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बरेली में 22 साल बाद जमीन पर दावा, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

बरेली: जमीन पर राज्य के कब्जे के 22 साल बाद पांच कानूनी वारिस हाईकोर्ट पहुंचे। उन्होंने राजस्व रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराने और जमीन पर कब्जे की मांग की थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और लंबी देरी को देखते हुए याचिका खारिज कर दी।

Neha Sharma21 सित. 2026, 09:55 PM IST
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बरेली में 22 साल बाद जमीन पर दावा, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

बरेली: उत्तर प्रदेश के बरेली में जमीन से जुड़े करीब तीन दशक पुराने विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पांच कानूनी वारिसों की याचिका खारिज कर दी। वारिसों ने राजस्व रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करने और जमीन पर उनके कब्जे में प्रशासन की ओर से हस्तक्षेप न करने की मांग की थी। अदालत ने पाया कि संबंधित जमीन पर राज्य ने वर्ष 1992 में कब्जा ले लिया था, जबकि वारिसों ने इसके खिलाफ वर्ष 2014 में हाईकोर्ट का रुख किया। यानी कब्जा लिए जाने के 22 साल से अधिक समय बाद याचिका दाखिल की गई।


मामला बरेली जिले के सलेनगर गांव की जमीन से जुड़ा है। कोर्ट रिकॉर्ड के मुताबिक जमीन मूल रूप से जोगराज के नाम दर्ज थी। जोगराज की सितंबर 1981 में मृत्यु हो गई थी। याचिकाकर्ताओं ने खुद को उनका कानूनी वारिस बताते हुए कहा कि विरासत में जमीन मिलने के बाद वे उस पर भौतिक कब्जे में रहे।


जमीन को सरप्लस घोषित करने का मामला

विवादित जमीन पर उत्तर प्रदेश शहरी भूमि (सीलिंग एवं विनियमन) अधिनियम, 1976 के तहत कार्रवाई हुई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि जोगराज के खिलाफ जमीन को अतिरिक्त यानी surplus land घोषित करने की कार्रवाई एकतरफा हुई और उन्हें उचित जानकारी नहीं दी गई। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने कोर्ट में कहा कि जोगराज को कार्रवाई की जानकारी थी और उन्होंने संबंधित कार्यवाही में आपत्ति भी दाखिल की थी। राज्य के मुताबिक इसके बाद कानून के तहत आगे की प्रक्रिया पूरी की गई और जमीन को सरप्लस घोषित किया गया।


1992 में राज्य ने लिया जमीन पर कब्जा

कोर्ट के सामने पेश मूल रिकॉर्ड में जमीन पर कब्जा लिए जाने का दस्तावेज यानी 'दखलनामा' (Dakhalnama) मौजूद था। यह दस्तावेज 10 जनवरी 1992 का था। अदालत ने रिकॉर्ड में पाया कि दखलनामा तहसीलदार और स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में तैयार किया गया था।


इससे पहले 27 मई 1989 को धारा 10(3) के तहत अधिसूचना जारी हुई थी और 29 अगस्त 1989 को धारा 10(5) के तहत नोटिस दिए जाने का रिकॉर्ड भी सामने आया। इसके बाद राजस्व रिकॉर्ड में भी बदलाव किए गए और राज्य का नाम दर्ज किया गया। अदालत ने माना कि मूल रिकॉर्ड में कब्जा लिए जाने की कार्रवाई दर्ज थी।


2014 में हाईकोर्ट पहुंचे वारिस

याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2014 में हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। उन्होंने राजस्व रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करने और जमीन पर अपने कब्जे में प्रशासन को हस्तक्षेप न करने का निर्देश देने की मांग की। उनका तर्क था कि वे जमीन पर वास्तविक कब्जे में थे और Urban Land (Ceiling and Regulation) Repeal Act, 1999 का लाभ उन्हें मिलना चाहिए। उन्होंने दखलनामा की वैधता पर भी सवाल उठाया।


कोर्ट ने देरी को माना अहम

मामले की सुनवाई जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने की। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड के अनुसार 1992 में कब्जा लिया जा चुका था, लेकिन मूल भू-धारक या उनके वारिसों ने उस कब्जे को उचित समय में चुनौती नहीं दी।


अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ताओं ने ऐसा पर्याप्त दस्तावेज पेश नहीं किया जिससे यह साबित हो कि 1992 में दखलनामा बनने के बाद भी वे जमीन पर कब्जे में थे या 18 मार्च 1999 को Repeal Act लागू होने के समय उनका वास्तविक कब्जा था।


सिर्फ राजस्व रिकॉर्ड से कब्जा साबित नहीं हुआ

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना जमीन पर वास्तविक कब्जे का निर्णायक प्रमाण नहीं है। कोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ताओं की ओर से ऐसे अतिरिक्त दस्तावेज नहीं दिए गए जो 1992 के बाद विवादित सरप्लस जमीन पर उनके वास्तविक कब्जे को साबित करते हों।


अदालत ने यह भी नोट किया कि संबंधित रिकॉर्ड में जोगराज की ओर से वर्ष 1982 में धारा 20 के तहत आवेदन किए जाने का उल्लेख था। इससे अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि मूल भू-धारक और उनके वारिसों को जमीन से जुड़ी सरकारी कार्रवाई की जानकारी थी।


22 साल की देरी पर कोर्ट की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि कब्जा लिए जाने के 22 साल बाद याचिका दाखिल की गई। साथ ही 1999 के Repeal Act के लागू होने के बाद भी लंबे समय तक कोई प्रभावी चुनौती नहीं दी गई। अदालत ने याचिकाकर्ताओं की देरी की वजह को पर्याप्त नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि इतनी लंबी और अस्पष्ट देरी के बाद 1992 के दखलनामा या उस समय की नोटिस प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की जांच करना उचित नहीं होगा।


हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया?

हाईकोर्ट ने Harpal and 4 Others vs State of U.P. and 2 Others, Writ-C No. 30456 of 2014 में याचिका खारिज कर दी। फैसला 14 सितंबर 2026 को सुनाया गया। अदालत ने कहा कि मूल भू-धारक ने कब्जा लिए जाने के खिलाफ उचित समय में कानूनी उपाय नहीं अपनाया। ऐसे में उनके वारिस बाद में केवल राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज कराने या जमीन पर कब्जे का दावा करने के लिए राहत नहीं मांग सकते। याचिका खारिज करते हुए अदालत ने लागत के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया।


मामले का महत्व

यह फैसला सरकारी जमीन या शहरी भूमि सीलिंग से जुड़े मामलों में कब्जे को समय पर चुनौती देने, राजस्व रिकॉर्ड और वास्तविक कब्जे के बीच अंतर तथा लंबे समय बाद अदालत का रुख करने जैसे कानूनी पहलुओं को सामने लाता है। हालांकि, इस फैसले के तथ्य इसी मामले और उपलब्ध रिकॉर्ड तक सीमित हैं; इसे हर जमीन विवाद पर लागू होने वाला सामान्य नियम नहीं माना जा सकता।