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सरकारी स्कूलों में खाने की गुणवत्ता पर सवाल

सरकारी और आवासीय स्कूलों में बच्चों को दिए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों से खराब गुणवत्ता और एक्सपायर्ड खाद्य सामग्री को लेकर शिकायतें सामने आई हैं। इन घटनाओं ने स्कूलों में भोजन की खरीद, भंडारण और गुणवत्ता जांच की व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

Neha Sharma29 अग. 2026, 01:44 PM IST
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सरकारी स्कूलों में खाने की गुणवत्ता पर सवाल

सरकारी और आवासीय स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को दिए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मध्य प्रदेश समेत कई राज्यों के स्कूलों और आवासीय परिसरों से बच्चों ने भोजन की गुणवत्ता और बुनियादी सुविधाओं को लेकर शिकायतें की हैं। कुछ मामलों में खराब गुणवत्ता या एक्सपायर्ड खाद्य सामग्री दिए जाने की शिकायत भी सामने आई है। इन घटनाओं ने स्कूलों में भोजन की खरीद, भंडारण, जांच और वितरण की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।


कई राज्यों में छात्रों ने जताई नाराजगी

20 अगस्त 2026 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई और अगस्त के दौरान देश के कम से कम 10 राज्यों के 25 जिलों में छात्रों ने स्कूलों और आवासीय परिसरों में बुनियादी सुविधाओं को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। छात्रों की शिकायतों में भोजन की गुणवत्ता के साथ-साथ पीने का पानी, शौचालय, बिजली, स्कूल भवन और हॉस्टल की सुविधाएं शामिल थीं। रिपोर्ट में मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के कुछ आवासीय स्कूलों में छात्रों की ओर से खराब गुणवत्ता वाले या एक्सपायर्ड भोजन को लेकर शिकायतों का भी उल्लेख किया गया है।


मध्य प्रदेश के धार में छात्राओं का विरोध

मध्य प्रदेश के धार जिले स्थित माता शबरी कन्या शिक्षा परिसर में 18 अगस्त को छात्राओं ने हॉस्टल की सुविधाओं और भोजन को लेकर विरोध जताया। आवासीय स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए भोजन का महत्व और भी ज्यादा है, क्योंकि उनका रोजाना का भोजन काफी हद तक हॉस्टल या स्कूल की व्यवस्था पर निर्भर करता है। ऐसे में अगर भोजन की गुणवत्ता को लेकर शिकायत सामने आती है तो सिर्फ खाना बनाने वाली व्यवस्था ही नहीं, बल्कि खाद्य सामग्री की खरीद, स्टोरेज और नियमित जांच की पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठता है।


एक्सपायर्ड भोजन स्कूल तक पहुंचा तो जिम्मेदारी किसकी?

अगर किसी सरकारी स्कूल या हॉस्टल में एक्सपायर्ड खाद्य सामग्री पाई जाती है, तो सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह सामग्री बच्चों तक पहुंचने से पहले जांच में क्यों नहीं पकड़ी गई। खाद्य सामग्री की खरीद के बाद उसे निर्धारित परिस्थितियों में रखना, उसकी पैकिंग और एक्सपायरी डेट की जांच करना तथा भोजन तैयार करने से पहले उसकी गुणवत्ता देखना जरूरी है। इसके बाद भी यदि खराब या एक्सपायर्ड सामान बच्चों को परोसा जाता है तो यह निगरानी व्यवस्था में गंभीर कमी का संकेत हो सकता है। मामले में यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि संबंधित खाद्य सामग्री कब खरीदी गई थी, उसकी एक्सपायरी डेट क्या थी, स्टोर में उसका निरीक्षण कब हुआ और भोजन तैयार करने से पहले उसकी जांच किस अधिकारी या कर्मचारी ने की थी।


दूसरे राज्यों में भी सामने आ चुकी हैं शिकायतें

स्कूलों में भोजन की गुणवत्ता को लेकर इस तरह की शिकायतें केवल एक राज्य तक सीमित नहीं हैं। कर्नाटक में भी सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले खाद्यान्न में कीड़े मिलने की घटनाएं सामने आई थीं। राज्य खाद्य आयोग की ओर से किए गए निरीक्षण में कुछ जिलों के सरकारी स्कूलों में प्रभावित चावल और दाल मिलने की बात सामने आई थी। इसके बाद संबंधित खाद्यान्न को वापस भेजकर नए खाद्यान्न की व्यवस्था की गई थी। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि सरकारी स्कूलों में बच्चों के भोजन की निगरानी केवल कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि स्कूल स्तर पर नियमित और प्रभावी निरीक्षण जरूरी है।


बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ा है मामला

स्कूल में मिलने वाला भोजन बच्चों के पोषण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। खासकर आवासीय स्कूलों में रहने वाले बच्चों के लिए भोजन की गुणवत्ता सीधे उनके स्वास्थ्य से जुड़ी होती है। खराब या दूषित खाद्य सामग्री खाने से बच्चों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसलिए किसी भी स्कूल में ऐसी शिकायत मिलने के बाद सिर्फ संबंधित भोजन को हटाना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि लापरवाही किस स्तर पर हुई और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न बने, इसके लिए क्या व्यवस्था की गई।


जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग

ऐसे मामलों में अभिभावकों और स्थानीय लोगों की सबसे बड़ी मांग यही रहती है कि बच्चों के भोजन की गुणवत्ता की नियमित जांच हो और लापरवाही पाए जाने पर जिम्मेदारी तय की जाए। प्रशासन को स्कूलों में खाद्य सामग्री के स्टॉक की नियमित जांच, एक्सपायरी डेट की निगरानी और भोजन की गुणवत्ता के निरीक्षण की व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए। साथ ही शिकायत मिलने पर उसकी स्वतंत्र जांच और कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक करना भी जरूरी है।


आखिर बच्चों के लिए ही समझौता क्यों?

सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को मिलने वाला भोजन किसी भी तरह से कम गुणवत्ता वाला नहीं होना चाहिए। सवाल सिर्फ एक प्लेट भोजन का नहीं, बल्कि उन बच्चों के स्वास्थ्य और उनके अधिकार का है जिनके लिए सरकार करोड़ों रुपये की योजनाएं संचालित करती है। ऐसे में यह सवाल जरूर उठता है कि क्या सत्ता और व्यवस्था में बैठे लोग अपने बच्चों के लिए भी वही भोजन स्वीकार करेंगे, जिसे सरकारी स्कूलों के बच्चों के सामने परोसा जा रहा है? यह सवाल किसी राजनीतिक बयान से ज्यादा सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही से जुड़ा है। बच्चों के भोजन की गुणवत्ता में किसी भी तरह की लापरवाही सामने आती है तो उसकी निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई जरूरी है।