environment

यूपी सरकार का बड़ा कदम, ऐतिहासिक हुलासखेड़ा को विकसित करने के लिए करोडो रुपये का एलान

उत्तर प्रदेश सरकार ने लखनऊ के मोहनलालगंज स्थित ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व वाले हुलासखेड़ा के पर्यटन विकास के लिए 11.99 करोड़ रुपये की परियोजना को प्रशासनिक एवं वित्तीय मंजूरी दी है। परियोजना के पहले चरण में 6 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। विकास कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की अनुमति, ई-टेंडरिंग, गुणवत्ता नियंत्रण और पर्यावरणीय मानकों का पालन करते हुए उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम द्वारा किए जाएंगे। इस पहल से क्षेत्र में पर्यटन, रोजगार, स्थानीय अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक विरासत संरक्षण को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

Anshuman Mishra07 अग. 2026, 07:45 PM IST
खबर शेयर करें:
यूपी सरकार का बड़ा कदम, ऐतिहासिक हुलासखेड़ा को विकसित करने के लिए करोडो रुपये का एलान

उत्तर प्रदेश: उत्तर प्रदेश सरकार ने लखनऊ के मोहनलालगंज स्थित हुलासखेड़ा के पर्यटन विकास को मंजूरी देकर राज्य की सांस्कृतिक विरासत और पर्यटन अवसंरचना को नई दिशा देने की पहल की है। पर्यटन विभाग द्वारा जारी शासनादेश के अनुसार हुलासखेड़ा पर्यटन विकास परियोजना के लिए 11.99 करोड़ रुपये (जीएसटी सहित) की प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति प्रदान की गई है। इसके साथ ही परियोजना के प्रथम चरण के लिए 6 करोड़ रुपये जारी करने की भी अनुमति दी गई है। इस परियोजना का निर्माण कार्य उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम लिमिटेड (UPRNN) द्वारा कराया जाएगा।


हुलासखेड़ा लखनऊ जिले के मोहनलालगंज तहसील में स्थित एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। शासनादेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि यह Archaeological Importance का स्थल है, इसलिए किसी भी प्रकार का निर्माण कार्य प्रारंभ करने से पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से आवश्यक अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) और अनुमति प्राप्त करना अनिवार्य होगा। इससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि विकास कार्यों के दौरान ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहर को किसी प्रकार की क्षति न पहुंचे।


सरकार का उद्देश्य केवल पर्यटन स्थल का सौंदर्यीकरण करना नहीं है, बल्कि इसे एक सुव्यवस्थित पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करना है, जहां आगंतुकों के लिए बेहतर सड़क, पार्किंग, पैदल मार्ग, प्रकाश व्यवस्था, हरित क्षेत्र, बैठने की व्यवस्था, सूचना केंद्र, शौचालय तथा अन्य आवश्यक पर्यटन सुविधाएं विकसित की जा सकें। हालांकि शासनादेश में कार्यों का विस्तृत तकनीकी विवरण (डीपीआर) अलग से तैयार किए जाने का उल्लेख है, लेकिन यह स्पष्ट किया गया है कि सभी निर्माण कार्य तकनीकी स्वीकृति मिलने के बाद ही शुरू होंगे।


परियोजना के क्रियान्वयन को लेकर शासन ने कई महत्वपूर्ण शर्तें भी निर्धारित की हैं। सभी कार्य ई-टेंडरिंग प्रक्रिया के माध्यम से कराए जाएंगे, जिससे पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके। निर्माण कार्य शुरू होने से पहले विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार कर सक्षम प्राधिकारी से तकनीकी स्वीकृति लेना अनिवार्य होगा। यदि तकनीकी स्वीकृति के दौरान परियोजना लागत प्रशासनिक स्वीकृति से 10 प्रतिशत से अधिक बढ़ती है तो संशोधित लागत का अनुमोदन पुनः लिया जाएगा।


शासनादेश में दिव्यांगजनों के लिए विशेष प्रावधान भी शामिल किए गए हैं। पर्यटन स्थल का विकास भारत सरकार की "Harmonized Guidelines and Standards for Universal Accessibility in India, 2021" के अनुरूप किया जाएगा ताकि दिव्यांग और वरिष्ठ नागरिक भी बिना किसी बाधा के पर्यटन स्थल का उपयोग कर सकें।


गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए परियोजना में थर्ड पार्टी क्वालिटी कंट्रोल एवं ऑडिट की व्यवस्था की गई है। सरकार ने निर्देश दिया है कि निर्माण कार्य निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप हो तथा समय-समय पर इसकी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा जांच कराई जाए। साथ ही परियोजना को निर्माण प्रारंभ होने की तिथि से 12 माह के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है ताकि लागत वृद्धि (Cost Overrun) और समय वृद्धि (Time Overrun) जैसी समस्याओं से बचा जा सके।


शासनादेश में वित्तीय अनुशासन पर भी विशेष जोर दिया गया है। जारी की गई धनराशि केवल स्वीकृत कार्यों पर ही खर्च की जा सकेगी। धनराशि को बैंक खाते में निष्क्रिय रूप से रखने की अनुमति नहीं होगी और यदि उस पर कोई ब्याज अर्जित होता है तो उसे सरकारी कोष में जमा कराना होगा। परियोजना पूरी होने के बाद उपयोगिता प्रमाणपत्र (Utilization Certificate), फोटोग्राफ, प्रगति रिपोर्ट तथा क्लोजर रिपोर्ट सरकार को उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। यदि क्लोजर रिपोर्ट समय पर प्रस्तुत नहीं की जाती है तो संबंधित परियोजना प्रबंधक, अपर परियोजना प्रबंधक तथा ठेकेदार के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने तक की कार्रवाई का प्रावधान किया गया है।


इस परियोजना के तहत सौर ऊर्जा आधारित उपकरणों और सोलर लाइट की खरीद उत्तर प्रदेश नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा विकास अभिकरण (UPNEDA) के माध्यम से किए जाने का भी निर्देश दिया गया है। इसके अतिरिक्त स्थानीय विकास प्राधिकरण से मानचित्र स्वीकृति, पर्यावरणीय अनुमति तथा अन्य सभी वैधानिक मंजूरियां प्राप्त करने के बाद ही निर्माण कार्य प्रारंभ किया जाएगा।


यह परियोजना उत्तर प्रदेश सरकार की व्यापक पर्यटन विकास रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। राज्य सरकार पिछले कुछ वर्षों से धार्मिक, सांस्कृतिक, विरासत और इको-टूरिज्म स्थलों के विकास पर विशेष ध्यान दे रही है। अयोध्या, काशी, मथुरा, नैमिषारण्य, चित्रकूट, विंध्य क्षेत्र और बौद्ध सर्किट के साथ-साथ अब कम चर्चित ऐतिहासिक स्थलों को भी पर्यटन मानचित्र पर लाने का प्रयास किया जा रहा है। हुलासखेड़ा जैसे पुरातात्विक स्थल का विकास इसी रणनीति को मजबूत करेगा।


विशेषज्ञों का मानना है कि किसी ऐतिहासिक स्थल का संरक्षण और पर्यटन विकास साथ-साथ किया जाए तो स्थानीय अर्थव्यवस्था को बड़ा लाभ मिलता है। पर्यटन बढ़ने से स्थानीय युवाओं के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। होटल, होमस्टे, स्थानीय हस्तशिल्प, परिवहन, खानपान और छोटे व्यवसायों को नई संभावनाएं मिलती हैं। साथ ही क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित होती है और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण भी सुनिश्चित होता है।


हालांकि शासनादेश में पर्यटकों की संभावित संख्या, प्रस्तावित सुविधाओं की विस्तृत सूची या परियोजना के अंतिम डिजाइन का उल्लेख नहीं किया गया है। यह जानकारी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार होने के बाद सामने आएगी। फिलहाल उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेज यह पुष्टि करता है कि परियोजना को प्रशासनिक और वित्तीय मंजूरी मिल चुकी है, प्रथम चरण की धनराशि जारी कर दी गई है तथा सभी कार्य पुरातात्विक संरक्षण, पारदर्शिता, गुणवत्ता नियंत्रण और वित्तीय अनुशासन के निर्धारित मानकों का पालन करते हुए पूरे किए जाएंगे।