law-order
डोंबिवली पूर्व के अशोका लॉज में कथित देह व्यापार के मामले में 14 साल बाद फैसला, होटल मैनेजर और संचालक बरी
डोंबिवली पूर्व के गोलवली स्थित अशोका लॉज में कथित देह व्यापार के मामले में कल्याण कोर्ट ने करीब 14 साल बाद होटल मैनेजर और संचालक को बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित नहीं कर सका। गवाहों की कमी और जांच अधिकारी के पेश न होने के कारण दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ मिला।

यह मामला 13 अगस्त 2012 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मानपाड़ा पुलिस को सूचना मिली थी कि डोंबिवली पूर्व के गोलवली गांव स्थित अशोका बार एंड रेस्टोरेंट तथा लॉजिंग-बोर्डिंग में ग्राहकों को महिलाओं की आपूर्ति कर कथित तौर पर देह व्यापार कराया जा रहा है। पुलिस ने कार्रवाई के लिए एक नकली ग्राहक तैयार किया और उसे 500 रुपये का नोट देकर होटल भेजा। अभियोजन के मुताबिक, नकली ग्राहक को होटल के कमरे में भेजने के लगभग 15 से 20 मिनट बाद पुलिस टीम ने वहां छापा मारा। पुलिस के अनुसार, होटल के कैशियर के ड्रॉअर से 500 रुपये का वही नोट मिला, जो नकली ग्राहक को दिया गया था। इसके बाद पुलिस ने होटल के कमरों की जांच की। अभियोजन पक्ष का दावा था कि कमरे नंबर 207 में एक महिला नकली ग्राहक के साथ मिली, जबकि कमरे नंबर 104 में एक अन्य महिला मौजूद थी। दोनों महिलाओं को कथित देह व्यापार से मुक्त कराया गया। इस मामले में होटल मैनेजर हरीश संकप्पा रई और होटल संचालक प्रसाद जनार्दन शेट्टी को आरोपी बनाया गया था। पुलिस ने उनके खिलाफ महिलाओं और लड़कियों के अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम, 1956 की धारा 3, 4, 5 और 7 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया था।
अदालत में अभियोजन पक्ष क्या साबित नहीं कर सका?
कल्याण के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, न्यायालय क्रमांक 3 के पीठासीन अधिकारी निलेश प्रभाकर वासाडे ने 12 अक्टूबर 2026 को फैसला सुनाया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने केवल शिकायतकर्ता और पुलिस हवलदार चंद्रकांत नारायण खसपे की गवाही दर्ज कराई। उन्होंने छापेमारी की कार्रवाई और मौके पर मिली महिलाओं के बारे में बताया, लेकिन वे आरोपियों की पहचान और उनके द्वारा अपराध किए जाने के संबंध में ठोस गवाही नहीं दे सके। उन्होंने अदालत में यह भी कहा कि उन्हें आरोपियों के बारे में याद नहीं है। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि अभियोजन पक्ष अन्य स्वतंत्र गवाहों और मामले के जांच अधिकारी को न्यायालय में पेश नहीं कर सका। इस कारण आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य सामने नहीं आए।
14 साल से लंबित था मामला
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार, मामले में प्राथमिकी 13 अगस्त 2012 को दर्ज हुई थी और आरोपपत्र 31 दिसंबर 2012 को दाखिल किया गया था। आरोप 18 जनवरी 2013 को तय किए गए थे। करीब 14 साल बाद, 12 अक्टूबर 2026 को अदालत ने अंतिम फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि आरोपियों के खिलाफ आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए हैं। इसी आधार पर दोनों आरोपियों को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 248(1) के तहत सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। न्यायालय ने जब्त की गई 500 रुपये और 700 रुपये की नकदी को अपील की अवधि समाप्त होने के बाद सरकारी खाते में जमा करने का आदेश भी दिया। यह फैसला अभियोजन पक्ष द्वारा पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर पाने के आधार पर दिया गया है। अदालत ने आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया।
