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धरती का सबसे बड़ा युद्ध: जलवायु संकट पर दुनिया कब जागेगी?
रूस-यूक्रेन और पश्चिम एशिया के युद्धों के बीच दुनिया एक ऐसे संकट को नजरअंदाज कर रही है जो पूरी मानव सभ्यता को प्रभावित कर सकता है। जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण अब केवल पर्यावरण का नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता का भी सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र और वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर गहरा होगा।

नई दिल्ली: दुनिया इस समय कई मोर्चों पर संघर्ष कर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का तनाव, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, ऊर्जा संकट और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार सुर्खियों में हैं। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसा युद्ध भी चल रहा है, जिसका कोई सैनिक नहीं, कोई सीमा नहीं और कोई युद्धविराम भी नहीं। यह युद्ध है इंसान और प्रकृति के बीच बढ़ते असंतुलन का। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि यदि आने वाले दशक में जलवायु परिवर्तन की रफ्तार नहीं रोकी गई तो इसका प्रभाव किसी भी सैन्य युद्ध से कहीं अधिक व्यापक और विनाशकारी हो सकता है।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने जलवायु परिवर्तन को "मानवता के लिए कोड रेड" बताते हुए कहा था,
"हम पृथ्वी के साथ युद्ध कर रहे हैं और पृथ्वी पलटकर जवाब दे रही है।"
यह केवल एक भावनात्मक टिप्पणी नहीं, बल्कि वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय की उस चिंता का सार है जिसे पिछले कई वर्षों से लगातार दोहराया जा रहा है।
इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की रिपोर्टें स्पष्ट करती हैं कि औद्योगिक क्रांति के बाद पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 1.1 से 1.3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ चुका है। यह मामूली वृद्धि नहीं है। इसी के कारण दुनिया भर में हीटवेव, बाढ़, जंगलों में आग, समुद्री तूफानों की तीव्रता और सूखे जैसी घटनाओं में लगातार वृद्धि देखी जा रही है।
भारत भी इससे अछूता नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बादल फटना, दिल्ली और उत्तर भारत में रिकॉर्ड गर्मी, असम में बार-बार आने वाली बाढ़, महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति और दक्षिण भारत में अनियमित मानसून यह संकेत देते हैं कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की समस्या नहीं बल्कि वर्तमान की वास्तविकता बन चुका है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि पिछले दस वर्ष मानव इतिहास के सबसे गर्म वर्षों में शामिल रहे हैं। वहीं संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का कहना है कि यदि वर्तमान गति से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन जारी रहा तो 21वीं सदी के अंत तक पृथ्वी का तापमान 2.5 से 3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह स्तर कृषि, जल संसाधनों, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य के लिए बेहद गंभीर होगा।
भारत सरकार ने भी जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, बड़े पैमाने पर नवीकरणीय ऊर्जा विस्तार, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी। जब तक समाज, उद्योग और प्रत्येक नागरिक अपनी जीवनशैली में बदलाव नहीं लाएगा, तब तक अपेक्षित परिणाम हासिल करना कठिन होगा।
पर्यावरणविद् सुनीता नारायण कहती हैं,
"जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है। यह विकास, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है।"
इसी तरह संयुक्त राष्ट्र के पूर्व जलवायु प्रमुख साइमन स्टील का कहना है,
"जलवायु परिवर्तन के खिलाफ उठाया गया हर कदम अर्थव्यवस्था, रोजगार और भविष्य की पीढ़ियों में निवेश है।"
विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार यदि समय रहते जलवायु अनुकूल नीतियां नहीं अपनाई गईं तो 2050 तक करोड़ों लोग जलवायु कारणों से विस्थापित हो सकते हैं। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में इसका सबसे अधिक प्रभाव किसानों, मछुआरों, गरीब परिवारों और शहरी झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों पर पड़ेगा।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि जलवायु संकट केवल मौसम तक सीमित नहीं है। यह खाद्य सुरक्षा, पेयजल, रोजगार, ऊर्जा, स्वास्थ्य, शिक्षा और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार वायु प्रदूषण हर वर्ष लाखों समयपूर्व मौतों का कारण बनता है। वहीं अत्यधिक गर्मी के कारण श्रम उत्पादकता घट रही है और स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है।
इस पूरे संकट के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम विकास और पर्यावरण को एक-दूसरे का विरोधी मानते रहेंगे, या दोनों के बीच संतुलन स्थापित करेंगे? विशेषज्ञों का मानना है कि हरित ऊर्जा, टिकाऊ कृषि, जल संरक्षण, वृक्षारोपण, सार्वजनिक परिवहन, कचरा प्रबंधन और स्वच्छ उद्योग भविष्य की अर्थव्यवस्था की नींव बन सकते हैं।
यह लड़ाई केवल सरकारों की नहीं है। घरों में बिजली की बचत, प्लास्टिक का कम उपयोग, वर्षा जल संचयन, सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल, स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता और अधिक से अधिक पेड़ लगाना जैसे छोटे कदम भी बड़े परिवर्तन का आधार बन सकते हैं।
आज दुनिया जिस युद्ध की सबसे अधिक चर्चा करती है, वह सीमाओं पर लड़ा जा रहा है। लेकिन आने वाले वर्षों में इतिहास शायद उस युद्ध को अधिक महत्वपूर्ण मानेगा जो इंसान ने अपनी ही धरती के खिलाफ छेड़ दिया। यदि हमने अभी दिशा नहीं बदली, तो भविष्य की पीढ़ियां हमें इस बात के लिए याद करेंगी कि हमारे पास चेतावनी भी थी, विज्ञान भी था और समाधान भी थे, फिर भी हमने समय रहते निर्णय नहीं लिया।
धरती को बचाने की यह लड़ाई किसी एक देश, एक सरकार या एक संगठन की नहीं है। यह पूरी मानव सभ्यता की साझा जिम्मेदारी है। शायद यही 21वीं सदी का सबसे बड़ा युद्ध है—जिसे जीतना भी हमें है और हारना भी।
- एंतोनियो गुटेरेस (संयुक्त राष्ट्र महासचिव)
"Humanity is on thin ice — and that ice is melting."
"Climate change is a code red for humanity."
- सुनीता नारायण (पर्यावरणविद्)
"जलवायु परिवर्तन विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का प्रश्न है।"
- नरेंद्र मोदी (COP26, ग्लासगो)
"One Sun, One World, One Grid."
"LiFE – Lifestyle for Environment is the need of the hour."
