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भगत सिंह की आखिरी इच्छा पर बनी ‘द लास्ट मील’ फिल्म
केतकी पांडे की शॉर्ट फिल्म ‘द लास्ट मील’ भगत सिंह की फांसी से पहले की आखिरी शाम की एक भावुक कहानी को सामने लाती है। फिल्म में भगत सिंह जेल के सफाईकर्मी बोगा, जिन्हें वे ‘बेबे’ कहकर बुलाते थे, के हाथों बना मक्के की रोटी और सरसों का साग खाना चाहते हैं। यह प्रसंग केवल आखिरी भोजन की इच्छा नहीं, बल्कि जातिगत भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ इंसानियत और सामाजिक समानता का संदेश भी देता है।

शहीद भगत सिंह की जिंदगी और उनके क्रांतिकारी संघर्ष पर कई फिल्में बन चुकी हैं, लेकिन केतकी पांडे की शॉर्ट फिल्म ‘द लास्ट मील’ उनकी जिंदगी के एक बेहद भावुक और विचारोत्तेजक प्रसंग पर केंद्रित है। फिल्म का आधार भगत सिंह की फांसी से कुछ घंटे पहले के आखिरी भोजन की इच्छा है। कहानी 23 मार्च 1931 की उस शाम को सामने लाती है, जब लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी जानी थी। फिल्म में दिखाया गया है कि भगत सिंह जेल के सफाईकर्मी बोगा से अपने लिए खाना बनाने को कहते हैं। वे बोगा को प्यार से ‘बेबे’ कहकर बुलाते थे। उनकी इच्छा मक्के की रोटी और सरसों का साग खाने की होती है। लेकिन इस प्रसंग का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भोजन नहीं, बल्कि वह व्यक्ति है जिसके हाथों से भगत सिंह खाना बनवाना चाहते हैं।
जातिगत भेदभाव के खिलाफ बराबरी का संदेश
उस दौर में भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव और छुआछूत गहराई से मौजूद थे। सफाईकर्मी बोगा सामाजिक व्यवस्था में हाशिये पर खड़े व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे समय में भगत सिंह का उनके हाथों बना भोजन मांगना सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा के विचार को व्यवहार में उतारने जैसा है। फिल्म इस प्रसंग के जरिए बताती है कि इंसान की पहचान उसकी जाति या सामाजिक हैसियत से नहीं, बल्कि उसकी इंसानियत से होनी चाहिए। भगत सिंह के लिए बराबरी का विचार केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं था, बल्कि रोजमर्रा के व्यवहार में भी उसकी अहमियत थी।
कलाकारों के अभिनय ने प्रसंग को बनाया खास
फिल्म में भगत सिंह की भूमिका आकाश दहिया ने निभाई है, जबकि बोगा के किरदार में इश्तियाक खान नजर आते हैं। इश्तियाक खान अपने किरदार की झिझक और सामाजिक संकोच को सहज ढंग से प्रस्तुत करते हैं। वहीं, आकाश दहिया भगत सिंह के किरदार में दृढ़ता और शांति का संतुलन दिखाते हैं। फिल्म में भगत सिंह को केवल एक जोशीले क्रांतिकारी के रूप में नहीं दिखाया गया है, बल्कि एक ऐसे युवा के रूप में सामने लाया गया है जो अपनी अंतिम घड़ियों में भी इंसानियत और समानता के मूल्यों को महत्व देता है।
आखिरी भोजन में छिपा अपनापन
मक्के की रोटी और सरसों का साग फिल्म में केवल भोजन नहीं हैं। वे घर, अपनापन और उस सामान्य जीवन की याद दिलाते हैं, जिसे भगत सिंह कुछ ही घंटों बाद हमेशा के लिए छोड़ने वाले थे। आने वाली मौत की गंभीरता और घर के खाने की इच्छा के बीच फिल्म एक गहरा भावनात्मक संबंध बनाती है। निर्देशक केतकी पांडे ने जेल की मद्धिम रोशनी, सलाखों की परछाइयों, चाबियों की आवाज और भोजन तैयार होने के दृश्यों के जरिए उस आखिरी शाम का वातावरण रचा है। फिल्म फांसी के दृश्य को मुख्य आकर्षण बनाने के बजाय उससे पहले के शांत पलों पर ध्यान केंद्रित करती है।
आज के दौर में क्यों महत्वपूर्ण है यह फिल्म?
भगत सिंह को अक्सर उनके क्रांतिकारी संघर्ष, साहस और बलिदान के लिए याद किया जाता है। लेकिन उनके विचारों में सामाजिक न्याय, समानता और शोषण से मुक्ति जैसे सवाल भी महत्वपूर्ण थे। ‘द लास्ट मील’ इसी पहलू को सामने लाती है। फिल्म का संदेश है कि किसी क्रांतिकारी की विरासत को समझने के लिए केवल उसके बलिदान को याद करना पर्याप्त नहीं, बल्कि उन विचारों को भी समझना जरूरी है जिनके लिए उसने संघर्ष किया। ‘द लास्ट मील’ की खासियत यही है कि वह एक थाली के जरिए बराबरी, अपनापन और इंसानियत की बड़ी बात कहती है। फिल्म खत्म होने के बाद दर्शकों के मन में फांसी का दृश्य नहीं, बल्कि भगत सिंह की आखिरी शाम का वह भोजन और उससे जुड़ा समानता का विचार रह जाता है।
