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नोएडा श्रमिक हिंसा मामले में ‘मजदूर बिगुल दस्ता’ सदस्य को बड़ी राहत, 2 FIR में इलाहाबाद HC ने दी जमानत
नोएडा में मजदूरों के आंदोलन से शुरू हुआ विवाद जब हिंसा, पथराव और तोड़फोड़ के आरोपों तक पहुंचा, तो कई लोगों पर FIR और गिरफ्तारी की कार्रवाई हुई। अब इसी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा दखल देते हुए ‘मजदूर बिगुल दस्ता’ के सदस्य हिमांशु ठाकुर को दो FIR में जमानत दे दी है। कोर्ट ने गौर किया कि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद आरोपी की हिंसा में कोई स्पष्ट और विशिष्ट भूमिका सामने नहीं आई थी।

नोएडा में अप्रैल 2026 के दौरान वेतन वृद्धि की मांग को लेकर हुए श्रमिक आंदोलन ने जब हिंसक रूप लिया तो पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हुआ। अब इसी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘मजदूर बिगुल दस्ता’ से जुड़े हिमांशु ठाकुर को दो अलग-अलग FIR में जमानत देकर महत्वपूर्ण राहत दी है। खास बात यह रही कि दोनों मामलों में अदालत ने आरोपी के खिलाफ किसी विशिष्ट हिंसक कृत्य की भूमिका सामने नहीं आने के तथ्य को महत्व दिया। हिमांशु ठाकुर के खिलाफ केस क्राइम नंबर 164/2026 और 165/2026 में मामले दर्ज किए गए थे। दोनों FIR नोएडा/गौतमबुद्ध नगर में अप्रैल 2026 के श्रमिक प्रदर्शन के दौरान कथित पथराव, तोड़फोड़ और सार्वजनिक तथा निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से संबंधित थीं।
FIR नंबर 164 में 7 अगस्त को जमानत
केस क्राइम नंबर 164/2026 में जस्टिस कृष्ण पहल ने 7 अगस्त 2026 को हिमांशु ठाकुर को जमानत दी। अदालत ने इस दौरान इस तथ्य पर भी गौर किया कि इसी तरह की स्थिति वाले सह-आरोपी रवि कुमार राठौर को हाईकोर्ट की समन्वय पीठ 24 जून 2026 को पहले ही जमानत दे चुकी थी। कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ बताई गई आपराधिक हिस्ट्री को भी स्पष्ट माना। जमानत देते हुए कोर्ट ने व्यक्तिगत बॉन्ड और दो जमानतदारों की शर्त रखी। साथ ही आरोपी को गवाहों को प्रभावित नहीं करने, सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करने और ट्रायल कोर्ट के समक्ष आवश्यकतानुसार उपस्थित होने का निर्देश दिया।
दूसरी FIR में 20 अगस्त को राहत
दूसरे मामले यानी केस क्राइम नंबर 165/2026 में जस्टिस अवनीश सक्सेना ने 20 अगस्त 2026 को हिमांशु ठाकुर को जमानत दी। इस FIR में पुलिस के अनुसार करीब 450-500 लोगों की भीड़ से जुड़ी हिंसा का आरोप था। अभियोजन की ओर से यह तर्क दिया गया कि ठाकुर सोशल मीडिया के जरिए हिंसा फैलाने और लोगों में नफरत पैदा करने में भूमिका निभा रहा था। हालांकि अदालत ने इस आरोप के बावजूद जमानत दी, क्योंकि आरोपी के खिलाफ कोई विशिष्ट भूमिका सामने नहीं रखी गई थी। बचाव पक्ष की ओर से यह भी कहा गया कि ठाकुर के पास से कोई हथियार, विस्फोटक, ज्वलनशील पदार्थ या ऐसा आपत्तिजनक डिजिटल संचार बरामद नहीं हुआ, जिससे उसे कथित हिंसक घटनाओं से सीधे जोड़ा जा सके। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि FIR अथवा जांच के दौरान दर्ज बयानों में ऐसा कोई आरोप नहीं था कि ठाकुर ने कंपनी का गेट तोड़ा, पथराव किया, किसी कर्मचारी या पुलिसकर्मी पर हमला किया, वाहन जलाए अथवा कंपनी की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया।
संगठनों से जुड़ाव को लेकर क्या कहा गया?
पुलिस की ओर से ठाकुर के विभिन्न संगठनों से कथित संबंधों और मजदूर आंदोलनों में उसकी भागीदारी का भी उल्लेख किया गया था। अभियोजन ने उसके ‘मजदूर बिगुल’, ‘दिशा स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन’ और ‘नौजवान भारत सभा’ जैसे संगठनों से कथित जुड़ाव तथा विभिन्न मंचों पर चर्चाओं में भागीदारी को भी मामले के संदर्भ में रखा।
बचाव पक्ष ने इसके विपरीत तर्क दिया कि किसी वैध संगठन से जुड़ना अथवा श्रमिक गतिविधियों में हिस्सा लेना अपने आप में हिंसा या आपराधिक कृत्य में भागीदारी का प्रमाण नहीं हो सकता। अदालत द्वारा जमानत दिए जाने में आरोपी के खिलाफ विशिष्ट भूमिका के अभाव को महत्वपूर्ण माना गया।
आखिर अप्रैल में नोएडा में हुआ क्या था?
यह मामला 13 अप्रैल 2026 को नोएडा में श्रमिकों के वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हुए बड़े प्रदर्शन से जुड़ा है। प्रदर्शन के दौरान कई इलाकों में स्थिति बिगड़ने, पथराव, आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आई थीं। उस समय पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार किया था और जांच में ‘मजदूर बिगुल दस्ता’ समेत विभिन्न संगठनों की कथित भूमिका की जांच की गई। अप्रैल में पुलिस ने दावा किया था कि हिंसा अचानक नहीं हुई बल्कि इसके पीछे संगठित तैयारी और सोशल मीडिया के जरिए लोगों को जुटाने की कोशिश की गई। जांच में कई WhatsApp ग्रुपों की भी पहचान किए जाने की बात सामने आई थी। हिमांशु ठाकुर को भी अप्रैल में गिरफ्तार किए गए लोगों में शामिल किया गया था। उस समय पुलिस ने उसे हिंसा में कथित भूमिका और अन्य लोगों के साथ संपर्क के आधार पर आरोपी बनाया था।
42 हजार से ज्यादा श्रमिकों के प्रदर्शन का दावा
मामले की व्यापकता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पुलिस के अनुसार विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों में करीब 42,000 श्रमिकों ने प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। हिंसा के संबंध में कई FIR दर्ज हुईं और बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां की गईं। मई 2026 में पुलिस ने इसी आंदोलन से जुड़े दो अन्य आरोपियों—सत्यम वर्मा और आकृति—के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाए जाने की भी जानकारी दी थी।
पुलिस की जांच में सोशल मीडिया भी बना अहम पहलू
जांच एजेंसियों ने कथित हिंसा के पीछे सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल की भी जांच की। रिपोर्टों के अनुसार कम से कम 17 WhatsApp ग्रुपों की पहचान की गई थी और पुलिस ने डिजिटल साक्ष्यों तथा CCTV फुटेज के आधार पर कार्रवाई की बात कही थी। हालांकि हिमांशु ठाकुर को जमानत देते समय हाईकोर्ट के सामने महत्वपूर्ण प्रश्न यह रहा कि क्या उसके खिलाफ कथित हिंसा में कोई प्रत्यक्ष और विशिष्ट भूमिका सामने आती है। दोनों FIR में ऐसी विशिष्ट भूमिका का अभाव अदालत के आदेशों में महत्वपूर्ण रहा।
श्रमिक आंदोलन से हिंसा तक पहुंचा मामला
अप्रैल में शुरू हुआ आंदोलन मूल रूप से वेतन वृद्धि और बेहतर मजदूरी की मांग से जुड़ा था। आंदोलन के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने औद्योगिक श्रमिकों के न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी की घोषणा भी की थी। रिपोर्टों के अनुसार गौतमबुद्ध नगर और गाजियाबाद में अकुशल श्रमिकों का मासिक न्यूनतम वेतन बढ़ाकर 13,690 रुपये किया गया, जबकि अर्ध-कुशल और कुशल श्रमिकों के लिए यह क्रमशः 15,059 रुपये और 16,868 रुपये किया गया। यानी एक तरफ सरकार को श्रमिकों की वेतन संबंधी मांग पर फैसला लेना पड़ा, वहीं दूसरी तरफ हिंसा और कथित साजिश को लेकर पुलिस जांच और आपराधिक मुकदमों का सिलसिला जारी रहा।
कोर्ट का आदेश क्या बताता है?
दोनों जमानत आदेशों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी आरोपी का किसी संगठन से जुड़ाव, आंदोलन में भागीदारी अथवा कथित सोशल मीडिया गतिविधि अपने आप में उस व्यक्ति की किसी विशिष्ट हिंसक घटना में भागीदारी साबित नहीं करती। हाईकोर्ट ने जमानत के स्तर पर आरोपी के खिलाफ प्रत्यक्ष और विशिष्ट भूमिका के अभाव को महत्व दिया है। हालांकि जमानत मिलना आरोपी को मुकदमे के आरोपों से बरी किया जाना नहीं है। मामले का अंतिम फैसला ट्रायल कोर्ट में साक्ष्यों के आधार पर होगा।
कोर्ट ने क्या शर्तें लगाईं?
हिमांशु ठाकुर को दोनों मामलों में व्यक्तिगत बॉन्ड और दो जमानतदारों पर रिहा करने का निर्देश दिया गया। उसे गवाहों को प्रभावित नहीं करने, सबूतों से छेड़छाड़ नहीं करने और न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग करने का निर्देश भी दिया गया। यह फैसला ऐसे समय आया है जब अप्रैल के नोएडा श्रमिक आंदोलन की हिंसा और कथित साजिश को लेकर पुलिस की जांच अभी भी व्यापक चर्चा में है। हाईकोर्ट की जमानत राहत ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल जरूर सामने रखा है—क्या केवल किसी संगठन से जुड़ाव या आंदोलन में सक्रियता के आधार पर किसी व्यक्ति को कथित हिंसा की प्रत्यक्ष भूमिका से जोड़ा जा सकता है, जब FIR और जांच में उसके खिलाफ कोई विशिष्ट हिंसक कृत्य सामने न आए?
