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मारपीट मामले में 7 आरोपियों को उल्हासनगर कोर्ट से बरी, मुख्य शिकायतकर्ता ने आरोपों का समर्थन नहीं किया

उल्हासनगर कोर्ट ने 2018 के मारपीट मामले में सात आरोपियों को बरी कर दिया। मुख्य शिकायतकर्ता ने कोर्ट में आरोपों का समर्थन नहीं किया, जिसके बाद अभियोजन आरोप साबित करने में विफल रहा।

Sonali21 सित. 2026, 09:56 PM IST
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मारपीट मामले में 7 आरोपियों को उल्हासनगर कोर्ट से बरी, मुख्य शिकायतकर्ता ने आरोपों का समर्थन नहीं किया

उल्हासनगर के न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी, न्यायालय क्रमांक 4 ने 2018 के मारपीट और गैरकानूनी जमावड़े से जुड़े मामले में सात आरोपियों को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सका। मामले के मुख्य शिकायतकर्ता ने अदालत में प्राथमिकी में दर्ज आरोपों का समर्थन नहीं किया और आरोपियों के खिलाफ कोई ठोस बयान नहीं दिया। यह फैसला न्यायिक दंडाधिकारी गणेश रा. कोलते ने 19 सितंबर 2026 को सुनाया। मामला विठ्ठलवाड़ी पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध क्रमांक I-252/2018 से संबंधित था। अभियोजन के अनुसार, 7 अगस्त 2018 की रात शिकायतकर्ता पंकज सुरेश पटवेकर को आरोपी विशाल ने फोन कर सड़क पर बुलाया था। आरोप था कि हनुमान मंदिर, लालचक्की रोड के पास पहुंचने पर आरोपियों ने उसके साथ गाली-गलौज की और लात-घूंसों से मारपीट की। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया था कि लकड़ी के डंडे से उसके सिर और पेट पर वार किया गया।


मामले में पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 324, 323, 504, 143 और 147 के साथ धारा 149 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया था। अदालत ने 27 मई 2019 को आरोप तय किए। अभियोजन की ओर से मामले में केवल शिकायतकर्ता पंकज सुरेश पटवेकर की गवाही दर्ज की गई। सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत पर हस्ताक्षर होने की बात स्वीकार की, लेकिन शिकायत में दर्ज घटनाक्रम और आरोपियों की भूमिका का समर्थन नहीं किया। अभियोजन पक्ष की ओर से उसे प्रतिकूल साक्षी मानते हुए जिरह की अनुमति मांगी गई, लेकिन जिरह के दौरान भी ऐसा कोई ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया, जिससे अभियोजन के आरोपों की पुष्टि हो सके।

शिकायतकर्ता ने अदालत में यह भी बताया कि उसके और आरोपियों के बीच अदालत के बाहर समझौता हो चुका है। इसके बाद शिकायतकर्ता और आरोपियों की ओर से मामले को आगे नहीं चलाने संबंधी संयुक्त आवेदन भी पेश किया गया। अभियोजन पक्ष ने इसके बाद अपना साक्ष्य बंद कर दिया। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि बचाव पक्ष ने शिकायतकर्ता के मेडिकल प्रमाणपत्र और घटनास्थल पंचनामा को स्वीकार किया था। हालांकि, मेडिकल प्रमाणपत्र में चोट होने की बात सामने आने के बावजूद यह साबित नहीं हुआ कि चोटें आरोपियों ने ही लकड़ी के डंडे से पहुंचाई थीं। अदालत ने कहा कि आरोपियों की कथित भूमिका साबित करने के लिए मुख्य साक्षी का समर्थन आवश्यक था, लेकिन शिकायतकर्ता ने आरोपों की पुष्टि नहीं की। अदालत ने माना कि किसी आपराधिक मामले में आरोप साबित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की होती है। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि आरोपियों ने गैरकानूनी जमावड़ा बनाकर शिकायतकर्ता के साथ मारपीट, गाली-गलौज या चोट पहुंचाने की घटना को अंजाम दिया था। इसके आधार पर कोर्ट ने सभी सात आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत लगे आरोपों से फौजदारी प्रक्रिया संहिता की धारा 248(1) के तहत बरी कर दिया। आरोपियों के व्यक्तिगत बंधपत्र और जमानतपत्र रद्द कर दिए गए तथा धारा 437-A के तहत प्रत्येक आरोपी को छह महीने के लिए 15,000 रुपये का बंधपत्र भरने का निर्देश दिया गया। मामले में जब्त लकड़ी के डंडे को मूल्यहीन मानते हुए अपील की अवधि समाप्त होने के बाद नष्ट करने का आदेश भी दिया गया।