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58 फर्जी NSS सर्टिफिकेट से बैंक से लोन लेने का मामला, कल्याण कोर्ट ने 25 साल बाद सुनाया फैसला

कल्याण में फर्जी NSS सर्टिफिकेट के जरिए सहकारी बैंक से 2.32 लाख रुपये का लोन लेने के मामले में 25 साल बाद अदालत ने आरोपी को तीन अपराधों में दोषी ठहराया। कोर्ट ने प्रत्येक अपराध में 2 साल की सजा और 10-10 हजार रुपये जुर्माना लगाया। साथ ही, आरोपी को परिवीक्षा (Probation) का लाभ देने से इनकार कर दिया।

Sonali13 अक्टू. 2026, 03:16 PM IST
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58 फर्जी NSS सर्टिफिकेट से बैंक से लोन लेने का मामला, कल्याण कोर्ट ने 25 साल बाद सुनाया फैसला

कल्याण में फर्जी पोस्ट ऑफिस सर्टिफिकेट के जरिए सहकारी बैंक से 2.32 लाख रुपये का लोन लेने के मामले में अदालत ने आरोपी साईनाथ लक्ष्मण आष्टेकर को धोखाधड़ी और जालसाजी के तीन अपराधों में दोषी ठहराया है। कल्याण की प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने प्रत्येक अपराध में दो-दो साल के साधारण कारावास और 10-10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। तीनों सजाएं एक साथ चलेंगी, इसलिए कारावास की अवधि कुल दो साल होगी। वर्ष 2001 में दर्ज इस मामले में अदालत ने 9 अक्टूबर 2026 को फैसला सुनाया। मामला विष्णुनगर पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध क्रमांक I-58/2001 से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, 24 मई 2001 को साईनाथ लक्ष्मण आष्टेकर जनसेवक नागरी सहकारी बैंक में लोन की जानकारी लेने पहुंचा था। उसने बैंक को बताया कि उसके पास राष्ट्रीय बचत योजना (NSS) के 2.90 लाख रुपये मूल्य के प्रमाणपत्र हैं और वह इनके आधार पर लोन लेना चाहता है। बैंक की तत्कालीन मैनेजर अपूर्वा उदय माल्शे ने उसे बताया कि प्रमाणपत्रों के मूल्य का 80 प्रतिशत, यानी करीब 2.32 लाख रुपये तक का लोन दिया जा सकता है। इसके बाद आरोपी 58 NSS प्रमाणपत्र लेकर बैंक पहुंचा और लोन के लिए आवेदन किया। 25 मई 2001 को प्रमाणपत्र बैंक में जमा किए गए। बैंक की मैनेजर ने लोन की प्रक्रिया के तहत चेक तैयार कर हस्ताक्षर के लिए चेयरमैन के पास भेजा। हालांकि, चेयरमैन को प्रमाणपत्रों की वास्तविकता पर संदेह हुआ और उन्होंने आरोपी को चेक देने से रोक दिया। बैंक के कर्मचारी ने प्रमाणपत्रों की जांच के लिए मुंबई के सांताक्रूज पोस्ट ऑफिस से संपर्क किया। वहां से पता चला कि संबंधित प्रमाणपत्र डाकघर द्वारा जारी नहीं किए गए थे। इसके बाद बैंक ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराने का निर्णय लिया। 1 जून 2001 को विष्णुनगर पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया। पुलिस जांच के दौरान आरोपी ने कथित तौर पर बताया कि उसे ये प्रमाणपत्र दूसरे आरोपी रमेश उर्फ रमेशकुमार उर्फ जयकुमार उर्फ विनोदकुमार उर्फ बसंतिलाल उर्फ पेलादराज जैन से मिले थे। दूसरे आरोपी के फरार होने के बाद उसके खिलाफ सुनवाई अलग कर दी गई। मुकदमे के दौरान बैंक की मैनेजर, चेयरमैन, एक क्लर्क और जांच अधिकारी ने अदालत में गवाही दी। अभियोजन ने लोन आवेदन, चेक, बैंक के दस्तावेज और पोस्ट ऑफिस से मिले जवाब को साक्ष्य के रूप में पेश किया। आरोपी के हस्ताक्षर की जांच से संबंधित हस्तलेखन विशेषज्ञ की रिपोर्ट साबित नहीं हो सकी, लेकिन अदालत ने अन्य मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों को दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त माना। न्यायाधीश नीलेश प्रभाकर वासडे की अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (जालसाजी) और 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी) के तहत दोषी ठहराया। हालांकि, धारा 511 (अपराध करने का प्रयास) के तहत उसे बरी कर दिया गया, क्योंकि अदालत के अनुसार धोखाधड़ी और जालसाजी का अपराध पूरा हो चुका था। अदालत ने आरोपी को परिवीक्षा (Probation) का लाभ देने से भी इनकार कर दिया। इस तरह, करीब 25 साल पुराने मामले में अदालत ने फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिए बैंक से लोन लेने के प्रयास पर दोषसिद्धि दर्ज करते हुए सजा सुनाई।