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यमुना एक्सप्रेसवे हादसे के बाद हाईकोर्ट का बड़ा कदम, बसों के सुरक्षा मानकों पर केंद्र से जवाब तलब
यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस में आग लगने से 9 यात्रियों की मौत के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) को नोटिस जारी किया है। अदालत ने बसों में अग्नि सुरक्षा मानकों के पालन पर सवाल उठाते हुए कहा कि हादसों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए अभी और कदम उठाने की जरूरत है। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी।

यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस में आग लगने से 9 यात्रियों की जिंदा जलकर मौत के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) को नोटिस जारी किया है। अदालत ने बसों में अग्नि सुरक्षा मानकों के पालन और यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने की जरूरत बताई। मामले में उत्तर प्रदेश सरकार ने अप्रैल से सितंबर 2026 के बीच 7,665 बसों के चालान और 1,008 बसों को जब्त किए जाने की जानकारी दी, लेकिन अदालत ने कहा कि अभी और प्रयास करने की आवश्यकता है।
बस अग्निकांड पर हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया
यह मामला 23 और 24 सितंबर 2026 की दरमियानी रात जेवर के पास यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस में आग लगने से हुई दुर्घटना से जुड़ा है। इस हादसे में 9 यात्रियों की जलकर मौत हो गई थी। घटना की गंभीरता को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognizance) लिया था।
न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की पीठ ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) और परिवहन विभाग के अपर मुख्य सचिव की ओर से दाखिल हलफनामों पर विचार करने के बाद यह आदेश दिया। अदालत की सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता तरुण अग्रवाल ने भी बसों की सुरक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए सुझाव दिए।
केंद्र सरकार के मंत्रालय को क्यों भेजा गया नोटिस?
उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने हलफनामे में बताया कि ऑटोमेटिक टेस्टिंग स्टेशन (ATS) का पंजीकरण और संचालन सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के नियामक ढांचे के तहत होता है। दूसरे राज्यों में स्थित ATS सुविधाएं उत्तर प्रदेश परिवहन विभाग के नियंत्रण में नहीं हैं। इसी आधार पर राज्य सरकार ने AIS-119 और AIS-135 जैसे ऑटोमोटिव उद्योग मानकों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने के लिए केंद्र के मंत्रालय को आवश्यक निर्देश जारी करने की मांग की। हाईकोर्ट ने मंत्रालय के सचिव को मामले में पक्षकार बनाने के अनुरोध को स्वीकार करते हुए नोटिस जारी किया। अदालत ने मामले की पूरी फाइल भारत के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल को भी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
2026 में स्लीपर बसों के परमिट में तेजी से वृद्धि
राज्य सरकार के हलफनामे के अनुसार, उत्तर प्रदेश में स्लीपर बसों के लिए जारी परमिट की संख्या में पिछले कुछ वर्षों में वृद्धि हुई है।
वर्ष 2023: 252 परमिट
वर्ष 2024: 340 परमिट
वर्ष 2025: 610 परमिट
सितंबर 2026 तक: 1,104 परमिट
सरकार ने बताया कि ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट जारी करने से पहले बस की फिटनेस की जांच की जाती है। निरीक्षण अधिकारी वाहन की स्थिति की जांच कर फिटनेस प्रमाणपत्र जारी करता है। परमिट आवेदन पर तभी विचार किया जाता है, जब फिटनेस प्रमाणपत्र वैध हो। हालांकि, राज्य में सीमाओं पर स्थायी जांच चौकियां नहीं हैं। इसके बजाय परिवहन विभाग की टीमें नियमित रूप से औचक जांच करती हैं।
बसों में किन सुरक्षा मानकों का पालन जरूरी?
हाईकोर्ट ने बसों की बनावट और सुरक्षा से जुड़े ऑटोमोटिव उद्योग मानकों पर भी विचार किया। इनमें AIS-052, AIS-119 और AIS-135 शामिल हैं। इन मानकों में बसों के डिजाइन, स्लीपर कोच की विशेषताओं और आग का पता लगाने तथा आग बुझाने की व्यवस्था से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। इनमें आपातकालीन निकास, वाहन की ऊंचाई पर निर्धारित सीमाएं, स्वचालित अग्नि पहचान एवं अग्निशमन प्रणाली और चालक को नींद आने की स्थिति में चेतावनी देने वाली प्रणाली जैसे सुरक्षा उपाय शामिल हैं। पिछली सुनवाई में अदालत ने चिंता जताई थी कि वातानुकूलित स्लीपर बसें उचित जांच और अग्निशामक यंत्रों जैसी जरूरी सुरक्षा व्यवस्था के बिना संचालित होती दिखाई दे रही हैं।
बदली हुई बसों की जांच के लिए भी बने प्रस्ताव
हाईकोर्ट ने उम्मीद जताई कि उत्तर प्रदेश सरकार अदालत की सहायता कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता के सुझावों पर विचार करेगी और दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए एक समेकित प्रस्ताव (Consolidated Proposal) पेश करेगी। इसमें मॉडिफाइड यानी परिवर्तित बसों की जांच के तरीके भी शामिल किए जाने चाहिए। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर को होगी। अदालत के सामने अब यह महत्वपूर्ण मुद्दा है कि स्लीपर बसों के लिए निर्धारित सुरक्षा मानकों का पालन कैसे सुनिश्चित किया जाए, ताकि यात्रियों की जान जोखिम में डालने वाली घटनाओं को रोका जा सके।
