मुंबई के ग्रांट रोड इलाके में वेश्यालय चलाने और एक महिला को देह व्यापार (Prostitution) के लिए मजबूर करने के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरोपी रानी प्रताप सिंह की दोषसिद्धि (Conviction) और सजा बरकरार रखी है। जस्टिस मिलिंद साठे ने 1 अक्टूबर 2026 को आरोपी की ओर से दायर क्रिमिनल रिवीजन एप्लीकेशन (Criminal Revision Application) खारिज कर दी। मामला Rani Pratap Singh vs State of Maharashtra, Criminal Revision Application No. 461 of 2025 था।
आरोपी को अनैतिक देह व्यापार (रोकथाम) अधिनियम (Immoral Traffic (Prevention) Act-ITPA/PITA) के तहत दोषी ठहराया गया था। ट्रायल कोर्ट द्वारा उसे वेश्यालय चलाने और कथित बांग्लादेशी महिला को देह व्यापार में धकेलने के मामले में दो और तीन वर्ष के कठोर कारावास (Rigorous Imprisonment) की सजा दी गई थी। इसके खिलाफ उसने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका (Revision Application) दाखिल की थी।
‘अवैध अप्रवासी’ होने का तर्क खारिज
आरोपी की ओर से दलील दी गई कि जिस महिला से संबंधित मामला है, वह बांग्लादेश की कथित अवैध अप्रवासी है। इसलिए आरोपी को इस आधार पर दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। जस्टिस मिलिंद साठे ने इस तर्क को शुरुआत में ही खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि केवल इसलिए कि पीड़िता अवैध अप्रवासी है, अपराध की गंभीरता कम नहीं हो जाती। अगर किसी व्यक्ति के इमिग्रेशन (Immigration) संबंधी दस्तावेज वैध नहीं हैं तो उसके अलग कानूनी परिणाम हो सकते हैं, लेकिन इससे उसके खिलाफ किए गए अपराध की प्रकृति नहीं बदलती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक कानून (Criminal Law) का उद्देश्य अपराध करने वाले व्यक्ति पर मुकदमा चलाना और उसे दंडित करना है, न कि पीड़ित को शर्मिंदा करना। अदालत ने कहा कि किसी पीड़ित को ‘अवैध अप्रवासी’, ‘सेक्स वर्कर’ या ‘रेस्क्यू की गई महिला’ जैसे लेबल से देखने पर उसकी मानवीय गरिमा (Human Dignity) खत्म नहीं हो जाती।
‘इमिग्रेशन लेबल गरिमा छीनने का लाइसेंस नहीं’
जस्टिस साठे ने कहा कि कानून किसी इमिग्रेशन लेबल को किसी व्यक्ति की गरिमा छीनने का लाइसेंस नहीं बनने दे सकता। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह होना चाहिए कि आरोपी ने किसी इंसान से संबंधित अपराध किया है या नहीं, न कि पीड़ित के पास वैध इमिग्रेशन दस्तावेज हैं या नहीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि पीड़िता की कथित अवैध स्थिति को आरोपी के बचाव के रूप में इस्तेमाल करना ‘विक्टिम शेमिंग’ (Victim Shaming) की ओर ले जाता है। कोर्ट ने इस तरह की दलील को खारिज करते हुए कहा कि पीड़ित की कानूनी स्थिति अलग विषय हो सकती है, लेकिन इससे मानव तस्करी से सुरक्षा का अधिकार समाप्त नहीं होता।
स्वतंत्र गवाह नहीं होने की दलील भी खारिज
आरोपी ने यह भी दावा किया कि मामले में स्वतंत्र गवाह (Independent Witnesses) नहीं थे। अभियोजन (Prosecution) के जिन गवाहों पर भरोसा किया गया, उनमें पीड़िता, पुलिस जांच अधिकारी (Investigating Officer) और एनजीओ (NGO) से जुड़े लोग शामिल थे। आरोपी ने इन गवाहों को ‘इंटरेस्टेड विटनेस’ (Interested Witnesses) बताते हुए उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाया। हाईकोर्ट ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि वेश्यालयों या ज्ञात वेश्यावृत्ति वाले स्थानों पर पुलिस छापे के दौरान आम लोगों के स्वतंत्र गवाह के रूप में सामने आने की संभावना कम होती है। ऐसे मामलों में एनजीओ से जुड़े स्वयंसेवकों की मदद लेना स्वाभाविक है। कोर्ट ने माना कि इस मामले में एनजीओ से जुड़े व्यक्ति ने डिकॉय ग्राहक (Decoy Customer) के रूप में काम किया था। इसलिए केवल एनजीओ से संबंध होने के आधार पर उसकी गवाही को ‘इंटरेस्टेड विटनेस’ नहीं माना जा सकता। इन टिप्पणियों के साथ जस्टिस मिलिंद साठे ने रानी प्रताप सिंह की पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी।