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स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा से समझौता नहीं! सुप्रीम कोर्ट ने सेफ-अनसेफ टच और यौन शोषण पर जागरूकता के दिए निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों को शुरुआती कक्षाओं से ही सुरक्षित-असुरक्षित स्पर्श, सहमति और अपने शरीर की सुरक्षा के बारे में जागरूक करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने स्कूलों में शिक्षकों को ग्रूमिंग और यौन शोषण के संकेत पहचानने की ट्रेनिंग देने तथा चाइल्ड प्रोटेक्शन हेल्पलाइन की जानकारी प्रदर्शित करने पर जोर दिया है।

बच्चों को यौन शोषण और ऑनलाइन अपराधों से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों, शिक्षकों, अभिभावकों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारियों पर जोर दिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि बच्चों को शुरुआती कक्षाओं से ही सुरक्षित-असुरक्षित स्पर्श, सहमति और डिजिटल सुरक्षा की जानकारी दी जाए। हर कक्षा, छात्रावास, पुस्तकालय और कंप्यूटर लैब में चाइल्ड हेल्पलाइन की जानकारी प्रदर्शित करने के साथ शिक्षकों को शोषण के संकेत पहचानने का प्रशिक्षण भी दिया जाए।
उम्र के अनुसार बच्चों को दी जाए यौन शिक्षा
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 15 अक्टूबर 2026 के आदेश में कहा कि बच्चों को कम उम्र से ही अपने शरीर, व्यक्तिगत सुरक्षा और दूसरों की गरिमा का सम्मान करना सिखाना जरूरी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि डिजिटल सुरक्षा और उम्र के अनुरूप यौन शिक्षा को अलग-अलग विषयों की तरह नहीं देखा जा सकता। बच्चों को समझाया जाना चाहिए कि सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श में क्या अंतर है, सहमति का क्या महत्व है और किसी व्यक्ति का अनुचित व्यवहार पहचानने पर किससे मदद मांगी जाए। उन्हें यह भी बताया जाए कि किसी अप्रिय घटना की जानकारी देने पर उन्हें दोषी नहीं ठहराया जाएगा और उनकी बात गोपनीयता के साथ सुनी जाएगी।
स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल होगी डिजिटल सुरक्षा
अदालत ने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) और राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषदों (SCERTs) को विशेषज्ञों की सलाह से डिजिटल सुरक्षा और उम्र के अनुरूप यौन शिक्षा की सामग्री तैयार करने का निर्देश दिया है। इसमें इंटरनेट पर अनजान लोगों से संपर्क, निजी तस्वीरों और जानकारी का दुरुपयोग, ऑनलाइन धमकी, ब्लैकमेल तथा ग्रूमिंग जैसे खतरों के बारे में बताया जाएगा। ग्रूमिंग का मतलब है किसी बच्चे का भरोसा जीतकर उसे धीरे-धीरे शोषण या अनुचित गतिविधि के लिए तैयार करना।
हर कक्षा में हेल्पलाइन नंबर प्रदर्शित करने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने शैक्षणिक संस्थानों को चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर 1098, साइबर क्राइम हेल्पलाइन नंबर 1930 और राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल की जानकारी प्रदर्शित करने का निर्देश दिया है। यह जानकारी स्कूलों की वेबसाइटों पर भी उपलब्ध करानी होगी। स्कूलों और शिक्षण संस्थानों के कंप्यूटर तथा इंटरनेट नेटवर्क में हानिकारक सामग्री तक पहुंच रोकने के लिए उचित फिल्टर लगाने को भी कहा गया है। ये सुरक्षा उपाय छात्रावासों, बाल देखभाल संस्थानों, ट्यूशन और कोचिंग सेंटरों में भी लागू किए जाने हैं।
शिक्षकों और अभिभावकों की जिम्मेदारी भी तय
कोर्ट ने शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को बच्चों में यौन शोषण, ग्रूमिंग और ऑनलाइन उत्पीड़न के संकेत पहचानने की ट्रेनिंग देने को कहा है। किसी बच्चे के शिकायत करने पर कर्मचारी किस तरह प्रतिक्रिया दें, POCSO Act के तहत रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी क्या है और बच्चे की पहचान गोपनीय कैसे रखी जाए, यह भी प्रशिक्षण का हिस्सा होगा। अभिभावकों के लिए नियमित जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करने के निर्देश भी दिए गए हैं। इनमें पैरेंटल कंट्रोल, ऑनलाइन सुरक्षा सेटिंग्स और बच्चे के व्यवहार में परेशानी के संकेत पहचानने की जानकारी दी जाएगी।
पीड़ित बच्चों को मुफ्त काउंसलिंग और सहायता
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को यौन शोषण या उत्पीड़न के पीड़ित बच्चों के लिए मुफ्त काउंसलिंग, मनोवैज्ञानिक सहायता और थेरेपी की व्यवस्था करने को कहा है। यह सहायता जरूरत के अनुसार लंबे समय तक उपलब्ध कराई जानी चाहिए। अदालत ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों को भी बच्चों की सुरक्षा के लिए चेतावनी संदेश, गोपनीयता सेटिंग्स और मदद के विकल्प उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। बच्चों के अनजान वयस्कों से संपर्क करने पर उचित सुरक्षा चेतावनी दिखाने पर भी जोर दिया गया है।
यह मामला Just Rights for Children Alliance & Anr. v. S. Harish & Ors. से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इन निर्देशों और सुरक्षा उपायों को लागू करने की प्रगति पर हलफनामा दाखिल करने को कहा है। मामले में अगली सुनवाई 10 दिसंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
