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दुष्कर्म का प्रयास साबित नहीं हुआ, लेकिन महिला की गरिमा भंग करने का दोष बरकरार; पटना हाईकोर्ट का फैसला
पटना हाईकोर्ट ने विधवा के घर में घुसकर उसके ऊपर लेटने और मुंह दबाने के मामले में दुष्कर्म के प्रयास की दोषसिद्धि बदल दी। अदालत ने आरोपी को IPC की धारा 354 के तहत दोषी ठहराते हुए सजा पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दी।

पटना:
रात में एक विधवा के घर में घुसकर उसके ऊपर लेटने और उसका मुंह दबाने के मामले में पटना हाईकोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि में बदलाव किया है। अदालत ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से दुष्कर्म के प्रयास का अपराध साबित नहीं होता, क्योंकि आरोपी ने दुष्कर्म की दिशा में तैयारी से आगे बढ़कर कोई ऐसा ठोस कदम उठाया हो, यह स्थापित नहीं हुआ। हालांकि, अदालत ने उसके कृत्य को महिला की गरिमा भंग करने के इरादे से किया गया हमला मानते हुए भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354 के तहत दोषी ठहराया और सजा को उसके द्वारा पहले ही भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया। न्यायमूर्ति संदीप कुमार की एकल पीठ ने Md. Ainul Haque v. State of Bihar मामले में यह फैसला सुनाया। आरोपी ने बेगूसराय के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-V द्वारा 29 जुलाई 2013 को सुनाई गई दोषसिद्धि और 1 अगस्त 2013 के सजा आदेश को चुनौती दी थी।
क्या था पूरा मामला?
अभियोजन पक्ष के मुताबिक, 8 फरवरी 2010 की रात करीब 10 बजे एक विधवा महिला अपने बच्चों के साथ फूस के घर में सो रही थी। आरोप था कि आरोपी उसके घर में घुसा, दीपक बुझाया और महिला के ऊपर लेटकर उसका मुंह दबा दिया, ताकि वह शोर न मचा सके। महिला के चिल्लाने पर ग्रामीण इकट्ठा हुए और आरोपी को पकड़ लिया।
निचली अदालत ने आरोपी को IPC की धारा 376/511 के तहत दुष्कर्म के प्रयास के लिए चार साल के कठोर कारावास और धारा 448 के तहत घर में अनधिकृत प्रवेश के लिए छह महीने के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। दोनों सजाएं साथ-साथ चलनी थीं।
बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?
हाईकोर्ट में आरोपी की ओर से दलील दी गई कि महिला की गवाही को अन्य साक्ष्यों से पर्याप्त समर्थन नहीं मिलता। बचाव पक्ष ने बताया कि महिला के कपड़े नहीं फटे थे और उसके शरीर, बिस्तर या कपड़ों पर चोट के निशान नहीं थे। उसकी चिकित्सकीय जांच भी नहीं हुई थी। इसके अलावा, आरोपी को पकड़ने वाले ग्रामीणों में से किसी को भी गवाही के लिए अदालत में पेश नहीं किया गया था। हाईकोर्ट ने महिला की गवाही पर भरोसा करते हुए माना कि आरोपी रात में उसके घर में घुसा, दीपक बुझाया, उसके ऊपर लेटा और उसका मुंह दबाया था। लेकिन अदालत के सामने ऐसा कोई पर्याप्त साक्ष्य नहीं था, जिससे दुष्कर्म के प्रयास का अपराध साबित हो सके।
दुष्कर्म के प्रयास के लिए क्या जरूरी है?
अदालत ने पाया कि महिला ने यह नहीं कहा था कि आरोपी ने अपने या उसके कपड़े उतारे थे। कपड़े हटाने या खिसकाने अथवा प्रवेश की कोशिश करने का भी कोई साक्ष्य नहीं था। सुप्रीम कोर्ट के अमन कुमार फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अशोभनीय हमले को दुष्कर्म के प्रयास के रूप में मानने के लिए ऐसे साक्ष्य होने चाहिए, जो यह दिखाएं कि आरोपी ने अपनी यौन इच्छा पूरी करने के लिए दृढ़ इरादे से तैयारी के चरण से आगे बढ़कर कदम उठाया था। अदालत के अनुसार, आरोपी का रात में महिला के घर में घुसना, दीपक बुझाना, उसके ऊपर लेटना और मुंह दबाना महिला की गरिमा और शालीनता को ठेस पहुंचाने वाला कृत्य था। इससे IPC की धारा 354 के आवश्यक तत्व साबित होते हैं, लेकिन उपलब्ध साक्ष्य दुष्कर्म के प्रयास की दोषसिद्धि बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं थे।
13 साल से अधिक समय तक जमानत पर रहा आरोपी
हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 222(2) के तहत छोटे अपराध के लिए दोषसिद्धि की अनुमति देने वाले प्रावधान का सहारा लिया। अदालत ने आरोपी को घटना के समय लागू IPC की धारा 354 के तहत दोषी ठहराया। सजा तय करते समय अदालत ने ध्यान दिया कि घटना फरवरी 2010 की थी, आरोपी का कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था और वह 13 साल से अधिक समय तक जमानत पर रहा था। उसकी जमानत की स्वतंत्रता के दुरुपयोग की कोई प्रतिकूल रिपोर्ट भी नहीं थी। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने आरोपी की सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया और अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। इस तरह दुष्कर्म के प्रयास के लिए दी गई चार साल की सजा के स्थान पर धारा 354 के तहत दोषसिद्धि कायम रही, लेकिन आरोपी को अतिरिक्त कारावास नहीं भुगतना पड़ा।
