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जंगल-जमीन बचाने की लड़ाई, 'चिता आंदोलन' पर प्रशासन की कार्रवाई।
मध्य प्रदेश के छतरपुर में केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में चल रहे 'चिता आंदोलन' को पुलिस और प्रशासन ने समाप्त करा दिया। प्रदर्शनकारी उचित मुआवजा, पुनर्वास और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर विरोध कर रहे हैं, जबकि प्रशासन का कहना है कि उन्हें सुरक्षा कारणों से हटाया गया। यह विवाद देश की सबसे बड़ी नदी जोड़ो परियोजनाओं में विकास और विस्थापन के बीच संतुलन की चुनौती को एक बार फिर सामने लाता है।
Anshuman Mishra22 जुल. 2026, 02:36 PM IST

मध्यप्रदेश छतरपुर: मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिले में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के खिलाफ चल रहे 'चिता आंदोलन' को पुलिस और प्रशासन ने समाप्त करा दिया। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि उन्हें जबरन हटाया गया, जबकि प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए की गई। इस घटना ने देश की सबसे महत्वाकांक्षी नदी जोड़ो परियोजनाओं में से एक को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
19 जुलाई की सुबह बड़ी संख्या में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के कूपी गांव के पास बराना नदी के किनारे पहुंचे, जहां पिछले 15 दिनों से सैकड़ों ग्रामीण और आदिवासी परिवार 'चिता आंदोलन' कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों को वहां से हटाया गया और आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर को अस्पताल ले जाया गया। प्रशासन ने दावा किया कि लगातार बारिश से नदी का जलस्तर बढ़ने और अनशनकारियों की बिगड़ती तबीयत को देखते हुए यह कदम उठाया गया। वहीं प्रदर्शनकारियों ने इसे लोकतांत्रिक विरोध को दबाने की कार्रवाई बताया।
क्या है 'चिता आंदोलन'?
'चिता आंदोलन' विरोध का एक प्रतीकात्मक तरीका है, जिसमें परियोजना प्रभावित ग्रामीण लकड़ी की चिताओं पर लेटकर यह संदेश देते हैं कि यदि उनकी जमीन, जंगल और आजीविका छिन गई तो उनका जीवन भी समाप्त हो जाएगा। कई प्रदर्शनकारी अपने शरीर पर मिट्टी लगाकर, गले में फंदा डालकर और चिताओं पर लेटकर विरोध दर्ज करा रहे थे। यह आंदोलन पहली बार अप्रैल 2026 में शुरू हुआ था और प्रशासन के आश्वासन के बाद स्थगित हुआ, लेकिन मांगें पूरी न होने पर 3 जुलाई से दोबारा शुरू किया गया।
केन-बेतवा लिंक परियोजना क्या है?
केन-बेतवा लिंक परियोजना भारत की राष्ट्रीय नदी जोड़ो योजना की पहली प्रमुख परियोजना है। इसका उद्देश्य मध्य प्रदेश की केन नदी का अतिरिक्त पानी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की बेतवा नदी बेसिन तक पहुंचाना है ताकि बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई, पेयजल और जल संकट की समस्या को कम किया जा सके।
परियोजना के पहले चरण में दौधन बांध, नहर प्रणाली और जल हस्तांतरण ढांचा बनाया जा रहा है। सरकार का दावा है कि इससे लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई, लाखों लोगों को पेयजल और क्षेत्र में जलविद्युत उत्पादन का लाभ मिलेगा। यह परियोजना वर्षों से लंबित थी और केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय महत्व की परियोजना घोषित किया है।
ग्रामीणों और आदिवासियों की मुख्य आपत्तियां
परियोजना प्रभावित परिवारों का कहना है कि उन्हें उचित मुआवजा, पुनर्वास और ग्राम सभाओं में पर्याप्त भागीदारी नहीं मिली। उनका आरोप है कि कई गांवों का सर्वेक्षण अधूरा है और हजारों परिवार विस्थापन की आशंका में हैं। आंदोलन में शामिल अधिकांश लोग गोंड और सौर जैसी आदिवासी समुदायों से जुड़े हैं, जिनकी आजीविका खेती, जंगल और स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। प्रभावित लोग यह भी मांग कर रहे हैं कि पुनर्वास नीति पूरी तरह लागू होने तक निर्माण कार्य रोका जाए।
पर्यावरणीय चिंताएं
पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि परियोजना के कारण पन्ना टाइगर रिजर्व का एक हिस्सा जलमग्न होगा, जिससे बाघ, घड़ियाल, गिद्ध सहित कई वन्यजीवों के आवास प्रभावित हो सकते हैं। बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई और नदी के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। हालांकि सरकार का कहना है कि पर्यावरणीय मंजूरियों की शर्तों के अनुसार प्रतिपूरक वनीकरण, वन्यजीव संरक्षण और अन्यशमन उपाय किए जा रहे हैं।
सरकार का पक्ष
प्रशासन का कहना है कि प्रदर्शनकारियों को बलपूर्वक नहीं बल्कि सुरक्षित तरीके से हटाया गया। अधिकारियों के अनुसार भारी बारिश के कारण बराना नदी का जलस्तर बढ़ गया था और प्रदर्शन स्थल जोखिमपूर्ण हो गया था। चिकित्सा दल के साथ पहुंची टीम ने अनशनकारियों का स्वास्थ्य परीक्षण भी किया और महिलाओं सहित अन्य प्रदर्शनकारियों को उनके गांवों तक पहुंचाया गया।
विवाद क्यों बढ़ता जा रहा है?
यह विवाद केवल एक बांध या नहर परियोजना का नहीं है, बल्कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का भी प्रश्न है। एक ओर सरकार बुंदेलखंड के जल संकट को दूर करने के लिए इसे आवश्यक मानती है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय समुदायों का कहना है कि विकास की कीमत उनके घर, जंगल, संस्कृति और आजीविका नहीं होनी चाहिए। यही कारण है कि यह परियोजना वर्षों से न्यायालयों, पर्यावरण विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों के बीच बहस का विषय बनी हुई है।
प्रदर्शन स्थल खाली कराए जाने के बाद भी परियोजना को लेकर विवाद समाप्त नहीं हुआ है। प्रभावित परिवार पुनर्वास, उचित मुआवजा और पारदर्शी प्रक्रिया की मांग पर कायम हैं। दूसरी ओर सरकार परियोजना को समय पर पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। आने वाले दिनों में अदालतों, प्रशासन और प्रभावित समुदायों के बीच होने वाली बातचीत इस परियोजना की दिशा तय कर सकती है।
