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‘आक्रामक लहजा, लगभग चिल्लाने की स्थिति’: बॉम्बे HC ने कानून विभाग के सचिव को अवमानना नोटिस
बॉम्बे हाईकोर्ट में महाराष्ट्र के कानून विभाग के सचिव दिलीप एस. घुमारे के कथित आक्रामक व्यवहार पर कोर्ट सख्त हो गया है। 179 फास्ट ट्रैक कोर्ट पदों को लेकर सुनवाई के दौरान ऊंचे स्वर में बोलने और हाईकोर्ट प्रशासन पर जिम्मेदारी डालने के आरोप में कोर्ट ने उनके खिलाफ अवमानना नोटिस जारी किया है। जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस कमल खाता की पीठ ने पूछा है कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।

मुंबई:
बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र के कानून एवं न्याय विभाग के सचिव और वरिष्ठ विधि सलाहकार दिलीप एस. घुमारे को कोर्ट की कार्यवाही के दौरान कथित आक्रामक व्यवहार को लेकर अवमानना नोटिस जारी किया है। जस्टिस ए.एस. गडकरी और जस्टिस कमल खाता की डिवीजन बेंच ने पूछा है कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। अदालत ने उनके कथित व्यवहार को ‘आक्रामक और तेज आवाज वाला, लगभग चिल्लाने की स्थिति’ वाला बताया। मामला 179 नए फास्ट ट्रैक कोर्ट पदों के सृजन और उन्हें भरने से जुड़ी एक जनहित याचिका में दाखिल इंटरिम एप्लीकेशन की सुनवाई के दौरान सामने आया। यह जनहित याचिका महिलाओं और नाबालिग लड़कियों के खिलाफ अपराधों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट से संबंधित है। कोर्ट अपने 24 अगस्त 2026 के आदेश और घुमारे की ओर से दाखिल हलफनामे पर सुनवाई कर रही थी।
179 पदों को लेकर क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अतिरिक्त सरकारी वकील प्रियांभूषण पी. काकड़े से 27 अगस्त के अतिरिक्त हलफनामे में किए गए उस दावे पर स्पष्टीकरण मांगा, जिसमें 179 नए फास्ट ट्रैक कोर्ट पदों के सृजन की बात कही गई थी। सरकारी वकील अदालत के सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं दे सके। इसके बाद कोर्ट ने मौजूद दिलीप घुमारे से इस बारे में जानकारी मांगी और हलफनामे से जुड़े सवाल किए। अदालत के मुताबिक, सवाल का सीधा जवाब देने के बजाय घुमारे ने कथित तौर पर आक्रामक और ऊंचे स्वर में बोलना शुरू कर दिया तथा 179 पदों को नहीं भरने के लिए हाईकोर्ट प्रशासन को जिम्मेदार बताया। यह घटना भरे हुए कोर्टरूम में हुई।
कोर्ट ने व्यवहार को बताया ‘अक्षम्य’
हाईकोर्ट ने कहा कि घुमारे का कथित आचरण न केवल अदालत को ‘स्कैंडलाइज’ करता है, बल्कि उसकी गरिमा और अधिकार को कमजोर करने का प्रयास भी है। अदालत ने इसे प्रथम दृष्टया ‘contempt ex facie’ माना और संविधान के अनुच्छेद 215 तथा Contempt of Courts Act, 1971 के प्रावधानों का उल्लेख किया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने इस व्यवहार को किसी भी न्यायिक अधिकारी के लिए पूरी तरह अनुचित बताया और कहा कि यह अदालत की गरिमा एवं अधिकार पर जानबूझकर किया गया अनुचित हमला था।
माफी की पेशकश भी स्वीकार नहीं की
मामले में महाराष्ट्र के एडवोकेट जनरल मिलिंद साठे की सहायता भी ली गई। रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने घुमारे की ओर से माफी स्वीकार करने का आग्रह किया, लेकिन हाईकोर्ट ने इस स्तर पर माफी को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि केवल बाद में माफी मांग लेने से खुली अदालत में किए गए गंभीर आचरण को स्वतः माफ नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि वरिष्ठ पद पर होना किसी व्यक्ति को न्यायालय के प्रति अनादरपूर्ण व्यवहार का विशेषाधिकार नहीं देता। न्यायिक अधिकारी से कोर्ट की गरिमा, अनुशासन और मर्यादा बनाए रखने की अपेक्षा और अधिक होती है।
अब 11 सितंबर को होगी सुनवाई
बॉम्बे हाईकोर्ट ने घुमारे को कारण बताओ नोटिस जारी कर यह बताने को कहा है कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए। मामले की अगली सुनवाई 11 सितंबर 2026 को निर्धारित की गई है। इस मामले में अभी अवमानना का अंतिम दोषसिद्धि आदेश नहीं हुआ है; फिलहाल अदालत ने कथित आचरण के संबंध में कारण बताओ नोटिस जारी किया है। इसलिए आगे की कार्रवाई घुमारे के जवाब और अदालत के अगले आदेश पर निर्भर करेगी।
