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सुप्रीम कोर्ट ने कहा- फॉर्म-6 को न मंजूरी दी, न खारिज किया; टिप्पणियों का गलत मतलब न निकालें

सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 को लेकर स्थिति स्पष्ट की है। कोर्ट ने कहा कि उसने चुनाव आयोग के नए फॉर्म-6 को न मंजूरी दी है और न ही खारिज किया है। इस मामले पर 27 अक्टूबर को मुख्य याचिकाओं के साथ सुनवाई होगी।

Kashish Rai13 अक्टू. 2026, 03:34 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा- फॉर्म-6 को न मंजूरी दी, न खारिज किया; टिप्पणियों का गलत मतलब न निकालें

सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 को लेकर चल रहे विवाद पर स्थिति स्पष्ट कर दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि अदालत ने चुनाव आयोग के नए फॉर्म-6 को न तो मंजूरी दी है और न ही खारिज किया है। कोर्ट ने अपनी पिछली टिप्पणियों का गलत अर्थ नहीं निकालने की भी हिदायत दी। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि चुनाव आयोग यह बता रहा है कि नए फॉर्म-6 को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिली है। इस पर न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि जब बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) मामले की सुनवाई हुई थी, तब नया फॉर्म-6 आया ही नहीं था।


मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि इस मुद्दे को अदालत के संज्ञान में लाया गया है। इस पर 27 अक्टूबर को मुख्य याचिकाओं के साथ विचार किया जाएगा। इसके अलावा, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर दाखिल एक अन्य याचिका को भी सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले से जुड़ी प्रमुख याचिकाओं के साथ जोड़ दिया है। फॉर्म-6 मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला आवेदन है। यह पंजीकरण संबंधी नियमों के तहत वैधानिक आवेदन है, जिसके जरिए पात्र भारतीय नागरिक मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं। विवाद पूरे फॉर्म-6 को लेकर नहीं, बल्कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के दौरान इसके साथ जोड़े गए अतिरिक्त घोषणापत्र को लेकर है। कुछ नेताओं ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग ने इस घोषणापत्र के जरिए फॉर्म में मनमाने बदलाव किए हैं।


SIR प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग के ऑनलाइन पोर्टल पर फॉर्म-6 के साथ एक अतिरिक्त घोषणापत्र जोड़ा गया था। इसमें नए आवेदकों से तीन तरह की जानकारी मांगी जा रही थी। पहला सवाल यह था कि क्या आवेदक का नाम 2000 के दशक की मतदाता सूची में शामिल था। दूसरा सवाल उन आवेदकों से जुड़ा था, जिनका नाम पुरानी सूची में नहीं था। उनसे पूछा जा रहा था कि क्या उनके माता-पिता या दादा-दादी अथवा नाना-नानी का नाम वर्ष 2003 की मतदाता सूची में शामिल था। तीसरे सवाल में परिवार के सदस्यों का नाम पिछली मतदाता सूची में शामिल नहीं होने का कारण पूछा जा रहा था। इन्हीं अतिरिक्त सवालों और घोषणापत्र को लेकर विवाद खड़ा हुआ है। अब सुप्रीम कोर्ट 27 अक्टूबर को मुख्य याचिकाओं के साथ इस मुद्दे पर भी विचार करेगा। अदालत के फैसले से यह स्पष्ट हो सकेगा कि अतिरिक्त घोषणापत्र को लेकर उठाई गई आपत्तियों पर क्या रुख अपनाया जाता है।