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दिल्ली में पुलिस कार्रवाई और SIR के विरोध में मुंबई के वकील सड़क पर उतरे, मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग
बॉम्बे हाईकोर्ट के बाहर 50 से अधिक वकीलों ने संविधान की प्रस्तावना पढ़कर प्रतीकात्मक विरोध दर्ज कराया। अधिवक्ताओं ने दिल्ली में प्रदर्शनकारियों की कथित अवैध हिरासत, पुलिस कार्रवाई और SIR के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने पर सवाल उठाए। पुलिस ने उन्हें निर्धारित प्रदर्शन स्थल आजाद मैदान जाने को कहा।

बॉम्बे हाईकोर्ट के बाहर सोमवार, 12 अक्टूबर को 50 से अधिक वकीलों ने संविधान की रक्षा और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार के समर्थन में प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया। दक्षिण मुंबई के फ्लोरा फाउंटेन स्थित हुतात्मा चौक पर जुटे वकीलों ने संविधान की प्रस्तावना पढ़ी और राष्ट्रगान गाया। प्रदर्शन में शामिल वकीलों ने दिल्ली में प्रदर्शनकारियों की कथित अवैध हिरासत और पुलिस की कार्रवाई पर विरोध जताया। उन्होंने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मुद्दे को भी उठाया और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। हालांकि, मौके पर तैनात पुलिस ने वकीलों से स्थान खाली कर निर्धारित प्रदर्शन स्थल आजाद मैदान जाने को कहा।
चार वकीलों से शुरू हुआ प्रदर्शन, धीरे-धीरे जुटे 50 से अधिक अधिवक्ता
रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शन की शुरुआत में मौके पर केवल चार वकील मौजूद थे। बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले 50 से अधिक अधिवक्ता वहां पहुंच गए। इनमें ज्यादातर युवा महिला वकील थीं। उनका उद्देश्य संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक पाठ करना और राष्ट्रगान गाकर लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करना था। हालांकि, सोमवार दोपहर से ही हाईकोर्ट की इमारत के बाहर भारी पुलिस बल तैनात था। वकीलों के जुटने पर पुलिस ने उन्हें वहां से हटकर मुंबई के निर्धारित प्रदर्शन स्थल आजाद मैदान जाने को कहा, जो हाईकोर्ट से लगभग 10 मिनट की दूरी पर है। प्रदर्शनकारी वकीलों ने पुलिस की कार्रवाई पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि वे शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना चाहते थे।
दिल्ली में पुलिस कार्रवाई और हिरासत का विरोध
प्रदर्शन में शामिल अधिवक्ता संस्कृति याज्ञनिक ने कहा कि उनका विरोध दिल्ली में प्रदर्शनकारियों के साथ हुई घटनाओं के समर्थन में था। उन्होंने आरोप लगाया कि दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे लोगों को अवैध रूप से हिरासत में लिया गया और पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया। याज्ञनिक ने यह भी कहा कि वकील विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से कथित तौर पर मनमाने ढंग से नाम हटाए जाने का विरोध करना चाहते थे। इसी मुद्दे पर उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी उठाई। गौरतलब है कि SIR चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया को लेकर उठे विवाद और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई के आरोपों ने कानूनी समुदाय के बीच भी विरोध को जन्म दिया।
पुलिस ने हाईकोर्ट के निर्देशों का दिया हवाला
वकीलों के मुताबिक, मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने प्रदर्शन रोकने के लिए हाईकोर्ट के कुछ निर्देशों का हवाला दिया। इस पर अधिवक्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश का उल्लेख किया। हालांकि, मौके पर मौजूद एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने जवाब दिया कि जिस आदेश का हवाला दिया जा रहा है, वह दिल्ली में हो रहे प्रदर्शनों से संबंधित था, मुंबई में होने वाले प्रदर्शन से नहीं इस दौरान पुलिस की भारी तैनाती बनी रही। आखिरकार, वकीलों ने सामूहिक रूप से संविधान की प्रस्तावना पढ़ी और वहां से चले गए। LiveLaw की रिपोर्ट के अनुसार, इसके बाद भी बॉम्बे हाईकोर्ट के बाहर पुलिस बल तैनात रहा।
'लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए सड़कों पर उतरना जरूरी'
प्रदर्शनकारी महिला वकीलों का समर्थन करने वाले अधिवक्ता विजय कुर्ले ने कहा कि सड़कों पर विरोध करने वाले लोग अपने वर्तमान और भविष्य की सुरक्षा को लेकर चिंता जाहिर कर रहे हैं। उन्होंने देश की संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और संविधान में निहित कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि नागरिकों की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा करनी है, तो लोगों को अपनी आवाज उठानी होगी। प्रदर्शन में शामिल अधिवक्ता कविशा खन्ना ने भी शांतिपूर्ण विरोध और असहमति व्यक्त करने के अधिकार को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया। उनके अनुसार, किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को अपनी असहमति व्यक्त करने का अधिकार मिलना जरूरी है।
प्रस्तावना पढ़कर समाप्त किया प्रदर्शन
पुलिस की आपत्ति और स्थान खाली करने के निर्देशों के बीच वकीलों ने संविधान की प्रस्तावना का सामूहिक पाठ किया और राष्ट्रगान गाया। इसके बाद प्रदर्शन समाप्त हो गया।
यह प्रदर्शन ऐसे समय हुआ, जब दिल्ली में SIR और मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ विरोध के दौरान वकीलों तथा अन्य प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने और पुलिस की कथित ज्यादती को लेकर कानूनी समुदाय में नाराजगी सामने आई थी। मुंबई में हुए इस प्रतीकात्मक विरोध के जरिए वकीलों ने संविधान, लोकतांत्रिक अधिकारों और शांतिपूर्ण असहमति के महत्व को रेखांकित किया।
