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IMF की चेतावनी: AI में निवेश घटने से शेयर बाजार और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है असर
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने चेतावनी दी है कि AI में निवेश कम होने से शेयर बाजार और दुनिया की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ सकता है। इसके अलावा, बढ़ता सरकारी कर्ज, युद्ध और तेल की बढ़ती कीमतें भी वैश्विक आर्थिक विकास के लिए बड़ी चुनौती हैं।

बैंकॉक: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता जताई है। संस्था के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) में निवेश में संभावित गिरावट, बढ़ता कर्ज और मध्य पूर्व में जारी संघर्ष आने वाले समय में वैश्विक आर्थिक विकास तथा वित्तीय स्थिरता के लिए गंभीर चुनौती बन सकते हैं। IMF की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने अंतरराष्ट्रीय नेताओं से इन चुनौतियों का सामना करने के लिए सहयोग बढ़ाने की अपील की है। यह चेतावनी ऐसे समय आई है, जब दुनिया के कई देश महंगाई, ऊर्जा की बढ़ती कीमतों और ऊँची ब्याज दरों जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
1. वैश्विक आर्थिक विकास का अनुमान
IMF ने वर्ष 2026 के लिए वैश्विक आर्थिक विकास दर का अनुमान बढ़ाकर 3.1 प्रतिशत कर दिया है। इससे पहले जुलाई में यह अनुमान 3 प्रतिशत था। वहीं, वर्ष 2027 के लिए वैश्विक विकास दर 3.4 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। हालाँकि, IMF ने स्पष्ट किया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की स्थिति को लेकर अत्यधिक आशावादी नहीं होना चाहिए। आर्थिक विकास की गति पर युद्ध, ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता का असर पड़ सकता है।
2. AI में निवेश घटने का खतरा
पिछले कुछ वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी तकनीकों और बुनियादी ढाँचे में निवेश तेजी से बढ़ा है। इस निवेश ने आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन IMF ने चेतावनी दी है कि यदि AI से अपेक्षित लाभ नहीं मिलता और कंपनियाँ अपना निवेश कम कर देती हैं, तो शेयर बाजार में बड़ी गिरावट आ सकती है। IMF के एक संभावित जोखिम-आकलन के अनुसार, AI में निवेश में तेज गिरावट आने से वर्ष 2028 तक वैश्विक GDP में 1.1 प्रतिशत तक की कमी हो सकती है।
3. मध्य पूर्व का संघर्ष और ऊर्जा संकट
मध्य पूर्व में जारी संघर्ष का असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों पर भी पड़ रहा है। तेल की कीमतों में वृद्धि से परिवहन, उत्पादन और वस्तुओं की आपूर्ति महँगी हो सकती है। IMF के अनुसार, यदि संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है और तेल की कीमतें ऊँची बनी रहती हैं, तो वैश्विक आर्थिक विकास की गति और धीमी हो सकती है।
इसका प्रभाव विशेष रूप से उन देशों पर पड़ सकता है, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं।
4. बढ़ता सरकारी कर्ज भी चिंता का विषय
IMF ने दुनिया के कई देशों में बढ़ते सरकारी कर्ज और उधार की लागत को लेकर भी चिंता जताई है। जब सरकारों पर कर्ज का बोझ बढ़ता है, तो ब्याज भुगतान पर अधिक धन खर्च करना पड़ सकता है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढाँचे और सामाजिक कल्याण जैसे क्षेत्रों के लिए उपलब्ध संसाधन सीमित हो सकते हैं। इसके अलावा, ऊँची ब्याज दरें कंपनियों के लिए निवेश और आम लोगों के लिए ऋण लेना महँगा बना सकती हैं।
5. भारत पर क्या पड़ सकता है असर?
कच्चे तेल की कीमतें: तेल महँगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ सकता है।
महँगाई: ईंधन और परिवहन की लागत बढ़ने से वस्तुओं की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।
रुपये की विनिमय दर: वैश्विक वित्तीय अनिश्चितता से रुपये पर दबाव पड़ सकता है।
निर्यात और निवेश: वैश्विक मांग कमजोर होने पर भारतीय कंपनियों के कारोबार पर असर पड़ सकता है।
AI क्षेत्र: AI में निवेश जारी रहने से भारतीय तकनीकी कंपनियों को अवसर मिल सकते हैं, लेकिन निवेश में गिरावट से जोखिम भी बढ़ सकते हैं।
IMF की चेतावनी से स्पष्ट है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के सामने अवसरों के साथ कई महत्वपूर्ण जोखिम भी मौजूद हैं। AI तकनीक आर्थिक विकास को गति दे सकती है, लेकिन इसमें अत्यधिक निवेश और संभावित वित्तीय अस्थिरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बढ़ते कर्ज, भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा संकट से निपटने के लिए देशों के बीच सहयोग, संतुलित आर्थिक नीतियाँ और जिम्मेदार वित्तीय प्रबंधन आवश्यक हैं।
