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बिजनेस शुरू करने के लिए मांगे ₹50 हजार भी दहेज की मांग, दिल्ली हाईकोर्ट ने 304B IPC में दोषसिद्धि बरकरार रखी
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि बिजनेस शुरू करने के लिए मांगे गए ₹50 हजार भी दहेज की मांग माने जा सकते हैं, यदि उनका संबंध वैवाहिक रिश्ते से हो। कोर्ट ने 304B और 498A IPC के दोषियों की अपील खारिज कर दी।

नई दिल्ली:
दिल्ली हाईकोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि वैवाहिक रिश्ते से जुड़ी पैसों की मांग सिर्फ इसलिए दहेज की मांग के दायरे से बाहर नहीं हो जाती, क्योंकि रकम निजी इस्तेमाल के बजाय बिजनेस शुरू करने के लिए मांगी गई हो। जस्टिस विमल कुमार यादव ने कहा कि यदि पैसों की मांग का संबंध वैवाहिक रिश्ते से है, तो उसका उद्देश्य कारोबार शुरू करना बताया जाना उसे दहेज की परिभाषा से बाहर नहीं करता। मामला करीब 23 साल पुराना है। मृतका की शादी के लगभग साढ़े चार महीने बाद 10 अप्रैल 2003 को फांसी लगाने से मौत हो गई थी। घटना के बाद पुलिस ने धारा 498A, 304B और 34 IPC के तहत एफआईआर दर्ज की थी। ट्रायल कोर्ट ने परिवार के दो सदस्यों को धारा 304B और 498A IPC के तहत दोषी ठहराया, जबकि एक अन्य आरोपी को बरी कर दिया था। दोषियों ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतका को ₹50 हजार की मांग को लेकर दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया था। हाईकोर्ट के समक्ष बचाव पक्ष ने अभियोजन के गवाहों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए दलील दी कि वे मृतका के रिश्तेदार थे और उनके बयानों की कोई स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई थी।
रिश्तेदार गवाहों को लेकर कोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि केवल मृतका के रिश्तेदार होने के कारण किसी गवाह को “इच्छुक गवाह” नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक क्रूरता और दहेज उत्पीड़न की घटनाएं आम तौर पर वैवाहिक घर की चारदीवारी के भीतर होती हैं। ऐसे मामलों में परिवार के सदस्य परिस्थितियों के स्वाभाविक गवाह हो सकते हैं। कोर्ट ने यह भी पाया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों ने लगातार ₹50 हजार नकद की विशिष्ट मांग का उल्लेख किया था। बचाव पक्ष की यह दलील भी कोर्ट ने स्वीकार नहीं की कि रकम बिजनेस शुरू करने के लिए मांगी गई थी और इसलिए इसे दहेज की मांग नहीं माना जा सकता।
बिजनेस के लिए पैसा मांगना भी दहेज की मांग हो सकती है
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिजनेस शुरू करने के उद्देश्य से की गई पैसों की मांग भी दहेज की मांग के दायरे में आ सकती है, यदि उसका संबंध वैवाहिक रिश्ते से हो। कोर्ट ने कहा कि मांग का उद्देश्य “बिजनेस” बताया जाना उसे केवल इसी आधार पर दहेज की परिभाषा से बाहर नहीं करता। धारा 304B IPC को लेकर कोर्ट ने यह भी कहा कि दहेज मृत्यु के अपराध के लिए पहले से तय किसी अंतिम समझौते के अस्तित्व को अलग से साबित करना आवश्यक नहीं है। हालांकि, धारा 304B लागू करने के लिए कानून में निर्धारित अन्य सभी आवश्यक तत्वों का स्थापित होना जरूरी है।
शारीरिक चोट नहीं होने से दहेज उत्पीड़न खत्म नहीं होता
बचाव पक्ष की इस दलील पर कि मृतका के शरीर पर कोई शारीरिक चोट नहीं थी, हाईकोर्ट ने कहा कि केवल शारीरिक चोटों की अनुपस्थिति के आधार पर क्रूरता या दहेज उत्पीड़न को नकारा नहीं जा सकता। यदि अन्य साक्ष्यों से उत्पीड़न और क्रूरता साबित होती है, तो चोट का अभाव अपने आप में निर्णायक नहीं है। “मौत से ठीक पहले” की कोई निश्चित समय सीमा नहीं कोर्ट ने धारा 304B IPC में इस्तेमाल किए गए “soon before her death” यानी “मौत से ठीक पहले” शब्दों की भी व्याख्या की। कोर्ट ने कहा कि इसके लिए कोई निश्चित समय अवधि तय नहीं की जा सकती। जरूरी यह है कि दहेज संबंधी उत्पीड़न और महिला की मौत के बीच निकट और जीवंत संबंध हो। अंत में दिल्ली हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों को दोषसिद्धि बनाए रखने के लिए पर्याप्त माना और दोनों दोषियों की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने उन्हें शेष सजा भुगतने के लिए आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।
मामला: Naveen Kumar Verma & Anr. v. State
केस नंबर: CRL.A. 677/2004
