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दिल्ली JNU में 17 दिन से भूख हड़ताल पर छात्र, सांसद जॉन ब्रिटास ने राष्ट्रपति से दखल देने की मांग की
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में छात्रों की 17 दिन से जारी भूख हड़ताल के बीच CPM सांसद जॉन ब्रिटास ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और केंद्रीय शिक्षा मंत्री से हस्तक्षेप की अपील की है। उन्होंने छात्र प्रतिनिधियों के निष्कासन के आदेश वापस लेने, विरोध प्रदर्शनों पर सख्त नियम हटाने और दाखिले से लेकर लैंगिक न्याय तक के मुद्दों का समाधान करने की मांग की है।

दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में छात्र अपनी मांगों को लेकर 17 दिन से भूख हड़ताल पर हैं। छात्रों की बिगड़ती सेहत को देखते हुए कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी CPM के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु और केंद्रीय शिक्षा मंत्री से मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की है। उन्होंने छात्र प्रतिनिधियों के निष्कासन के आदेश वापस लेने, विरोध प्रदर्शनों से जुड़े कुछ नियमों को हटाने और छात्रों की लंबित समस्याओं का जल्द समाधान करने की मांग की है।
जॉन ब्रिटास ने रविवार को राष्ट्रपति और शिक्षा मंत्री को पत्र लिखा था। सोमवार को उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर भी इस मुद्दे को उठाया। उनके मुताबिक, छात्रों ने 3 अक्टूबर को भूख हड़ताल शुरू की थी। उनका आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों की लंबे समय से चली आ रही मांगों पर ध्यान नहीं दे रहा था, जिसके बाद उन्हें विरोध का रास्ता अपनाना पड़ा। ब्रिटास ने कहा कि भूख हड़ताल कर रहे छात्रों की सेहत बिगड़ रही है, इसलिए मामले में जल्द कदम उठाने की जरूरत है।
जॉन ब्रिटास ने JNU छात्र संघ के चुने हुए प्रतिनिधियों को विश्वविद्यालय से निष्कासित किए जाने पर भी चिंता जताई है। निष्कासित किए गए प्रतिनिधियों में छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष भी शामिल हैं। ब्रिटास का कहना है कि निर्वाचित छात्र प्रतिनिधियों को विश्वविद्यालय से बाहर करने से छात्र संघ के कामकाज पर असर पड़ता है। इससे छात्रों की समस्याओं को प्रशासन तक पहुंचाने और उनके अधिकारों के लिए आवाज उठाने की प्रक्रिया भी कमजोर हो सकती है। CPM सांसद ने विश्वविद्यालय के चीफ प्रॉक्टर ऑफिस (CPO) मैनुअल के नियमों पर भी सवाल उठाए हैं। इन नियमों के तहत विभिन्न प्रकार के विरोध प्रदर्शनों और सभाओं के आयोजन पर जुर्माना लगाने के साथ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है। ब्रिटास का मानना है कि विश्वविद्यालय में छात्रों को अपनी बात रखने, विचारों पर बहस करने और असहमति जताने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। उन्होंने आशंका जताई कि सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई के डर से छात्र अपनी समस्याओं को उठाने से बच सकते हैं।
जॉन ब्रिटास ने छात्रों की अन्य लंबित मांगों का भी जिक्र किया। इनमें लैंगिक न्याय, समान अवसर, दाखिले से जुड़े विवाद और विश्वविद्यालय परिसर में बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दे शामिल हैं। उन्होंने कहा कि छात्रों की समस्याओं का समाधान निकालना जरूरी है और भूख हड़ताल के कारण उनकी सेहत पर पड़ रहे असर को देखते हुए प्रशासन को मामले में देरी नहीं करनी चाहिए। जॉन ब्रिटास ने अपने पत्र में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय अधिनियम, 1966 का हवाला देते हुए राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कहा कि इस कानून में सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक जीवन जैसे मूल्यों को महत्व दिया गया है। राष्ट्रपति विश्वविद्यालय की विजिटर भी हैं। ब्रिटास ने अधिनियम की धारा 8 के तहत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से मामले में दखल देने की अपील की है। उनकी प्रमुख मांगों में छात्र प्रतिनिधियों के निष्कासन के आदेश वापस लेना, CPO मैनुअल के कथित आपत्तिजनक नियमों को हटाना और छात्रों की लंबित समस्याओं का जल्द समाधान करना शामिल है। अब इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन और केंद्र सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदमों पर नजर रहेगी।
