इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रेलवे दुर्घटनाओं में मिलने वाले मुआवजे से जुड़े नियमों पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी दावेदार की साक्षरता या आर्थिक स्थिति के आधार पर उसे मुआवजे की पूरी राशि देने से रोकना संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने Railway Accidents and Untoward Incidents (Compensation) Rules, 1990 के कुछ प्रावधानों को भेदभावपूर्ण माना है। मामला रेलवे दुर्घटना में मुआवजे के दावे से जुड़ा था। याचिकाकर्ता की ओर से उन नियमों को चुनौती दी गई थी, जिनके तहत रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल (RCT) को यह अधिकार दिया गया था कि वह दावेदार की साक्षरता और आर्थिक स्थिति को देखते हुए स्वीकृत मुआवजे की पूरी राशि एक साथ जारी न करे। नियमों के तहत ट्रिब्यूनल मुआवजे का केवल एक हिस्सा दावेदार को दे सकता था, जबकि शेष राशि को फिक्स्ड डिपॉजिट में रखने का निर्देश दिया जा सकता था। इस व्यवस्था का उद्देश्य कथित तौर पर मुआवजे की राशि को सुरक्षित रखना था, लेकिन हाईकोर्ट ने इसके लागू होने के तरीके पर सवाल उठाया।
साक्षरता और आर्थिक स्थिति के आधार पर अलग व्यवहार
अदालत ने कहा कि समान परिस्थितियों में मुआवजा पाने वाले दावेदारों के साथ उनकी साक्षरता या आर्थिक स्थिति के आधार पर अलग-अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता। यदि किसी व्यक्ति को केवल इसलिए पूरी मुआवजा राशि से वंचित किया जाता है क्योंकि वह कम पढ़ा-लिखा है या उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर है, तो यह समानता के संवैधानिक सिद्धांत के विपरीत हो सकता है। हाईकोर्ट ने विशेष रूप से Railway Accidents and Untoward Incidents (Compensation) Rules, 1990 के नियम 5.1 और नियम 5.4.1(i) एवं (ii) की जांच की। कोर्ट के अनुसार, इन प्रावधानों के तहत दावेदारों के बीच इस तरह का अंतर किया जाना संविधान के अनुच्छेद 14 की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
मुआवजे की राशि पर ट्रिब्यूनल की शक्ति
रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल का उद्देश्य रेलवे दुर्घटनाओं से प्रभावित लोगों या उनके परिवारों को कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से मुआवजा उपलब्ध कराना है। हालांकि, अदालत ने कहा कि मुआवजे की राशि को रोकने या फिक्स्ड डिपॉजिट में रखने की शक्ति का इस्तेमाल दावेदार की व्यक्तिगत स्थिति के आधार पर भेदभावपूर्ण तरीके से नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने माना कि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति कमजोर होना या उसका साक्षर न होना अपने आप में उसके साथ अलग व्यवहार करने का आधार नहीं हो सकता। मुआवजे पर ऐसी पाबंदी लगाने से पहले समानता के संवैधानिक सिद्धांत को ध्यान में रखना जरूरी है।
अनुच्छेद 14 का उल्लंघन
हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण की गारंटी देता है। ऐसे में एक ही श्रेणी के मुआवजा दावेदारों के बीच केवल साक्षरता या आर्थिक स्थिति के आधार पर अंतर करना उचित नहीं माना जा सकता। अदालत ने Rules 5.1 और 5.4.1(i) तथा (ii) में मौजूद उस व्यवस्था को चुनौती के संदर्भ में असंवैधानिक माना, जिसके आधार पर दावेदार की साक्षरता और वित्तीय स्थिति को देखते हुए मुआवजे की राशि का एक हिस्सा रोककर फिक्स्ड डिपॉजिट में रखा जा सकता था। यह फैसला रेलवे दुर्घटना मुआवजा मामलों में दावेदारों के साथ समान व्यवहार और उनके संवैधानिक अधिकारों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हाईकोर्ट की टिप्पणी का सीधा संबंध इस बात से है कि मुआवजे की राशि के वितरण में दावेदार की व्यक्तिगत सामाजिक या आर्थिक स्थिति को भेदभाव का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए।