहीं कर सकते।

Repeal Act का लाभ भी नहीं मिलेगा

मामले में Urban Land (Ceiling and Regulation) Repeal Act, 1999 के लाभ का दावा भी किया गया था। इस संबंध में हाईकोर्ट ने कहा कि Repeal Act का लाभ लेने के लिए यह देखना जरूरी है कि संबंधित भूमि पर वास्तविक कब्जा किसके पास था और क्या राज्य द्वारा वैधानिक प्रक्रिया के तहत कब्जा पहले ही ले लिया गया था।

यदि कानून के तहत भूमि का कब्जा राज्य द्वारा ले लिया गया था और मूल भूमिधर ने उस कार्रवाई को चुनौती नहीं दी, तो बाद में उसके वारिस केवल राजस्व रिकॉर्ड में नाम या प्रविष्टि के आधार पर Repeal Act का लाभ नहीं मांग सकते।

रिट ऑफ मैंडमस की मांग पर भी राहत नहीं

हाईकोर्ट ने राजस्व अभिलेखों में सुधार के लिए रिट ऑफ मैंडमस जारी करने की मांग को भी स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि जब मूल बेदखली की कार्रवाई को चुनौती ही नहीं दी गई और उसके बाद लंबा समय बीत चुका है, तो केवल राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव की मांग के जरिए उस कार्रवाई को अप्रत्यक्ष रूप से चुनौती नहीं दी जा सकती।

अदालत ने यह भी माना कि न्यायिक राहत मांगने में हुई अत्यधिक देरी महत्वपूर्ण है। 22 वर्षों तक कार्रवाई नहीं करने के बाद वारिसों द्वारा मामले को उठाना अदालत के हस्तक्षेप के लिए उचित आधार नहीं बनता। इस प्रकार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मूल भूमिधर द्वारा बेदखली को चुनौती नहीं दिए जाने की स्थिति में उसके कानूनी वारिस वर्षों बाद उसी कार्रवाई के आधार पर रिट राहत नहीं मांग सकते। साथ ही, वैधानिक प्रक्रिया के तहत राज्य द्वारा कब्जा लिए जाने के बाद केवल Repeal Act का हवाला देकर भूमि पर अधिकार का दावा नहीं किया जा सकता।