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मैनुअल स्कैवेंजिंग पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की कड़ी फटकार, बोले- “जब तक ये प्रथा जारी है, हर भारतीय के सिर पर शर्म का बोझ”

मशीनों और कानून के इस दौर में भी अगर इंसान को जहरीले सीवर में उतरकर जान जोखिम में डालनी पड़े, तो यह सिर्फ व्यवस्था की नाकामी नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए शर्म का सवाल है। मैनुअल स्कैवेंजिंग पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस सुधांशु धूलिया ने इसी दर्द को आवाज देते हुए कहा—जब तक यह अमानवीय प्रथा जारी है, हर भारतीय के सिर पर शर्म का बोझ है।

Sonali02 सित. 2026, 03:28 PM IST
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मैनुअल स्कैवेंजिंग पर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की कड़ी फटकार, बोले- “जब तक ये प्रथा जारी है, हर भारतीय के सिर पर शर्म का बोझ”

नई दिल्ली:

 भारत में मैनुअल स्कैवेंजिंग यानी इंसानों से हाथों से मैला साफ कराने और बिना सुरक्षा के सीवर-मैनहोल में उतारने की अमानवीय प्रथा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस सुधांशु धूलिया ने बेहद कड़ी टिप्पणी की है। 1 सितंबर 2026 को एक कार्यक्रम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था के जारी रहने पर उन्हें शर्मिंदगी महसूस होती है। उन्होंने कहा कि जब तक यह प्रथा खत्म नहीं होती, तब तक हर भारतीय इस शर्म का बोझ अपने सिर पर ढो रहा है। जस्टिस धूलिया ने यह टिप्पणी Safai Karmachari Andolan के ‘India@80 End Manual Scavenging’ अभियान के कार्यक्रम में की।


जस्टिस धूलिया ने क्यों जताई शर्म?

जस्टिस धूलिया ने कहा कि सेमिनारों में ऐसी कई बातें सुनने को मिलती हैं, जिनसे खुशी या गुस्सा आता है, लेकिन कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जिन पर व्यक्ति शर्म से सिर झुकाना चाहता है। उन्होंने पूर्व मैनुअल स्कैवेंजर नारायणन अम्मा का जिक्र करते हुए कहा कि वह अकेली इस शर्म का बोझ नहीं उठा रही हैं, बल्कि इस व्यवस्था के जारी रहने तक प्रत्येक भारतीय इसका हिस्सा है। उन्होंने अपने सुप्रीम कोर्ट के कार्यकाल का भी उल्लेख किया। जस्टिस धूलिया ने बताया कि रिटायरमेंट से पहले के महीनों में उन्होंने जस्टिस अरविंद कुमार के साथ उस मामले की सुनवाई की थी, जिसमें बिना सुरक्षा उपकरणों के लोगों को मैनहोल और सीवर में उतारने तथा जहरीली गैसों के कारण उनकी मौत का मुद्दा सामने आया था।


कानून में मैनुअल स्कैवेंजिंग पूरी तरह प्रतिबंधित

महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत में मैनुअल स्कैवेंजिंग पर प्रतिबंध कोई नई व्यवस्था नहीं है। Prohibition of Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation Act, 2013 के तहत मैनुअल स्कैवेंजिंग पर रोक है। कानून की धारा 5 मैनुअल स्कैवेंजर को रोजगार देने या नियुक्त करने पर रोक लगाती है, जबकि धारा 7 सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई के लिए लोगों को लगाने पर प्रतिबंध लगाती है। यह कानून 6 दिसंबर 2013 से प्रभावी हुआ।

कानून केवल रोक तक सीमित नहीं है। इसमें मैनुअल स्कैवेंजर की पहचान, सर्वे, पुनर्वास, वैकल्पिक रोजगार और अन्य सहायता का प्रावधान भी है। यानी सरकार और स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी सिर्फ लोगों को सीवर में उतरने से रोकना नहीं, बल्कि उन्हें इस काम से बाहर निकालकर सम्मानजनक जीवन और वैकल्पिक आजीविका उपलब्ध कराना भी है।


सुप्रीम कोर्ट ने 30 लाख रुपये मुआवजे का रास्ता तय किया

20 अक्टूबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने Dr. Balram Singh बनाम Union of India मामले में मैनुअल सीवर क्लीनिंग और सीवर मौतों को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश दिए। कोर्ट ने सीवर की सफाई को अधिकतम संभव सीमा तक मशीनीकृत करने पर जोर दिया और सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान मौत होने पर मुआवजे की राशि 30 लाख रुपये निर्धारित की। कोर्ट ने पुनर्वास और ऐसी मौतों की रोकथाम के लिए भी निर्देश दिए।


इसके बावजूद क्यों नहीं रुक रही मौतें?

यही सबसे गंभीर सवाल है। फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे छह बड़े महानगरों में मैनुअल स्कैवेंजिंग और मैनुअल सीवर क्लीनिंग रोकने के निर्देशों के अनुपालन पर रिपोर्ट मांगी थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि कुछ नगर निकायों की रिपोर्ट संतोषजनक नहीं थी। कोलकाता के संबंध में कोर्ट के सामने बताया गया कि प्रतिबंध के दावे के बावजूद तीन लोगों की मौत हुई थी। दिल्ली में पिछले एक वर्ष में सात मौतों और हैदराबाद में तीन मौतों का भी उल्लेख हुआ। इससे साफ हुआ कि कानून और जमीनी हकीकत के बीच अभी भी बड़ा अंतर है।


मशीनों के दौर में इंसान क्यों उतर रहा सीवर में?

आज सीवर और मैनहोल की सफाई के लिए मशीनों और आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता बढ़ी है। इसके बावजूद जब मजदूरों को बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के जहरीली गैसों वाले सीवर में उतारा जाता है, तो यह केवल सुरक्षा नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि उनके जीवन को गंभीर खतरे में डालने वाला कदम है।

सरकार की जिम्मेदारी है कि प्रतिबंधित काम को केवल कागजों पर बंद घोषित करने के बजाय जमीन पर उसका प्रभावी पालन सुनिश्चित करे। स्थानीय निकायों को नियमित सर्वे, मशीनों की उपलब्धता, सुरक्षा उपकरण, ठेकेदारों की जवाबदेही और मृतकों के परिवारों को समय पर मुआवजा सुनिश्चित करना होगा।