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अंधेरी रात में हमलावरों की पहचान पर उठे सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने 4 हत्या दोषियों को किया बरी

सुप्रीम कोर्ट ने 2001 के ओडिशा हत्या मामले में चार दोषियों को बरी करते हुए कहा कि पिच-डार्क रात में प्रत्यक्षदर्शियों के लिए आरोपियों की पहचान करना संभव नहीं था। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से आरोप साबित करने में विफल रहा।

Sonali21 सित. 2026, 09:53 PM IST
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अंधेरी रात में हमलावरों की पहचान पर उठे सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने 4 हत्या दोषियों को किया बरी

नई दिल्ली:

 सुप्रीम कोर्ट ने 2001 में ओडिशा में हुई ध्रुबा प्रधान की हत्या के मामले में चार दोषियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर आरोप साबित करने में विफल रहा। कोर्ट ने यह भी माना कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने ऐसे प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयानों पर भरोसा किया, जिनकी अंधेरी रात में आरोपियों की पहचान करने की क्षमता संदेह से परे साबित नहीं हुई थी। जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने उड़ीसा हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द करते हुए कहा कि आरोपियों को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए।


क्या था पूरा मामला?

अभियोजन के अनुसार, वर्ष 2001 में आरोपियों में से एक ने शिकायतकर्ता के घर जाकर मृतक ध्रुबा प्रधान को जान से मारने की धमकी दी थी। उसी शाम कुछ आरोपी कथित तौर पर हथियारों से लैस होकर मृतक की तलाश में निकले। बाद में उन्होंने मोटरसाइकिल से जा रहे ध्रुबा प्रधान को कथित तौर पर रोका और पत्थरों व हथियारों से हमला किया। इसके बाद उसकी मोटरसाइकिल को एक तालाब में फेंक दिया गया। मामले में कुल 18 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी। इनमें से 14 आरोपियों पर ट्रायल चला। ट्रायल कोर्ट ने छह आरोपियों को IPC की धारा 148, 506 और 302 के तहत दोषी ठहराया था। इन धाराओं को IPC की धारा 149 के साथ पढ़ते हुए सभी को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। वहीं, आठ आरोपियों को बरी कर दिया गया था।


हाईकोर्ट ने प्रत्यक्षदर्शी गवाही को माना अविश्वसनीय

मामला हाईकोर्ट पहुंचने पर प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही पर भी सवाल उठा। हाईकोर्ट ने माना कि जिस रात घटना हुई, वह इतनी अंधेरी थी कि गवाहों के लिए हमलावरों की पहचान कर पाना संभव नहीं था। हालांकि, हाईकोर्ट ने प्रत्यक्षदर्शी गवाही को हटाने के बावजूद परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि को बरकरार रखा।

इसके बाद आरोपियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।


अभियोजन प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य दोनों साक्ष्यों में विफल

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की दोबारा जांच करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष का मामला न तो प्रत्यक्ष साक्ष्य से और न ही परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की श्रृंखला से पर्याप्त रूप से साबित होता है। कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने प्रत्यक्षदर्शी गवाही को अविश्वसनीय मानने के बावजूद परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर दोषसिद्धि बनाए रखी, लेकिन वे परिस्थितियां आरोपियों के अपराध को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थीं। पीठ ने कहा कि आपराधिक मामले में अभियोजन पक्ष को आरोपी के अपराध को संदेह से परे साबित करना होता है। यदि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अपराध को लेकर उचित संदेह बना रहता है, तो उसका लाभ आरोपी को दिया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार पर चारों अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया और उनके खिलाफ हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में विफल रहा और आरोपी संदेह का लाभ पाने के हकदार हैं।