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POCSO मामले में हाईकोर्ट का आदेश, नाबालिग जोड़ों के कानून से लेकर लड़की की शिक्षा तक पर उठाए सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने POCSO मामले में लड़की को युवक के साथ जाने की अनुमति देते हुए नाबालिग जोड़ों से जुड़े कानून की समीक्षा के लिए विधि आयोग से सुझाव मांगे। सुनवाई के दौरान पांचवीं तक पढ़ी लड़की के हिंदी अखबार न पढ़ पाने पर अदालत ने यूपी की शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए।

Sonali13 अक्टू. 2026, 03:34 PM IST
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POCSO मामले में हाईकोर्ट का आदेश, नाबालिग जोड़ों के कानून से लेकर लड़की की शिक्षा तक पर उठाए सवाल

यह मामला राकेश यादव उर्फ पप्पू एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, लड़की वर्ष 2025 में युवक के साथ घर से चली गई थी। दोनों ने 1 सितंबर 2025 को एक हलफनामा बनवाया था, जिसमें उन्होंने खुद को पति-पत्नी बताया था। बाद में लड़की ने एक बच्चे को जन्म दिया। मामले में POCSO कानून के तहत आपराधिक मुकदमा लंबित है। लड़की को बरामद किए जाने के बाद बाल गृह भेजा गया था। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) दायर कर लड़की को अदालत के सामने पेश करने और उसे युवक के साथ जाने की अनुमति देने की मांग की। याचिका पर जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने सुनवाई की।

उम्र को लेकर क्या सामने आया?

सुनवाई के दौरान राज्य और लड़की के पिता की ओर से बताया गया कि लड़की की जन्मतिथि 25 जुलाई 2010 है। हालांकि, अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में स्कूल की ओर से जारी जन्मतिथि का प्रमाणपत्र या नगर निकाय अथवा पंचायत का जन्म प्रमाणपत्र मौजूद नहीं था। दूसरी ओर, अस्थि परीक्षण (Ossification Test) के आधार पर लड़की की उम्र लगभग 18 वर्ष आंकी गई थी। हाईकोर्ट ने किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 94(2) का उल्लेख करते हुए लड़की को वयस्क माना। अदालत के सामने लड़की ने युवक के साथ रहने की इच्छा जताई। इसके बाद हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए उसे युवक के साथ जाने की अनुमति दे दी।

POCSO कानून में बदलाव पर विचार करे विधि आयोग

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने नाबालिगों के बीच संबंधों से जुड़े POCSO कानून के प्रावधानों पर भी चिंता जताई। अदालत ने विधि आयोग से इन प्रावधानों की समीक्षा करने और संभावित संशोधनों पर सुझाव देने का अनुरोध किया। खंडपीठ ने कहा कि कानून के प्रावधानों पर विचार करते समय भारतीय समाज की वास्तविक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। अदालत ने इस पहलू पर विचार करने को कहा कि कुछ असाधारण मामलों में विशेष न्यायाधीशों को सजा तय करते समय मामले की परिस्थितियों के आधार पर पर्याप्त विवेकाधिकार दिया जा सकता है या नहीं। अदालत ने सामुदायिक सेवा (Community Service) जैसे वैकल्पिक दंडों की संभावना पर भी विचार करने का सुझाव दिया। विशेष रूप से ऐसे मामलों में, जहां नाबालिगों के संबंध से बच्चा पैदा हो चुका हो, कानून लागू करने के परिणामों और परिवार की परिस्थितियों पर विचार करने की जरूरत पर जोर दिया गया। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि हाईकोर्ट ने POCSO कानून में कोई संशोधन नहीं किया है। विधि आयोग से केवल इस विषय पर विचार कर सुझाव देने का अनुरोध किया गया है।

पांचवीं तक पढ़ी लड़की हिंदी अखबार भी नहीं पढ़ सकी

POCSO मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने लड़की की शिक्षा को लेकर भी गंभीर चिंता जताई। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने लड़की से पूछा कि क्या वह हिंदी अखबार पढ़ सकती है। लड़की ने बताया कि वह अखबार नहीं पढ़ सकती। जब अदालत ने उससे पूछा कि क्या वह अपना नाम लिख सकती है, तो उसने हां कहा। लेकिन अपने नाम के अलावा हिंदी में कुछ और लिखने के सवाल पर उसने असमर्थता जताई। रिकॉर्ड के अनुसार, लड़की ने पांचवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी। इसके बावजूद हिंदी पढ़ने और लिखने में उसकी असमर्थता पर अदालत ने सवाल उठाया कि उसकी पढ़ाई आगे क्यों नहीं जारी रह सकी। खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर चिंता जताते हुए कहा कि राज्य की जिम्मेदारी केवल बच्चे का स्कूल में दाखिला कराने तक सीमित नहीं है। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि बच्चे अपनी पढ़ाई पूरी कर सकें, उन्हें सार्थक शिक्षा मिले और वे भविष्य में आत्मनिर्भर बन सकें।

पिता ने बताई आर्थिक मजबूरी

सुनवाई के दौरान लड़की के पिता ने अदालत को बताया कि वह निरक्षर हैं और मजदूरी करके हर महीने लगभग 10,000 से 12,000 रुपये कमाते हैं। परिवार में वही एकमात्र कमाने वाले सदस्य हैं। उन्हें चार बच्चों और अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल भी करनी पड़ती है। अदालत ने इन परिस्थितियों को सामाजिक पृष्ठभूमि के लिहाज से महत्वपूर्ण माना। खंडपीठ ने कहा कि समाज के कई लोगों को कानून और संविधान से मिले अधिकारों के साथ-साथ कानूनी दायित्वों तथा उनके उल्लंघन के परिणामों की पर्याप्त जानकारी नहीं होती। अदालत ने जोर दिया कि बच्चों को सार्थक शिक्षा देना और उन्हें स्कूल में बनाए रखना राज्य की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। खंडपीठ ने सवाल उठाया कि लड़की पांचवीं कक्षा के बाद पढ़ाई क्यों जारी नहीं रख सकी और राज्य उसे आगे की शिक्षा उपलब्ध कराने में क्यों सफल नहीं हुआ।

लंबित POCSO मुकदमे पर अदालत का स्पष्ट निर्देश

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका की सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणियों को लंबित POCSO मुकदमे में अंतिम निर्णय का आधार नहीं बनाया जाएगा।

विचारण अदालत को निर्देश दिया गया कि वह मामले का फैसला कानून के अनुसार और केवल उस मुकदमे में पेश किए गए साक्ष्यों के आधार पर करे। इस प्रकार, हाईकोर्ट ने लड़की को युवक के साथ जाने की अनुमति देने के साथ नाबालिग जोड़ों से जुड़े POCSO प्रावधानों की समीक्षा का विषय विधि आयोग के सामने रखा। साथ ही, लड़की की शिक्षा की स्थिति को लेकर उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की जवाबदेही पर भी सवाल उठाए।