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पति की पहली शादी छिपाने के आरोप पर गर्भपात की अनुमति नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट ने महिला की याचिका खारिज की

बॉम्बे हाईकोर्ट ने पति द्वारा पहली शादी छिपाने के आरोप पर गर्भपात की अनुमति मांगने वाली 33 वर्षीय महिला को राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि पति की कथित धोखाधड़ी से हुआ मानसिक आघात, मौजूदा मामले के तथ्यों में, मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) अधिनियम के तहत गर्भावस्था समाप्त करने का वैध आधार नहीं है।

Sonali13 अक्टू. 2026, 03:14 PM IST
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पति की पहली शादी छिपाने के आरोप पर गर्भपात की अनुमति नहीं, बॉम्बे हाईकोर्ट ने महिला की याचिका खारिज की

बॉम्बे हाईकोर्ट ने पति द्वारा अपनी पहली शादी छिपाने का आरोप लगाने वाली 33 वर्षीय विवाहित महिला को गर्भपात की अनुमति देने से इनकार कर दिया। महिला ने दलील दी थी कि पति की कथित धोखाधड़ी से उसे गंभीर मानसिक आघात पहुंचा है और गर्भावस्था जारी रहने से उसकी मानसिक सेहत को गंभीर नुकसान हो सकता है। हालांकि, न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति आशीष चव्हाण की खंडपीठ ने कहा कि मामले के तथ्यों में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) अधिनियम, 1971 के तहत महिला को गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देने का कानूनी आधार नहीं बनता। अदालत ने महिला की याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि राहत कानून में निर्धारित प्रावधानों के दायरे में ही दी जा सकती है।

महिला ने मानसिक आघात का दिया हवाला

महिला की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि याचिकाकर्ता एक वयस्क महिला है और उसे अपने प्रजनन संबंधी फैसले लेने की स्वायत्तता प्राप्त है। पति द्वारा कथित तौर पर पहली शादी छिपाए जाने से उसे मानसिक आघात पहुंचा है। ऐसे में गर्भावस्था जारी रखने से उसकी मानसिक सेहत को गंभीर नुकसान होने की आशंका है। महिला के वकील ने MTP अधिनियम की धारा 3(2) के स्पष्टीकरण और MTP नियम, 2003 के नियम 3-B का हवाला देते हुए कहा कि महिला की मानसिक स्थिति को गंभीर नुकसान की श्रेणी में माना जाना चाहिए।

MTP अधिनियम में क्या है प्रावधान?

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में MTP अधिनियम की योजना और प्रावधानों का उल्लेख किया। धारा 3(2) के तहत निर्धारित शर्तों के अधीन 24 सप्ताह तक गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी जा सकती है, यदि गर्भावस्था जारी रहने से महिला की जान को खतरा हो, उसके शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान होने की आशंका हो या बच्चे में गंभीर शारीरिक अथवा मानसिक असामान्यता होने का पर्याप्त जोखिम हो। अधिनियम के स्पष्टीकरण के अनुसार, दुष्कर्म के कारण हुई गर्भावस्था से उत्पन्न मानसिक पीड़ा को गंभीर मानसिक चोट माना जाता है। इसी तरह, गर्भनिरोधक साधन या तरीके की विफलता से हुई गर्भावस्था के मामले में भी ऐसी मानसिक पीड़ा को गंभीर मानसिक चोट माना गया है। वहीं, नियम 3-B में उन श्रेणियों का उल्लेख है, जिनकी महिलाएं निर्धारित शर्तों के तहत 24 सप्ताह तक गर्भावस्था समाप्त कराने के लिए पात्र हो सकती हैं। इनमें दुष्कर्म या यौन हमले की पीड़िताएं, नाबालिग, गर्भावस्था के दौरान विधवा होने या तलाक के कारण वैवाहिक स्थिति बदलने वाली महिलाएं, कुछ दिव्यांग महिलाएं, मानसिक रूप से बीमार महिलाएं, भ्रूण में गंभीर असामान्यता वाले मामले और सरकार द्वारा घोषित मानवीय संकट या आपातकालीन परिस्थितियों में गर्भवती महिलाएं शामिल हैं।

पति की कथित धोखाधड़ी नियम 3-B की श्रेणी में नहीं

अदालत ने पाया कि महिला ने विधवा होने या तलाक के कारण वैवाहिक स्थिति बदलने का दावा नहीं किया था। न ही वह नियम 3-B में दी गई किसी अन्य पात्र श्रेणी के अंतर्गत आती थी। खंडपीठ ने यह भी कहा कि पति द्वारा धोखाधड़ी किए जाने का आरोप अभी केवल आरोपों के स्तर पर था और इस संबंध में कोई न्यायिक निष्कर्ष सामने नहीं था। महिला ने भ्रूण में किसी असामान्यता का भी दावा नहीं किया था। अदालत के अनुसार, MTP अधिनियम और उसके नियमों में ऐसी परिस्थिति को गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति के लिए अलग पात्र श्रेणी के रूप में शामिल नहीं किया गया है।

अदालत ने याचिका खारिज की

खंडपीठ ने महिला की परिस्थिति के प्रति सहानुभूति जताई, लेकिन कहा कि मौजूदा मामले के तथ्यों में MTP अधिनियम के तहत उसे कानूनी राहत नहीं दी जा सकती। अदालत ने महिला की मांगें खारिज कर दीं और रिट याचिका को खारिज करते हुए नियम को समाप्त कर दिया। मामले में न्यायमूर्ति आशीष एस. चव्हाण और न्यायमूर्ति भारती डांगरे की खंडपीठ ने आदेश पारित किया।