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रिश्वत मांगने पर सरकारी संरक्षण नहीं! सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया—जांच के लिए पूर्व मंजूरी जरूरी नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी कर्मचारी के रिश्वत मांगने के आरोप में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत जांच शुरू करने से पहले पूर्व मंजूरी जरूरी नहीं है। अदालत ने कहा कि रिश्वत मांगना आधिकारिक कर्तव्य से जुड़ा नहीं, बल्कि आपराधिक कृत्य है। यह टिप्पणी राजस्थान पुलिस कांस्टेबल तेजाराम की अपील खारिज करते हुए की गई।

Sonali21 अक्टू. 2026, 01:51 PM IST
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रिश्वत मांगने पर सरकारी संरक्षण नहीं! सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया—जांच के लिए पूर्व मंजूरी जरूरी नहीं

यह मामला राजस्थान पुलिस के कांस्टेबल तेजाराम से जुड़ा है, जिन्होंने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 के तहत आरोप तय किए जाने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। कांस्टेबल की ओर से दलील दी गई कि जांच शुरू करने से पहले धारा 17A के तहत आवश्यक पूर्व मंजूरी नहीं ली गई थी, इसलिए उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही प्रभावित होती है। मामले की सुनवाई जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने की। अदालत ने कांस्टेबल की दलील स्वीकार नहीं की और उनकी अपील खारिज कर दी।

धारा 17A कब लागू होती है?

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत किसी लोक सेवक के आधिकारिक कार्यों के निर्वहन में की गई सिफारिश या लिए गए निर्णय से संबंधित कथित अपराध की जांच या पूछताछ शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी आवश्यक हो सकती है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस प्रावधान को लागू करने के लिए कथित अपराध का संबंध लोक सेवक के आधिकारिक कार्य के दौरान की गई किसी सिफारिश या लिए गए निर्णय से होना चाहिए। अदालत के अनुसार, जब आरोप सीधे रिश्वत मांगने का हो और उसका संबंध किसी आधिकारिक निर्णय या सिफारिश से न हो, तो धारा 17A की पूर्व मंजूरी संबंधी शर्त लागू नहीं होती।

रिश्वत मांगना स्वतंत्र आपराधिक कृत्य

जस्टिस एनवी अंजारिया द्वारा लिखे गए फैसले में पीठ ने कहा कि रिश्वत मांगने की कार्रवाई लोक सेवक के आधिकारिक कार्यों से जुड़ी नहीं होती। इसे किसी सरकारी निर्णय या सिफारिश के समान नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 17A लागू होने के लिए यह आवश्यक है कि संबंधित लोक सेवक के खिलाफ लगाए गए आरोप का संबंध उसके आधिकारिक कार्यों के निर्वहन में लिए गए निर्णय या की गई सिफारिश से हो। मौजूदा मामले में यह आवश्यक शर्त पूरी नहीं होती, क्योंकि आरोप अवैध रिश्वत मांगने का है।

कांस्टेबल की दलील खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मौजूदा मामले में धारा 17A के आवश्यक तत्व मौजूद नहीं हैं। इसलिए जांच से पहले मंजूरी नहीं लिए जाने के आधार पर कार्यवाही को चुनौती देने की कांस्टेबल की दलील स्वीकार नहीं की जा सकती। अदालत ने उनकी अपील खारिज करते हुए आरोप तय किए जाने के खिलाफ उठाई गई आपत्ति को अस्वीकार कर दिया।

इस फैसले से स्पष्ट होता है कि धारा 17A के तहत पूर्व मंजूरी की आवश्यकता का निर्धारण आरोप की प्रकृति और उसके आधिकारिक कर्तव्य से संबंध के आधार पर किया जाएगा। रिश्वत मांगने के आरोप को केवल सरकारी कर्मचारी के पद से जोड़कर इस प्रावधान के संरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता।