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बिना गिरफ्तारी के आधार बताए हिरासत में रखना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन, बॉम्बे HC ने ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश
बिना गिरफ्तारी के आधार बताए हिरासत में रखना पुलिस को भारी पड़ गया। बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन मानते हुए महाराष्ट्र सरकार को 26 वर्षीय युवक को ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने दो टूक कहा कि व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में कानून द्वारा तय प्रक्रिया और संवैधानिक सुरक्षा का पालन अनिवार्य है।

नागपुर:
बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में महाराष्ट्र सरकार को 26 वर्षीय युवक को ₹2 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया है। युवक को गिरफ्तार करते समय उसे गिरफ्तारी के आधार की जानकारी नहीं दी गई थी और कथित तौर पर उचित नोटिस भी जारी नहीं किया गया था। कोर्ट ने इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना।
जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस राज डी. वाकोडे की डिवीजन बेंच ने कहा कि हाईकोर्ट संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में मुआवजा देने का अधिकार रखता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अवैध हिरासत के कारण नागरिक के संवैधानिक अधिकार प्रभावित होते हैं और ऐसे मामलों में केवल बाद में कानूनी प्रक्रिया पूरी कर देना पर्याप्त नहीं है।
क्या है मामला?
मामला 26 वर्षीय व्यक्ति की हिरासत और गिरफ्तारी से जुड़ा था। याचिकाकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया कि पुलिस ने उसे गिरफ्तार करने से पहले कानून के मुताबिक जरूरी प्रक्रिया का पालन नहीं किया। उसे गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी नहीं दी गई और कथित तौर पर उचित नोटिस भी जारी नहीं किया गया। इसके बाद युवक ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच का रुख किया और अपनी हिरासत को चुनौती दी। याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने गिरफ्तारी से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया और व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा के सिद्धांतों पर विचार किया।
गिरफ्तारी के आधार बताना क्यों जरूरी?
अदालत ने इस बात को रेखांकित किया कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनना गंभीर संवैधानिक परिणाम वाला कदम है। गिरफ्तारी की प्रक्रिया कानून के अनुरूप होनी चाहिए और गिरफ्तार व्यक्ति को यह जानकारी होनी चाहिए कि उसे किस आधार पर गिरफ्तार किया जा रहा है। इस तरह की सुरक्षा संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जुड़ी है। इसके अलावा, आपराधिक प्रक्रिया में पुलिस की गिरफ्तारी संबंधी शक्तियों पर भी कानूनी सीमाएं निर्धारित हैं। धारा 41 CrPC के तहत गिरफ्तारी की परिस्थितियों और प्रक्रिया को लेकर प्रावधान मौजूद हैं।
हाईकोर्ट ने ₹2 लाख मुआवजा क्यों दिया?
डिवीजन बेंच ने माना कि युवक की हिरासत और गिरफ्तारी की प्रक्रिया में उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में हाईकोर्ट केवल अवैध कार्रवाई को घोषित करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उचित मामले में पीड़ित व्यक्ति को मुआवजा भी दिला सकता है। इसी आधार पर महाराष्ट्र सरकार को युवक को ₹2 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया।
Article 226 के तहत हाईकोर्ट की शक्ति
अदालत ने एक बार फिर यह सिद्धांत दोहराया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर प्रभावी राहत प्रदान कर सकता है। अवैध हिरासत के मामलों में मुआवजा सार्वजनिक कानून के तहत मिलने वाली राहत हो सकती है। इसका उद्देश्य व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए राज्य को जवाबदेह बनाना है।
जजों की बेंच
यह फैसला बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच की डिवीजन बेंच ने सुनाया। पीठ में जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस राज डी. वाकोडे शामिल थे। मामला 7 सितंबर 2026 को रिपोर्ट किया गया। कोर्ट के इस फैसले से साफ है कि पुलिस द्वारा गिरफ्तारी करते समय कानूनी प्रक्रिया और व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का पालन अनिवार्य है। यदि गिरफ्तारी या हिरासत कानून के निर्धारित सुरक्षा उपायों का उल्लंघन करते हुए की जाती है, तो पीड़ित व्यक्ति संवैधानिक राहत के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है।
