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फर्जी शैक्षणिक रिकॉर्ड से लिया एडमिशन तो आखिरी सेमेस्टर भी नहीं बचा पाएगा! बॉम्बे HC ने JBIMS के 3 छात्रों का दाखिला रद्द किया
फर्जी शैक्षणिक रिकॉर्ड से मिला एडमिशन आखिरी सेमेस्टर तक पहुंचने के बाद भी नहीं बचा! बॉम्बे हाईकोर्ट ने JBIMS के तीन छात्रों का दाखिला रद्द रखने का फैसला बरकरार रखते हुए कहा कि परीक्षा और प्लेसमेंट भी गलत तरीके से हासिल एडमिशन को वैध नहीं बना सकते।

मुंबई:
गलत या बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए शैक्षणिक रिकॉर्ड के आधार पर हासिल किया गया दाखिला बाद में पढ़ाई पूरी करने या प्लेसमेंट मिलने से वैध नहीं हो जाता। बॉम्बे हाईकोर्ट ने JBIMS के MMS कोर्स में दाखिला लेने वाले तीन छात्रों की याचिकाएं खारिज करते हुए उनके एडमिशन रद्द करने के संस्थान के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि प्रवेश प्रक्रिया की निष्पक्षता और ईमानदारी को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि छात्र अंतिम सेमेस्टर तक पहुंच चुके थे या परीक्षा दे चुके थे।
क्या है पूरा मामला?
मामला Jamnalal Bajaj Institute of Management Studies (JBIMS) के दो वर्षीय फुल-टाइम MMS कोर्स में 2024-26 बैच के तीन छात्रों से जुड़ा है। छात्रों ने Children of Indian Workers in Gulf Countries (CIWGC) सुपरन्यूमरेरी कोटा के तहत दाखिला लिया था। मार्च 2026 में संस्थान को एक गुमनाम ईमेल मिला, जिसमें आरोप लगाया गया कि कुछ छात्रों ने दाखिले के लिए अपनी ग्रेजुएशन की मार्कशीट और शैक्षणिक उपलब्धियों को बढ़ाकर पेश किया है। इसके बाद बनी पहली समिति ने छात्रों के वास्तविक विश्वविद्यालय रिकॉर्ड और दाखिले के दौरान प्रस्तुत दस्तावेजों में अंतर पाया। बाद में दूसरी समिति गठित की गई, जिसमें छात्रों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया। दूसरी समिति ने भी पाया कि दाखिले के लिए घोषित अंक वास्तविक रिकॉर्ड से काफी अधिक थे और इनका सीधा असर छात्रों की मेरिट रैंकिंग और एडमिशन पर पड़ा था।
27 मार्च 2026 को रद्द हुआ था एडमिशन
JBIMS ने 27 मार्च 2026 को तीनों छात्रों के एडमिशन रद्द कर दिए थे। उस समय वे MMS कोर्स के चौथे और अंतिम सेमेस्टर में थे। छात्रों ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि पहली समिति ने उन्हें सुनवाई का मौका नहीं दिया और दस्तावेजों में हेरफेर करने का कोई प्रत्यक्ष सबूत भी नहीं था।
प्राकृतिक न्याय के तर्क को कोर्ट ने क्यों खारिज किया?
जस्टिस आर.आई. चागला और जस्टिस फरहान पी. दुबाश की डिवीजन बेंच ने कहा कि पहली समिति का काम प्रारंभिक तथ्य जुटाना था। इसके बाद दूसरी समिति ने छात्रों को नोटिस देकर उनके मौखिक और लिखित जवाब सुने तथा उपलब्ध सामग्री पर स्वतंत्र रूप से विचार किया। इसलिए केवल पहली समिति के स्तर पर सुनवाई न होने से पूरी प्रक्रिया अवैध नहीं हो जाती।
असली रिकॉर्ड से कितनी थी गड़बड़ी?
कोर्ट ने तीनों मामलों की परिस्थितियों को अलग-अलग देखा। यश गायकवाड़ के वास्तविक VNIT रिकॉर्ड में CGPA 7.59 था, जबकि दाखिले से जुड़े रिकॉर्ड में काफी अधिक प्रदर्शन दिखाया गया था। उनके आवेदन पत्र में भी 81.80 प्रतिशत अंक दर्ज थे, जिससे उनकी मेरिट स्थिति बेहतर हुई। कोर्ट ने परिस्थितियों की पूरी श्रृंखला को देखते हुए माना कि दूसरी समिति का निष्कर्ष केवल संदेह पर आधारित नहीं था। इसी तरह अन्य छात्रों के मामलों में भी वास्तविक विश्वविद्यालय रिकॉर्ड और दाखिले के दस्तावेजों के बीच महत्वपूर्ण अंतर पाया गया। कोर्ट ने कहा कि किसी दस्तावेज को वास्तव में किसने बदला, इसका प्रत्यक्ष फॉरेंसिक सबूत न होना अपने आप में संस्थान की कार्रवाई को कमजोर नहीं करता, यदि परिस्थितियों का पूरा रिकॉर्ड जानबूझकर गलत शैक्षणिक जानकारी के इस्तेमाल की ओर इशारा करता हो।
आखिरी सेमेस्टर और प्लेसमेंट पर कोर्ट का बड़ा फैसला
कोर्ट ने माना कि लगभग दो साल बाद एडमिशन रद्द होने से छात्रों के करियर और भविष्य पर गंभीर असर पड़ेगा। लेकिन अदालत ने कहा कि समय बीत जाने से ऐसी गड़बड़ी वैध नहीं हो सकती, जो दाखिले की बुनियाद से ही जुड़ी हो। कोर्ट के मुताबिक, यदि किसी छात्र ने वास्तविक योग्यता के बजाय materially false academic credentials के आधार पर ऐसी मेरिट हासिल की, जिसके आधार पर उसे दाखिला मिला, तो बाद की पढ़ाई, अंतिम परीक्षा या प्लेसमेंट उस मूल लाभ को वैध नहीं बना सकते। कम से कम एक छात्र को प्लेसमेंट मिलने की बात भी अदालत के लिए एडमिशन बचाने का पर्याप्त आधार नहीं बनी।
संस्थान की लापरवाही पर भी जांच के निर्देश
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि संस्थान की ओर से दस्तावेजों की जांच में देरी और सत्यापन प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं। हालांकि संस्थागत लापरवाही छात्रों द्वारा गलत दस्तावेजों के इस्तेमाल को वैध नहीं बना सकती। कोर्ट ने admission process में संभावित लापरवाही, कर्तव्य में चूक या अन्य जिम्मेदारी की भी स्वतंत्र जांच की आवश्यकता पर जोर दिया।
कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया?
जस्टिस आर.आई. चागला और जस्टिस फरहान पी. दुबाश की बेंच ने 31 अगस्त 2026 के फैसले में JBIMS द्वारा 27 मार्च 2026 को लिए गए एडमिशन रद्द करने के निर्णय में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और याचिकाएं खारिज कर दीं। हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसका फैसला छात्रों की संभावित आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं करता, बल्कि केवल एडमिशन रद्द करने की वैधता तक सीमित है।
