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कोर्ट परिसर में वकील के चैंबर में बाल विवाह, इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त; लाइसेंस रद्द करने और आपराधिक कार्रवाई के निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर नगर जिला अदालत परिसर में एक अधिवक्ता के चैंबर में नाबालिग लड़की का विवाह कराने के मामले को गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने अधिवक्ता प्रकाश पांडे (रंगेश) के आचरण को अधिवक्ता के सम्मानित पेशे के लिए “शर्मनाक और अपमानजनक” बताया। पीठ ने जिला जज, कानपुर नगर को आपराधिक कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए हैं, जबकि बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को अधिवक्ता का प्रैक्टिस लाइसेंस रद्द करने के लिए उचित कार्रवाई करने को कहा है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर नगर जिला अदालत परिसर में अधिवक्ता के चैंबर में नाबालिग लड़की का विवाह कराने के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस राजीव कुमार और जस्टिस बाबिता रानी की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि इस तरह का आचरण अधिवक्ता के सम्मानित पेशे के लिए “शर्मनाक और अपमानजनक” है।
कोर्ट ने अधिवक्ता प्रकाश पांडे (रंगेश), जो आर्य समाज प्रतिनिधि सभा कटरा के प्रधान भी हैं, के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को उनके प्रैक्टिस लाइसेंस को रद्द करने के लिए उचित कार्रवाई करने को कहा गया है।
मामला मूल रूप से उन्नाव के माखी थाना क्षेत्र में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। एफआईआर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 137(2) और 87 के तहत दर्ज की गई थी। मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि याचिकाकर्ता नंबर-2 नाबालिग थी। कोर्ट के सामने पेश किए गए दस्तावेजों में उसकी उम्र को लेकर महत्वपूर्ण अंतर सामने आया। उसके शैक्षणिक प्रमाणपत्र में जन्मतिथि 16 अक्टूबर 2008 दर्ज थी। वहीं, विवाह से जुड़े दस्तावेजों में आधार कार्ड के आधार पर उसकी जन्मतिथि 18 अप्रैल 2007 बताई गई थी। इस अंतर के बावजूद विवाह कराने वाले अधिवक्ता ने उसकी उम्र की पुष्टि उसके शैक्षणिक रिकॉर्ड से नहीं की।
आधार कार्ड के आधार पर कराया विवाह
हाईकोर्ट ने पहले आर्य समाज संस्था से यह स्पष्ट करने को कहा था कि नाबालिग की उम्र की पुष्टि किए बिना और उसके शैक्षणिक प्रमाणपत्र को देखे बिना विवाह कैसे कराया गया। सुनवाई के दौरान सामने आया कि विवाह केवल आधार कार्ड में दर्ज जन्मतिथि के आधार पर कराया गया था। कोर्ट ने पाया कि अधिवक्ता प्रकाश पांडे ने नाबालिग की उम्र की पुष्टि उसके अकादमिक रिकॉर्ड से करने का कोई प्रयास नहीं किया। पीठ ने इस पर कहा कि यह कृत्य सीधे तौर पर बाल विवाह की श्रेणी में आता है और बाल विवाह स्वयं में दंडनीय अपराध है।
कोर्ट परिसर में ही कराया गया विवाह
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि उनकी मुलाकात प्रकाश पांडे से कानपुर नगर जिला अदालत के गेट पर हुई थी। पांडे ने उन्हें अपना विजिटिंग कार्ड दिया था। इसके बाद विवाह जिला अदालत परिसर में स्थित उनके चैंबर में कराया गया। विवाह के संबंध में मूल प्रमाणपत्र और तस्वीरें भी अदालत के सामने पेश की गईं। बताया गया कि विवाह के दौरान वर-वधू ने एक-दूसरे को माला पहनाई, सिंदूर लगाया और तस्वीरें खिंचवाईं। हालांकि, साक्ष्यों के अनुसार विवाह में सप्तपदी नहीं कराई गई थी। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, विवाह कराने के लिए अधिवक्ता को 15 हजार रुपये का भुगतान भी किया गया था।
‘सप्तपदी’ को आर्य समाज के नियमों में महत्वपूर्ण माना गया
हाईकोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि आर्य समाज के नियमों और विनियमों में विवाह संस्कार के लिए सप्तपदी को महत्वपूर्ण और पवित्र माना गया है। इसके बावजूद इस मामले में विवाह किस प्रक्रिया से कराया गया, इस पर भी कोर्ट ने गंभीरता से विचार किया। कोर्ट ने पूरे मामले में अधिवक्ता की भूमिका को गंभीर मानते हुए कहा कि अदालत परिसर में स्थित किसी अधिवक्ता के चैंबर का इस्तेमाल इस तरह के विवाह के लिए नहीं किया जा सकता।
कोर्ट परिसर में चैंबर में शादी पर रोक
हाईकोर्ट ने जिला जज, कानपुर नगर को निर्देश दिया कि अधिवक्ताओं के चैंबर में कोर्ट परिसर के भीतर किसी भी तरह का विवाह समारोह आयोजित न हो। यदि कोई व्यक्ति इस तरह विवाह कराता पाया जाता है तो उसके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाए। कोर्ट ने अधिवक्ता प्रकाश पांडे के खिलाफ हाईकोर्ट की जांच में सामने आए तथ्यों और निष्कर्षों के आधार पर आपराधिक अभियोजन शुरू करने के लिए जिला जज को आवश्यक कदम उठाने का निर्देश दिया। साथ ही बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश को भी अधिवक्ता के खिलाफ उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई करने और उनका प्रैक्टिस लाइसेंस रद्द करने के संबंध में कार्रवाई करने को कहा गया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिवक्ता का पद और अदालत परिसर की गरिमा किसी भी व्यक्ति को कानून का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं देती। नाबालिग की उम्र की पुष्टि किए बिना विवाह कराना और इसके लिए अदालत परिसर के चैंबर का इस्तेमाल करना गंभीर मामला है। कोर्ट ने ऐसे कृत्य को अधिवक्ता के सम्मानित पेशे की गरिमा के विपरीत बताया।
