महिला-सुरक्षा
तलाक के बिना दूसरी शादी अवैध, ऐसी पत्नी को भरण-पोषण पाने का अधिकार नहीं: हाई कोर्ट
बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि कोई महिला अपने पिछले विवाह को छिपाकर बिना तलाक लिए दूसरी शादी करती है, तो वह विवाह अवैध माना जाएगा और वह अपने दूसरे पति से भरण-पोषण (मेंटेनेंस) पाने की हकदार नहीं होगी। न्यायमूर्ति एम.एम. साठे की एकल पीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए महिला की 15 हजार रुपये मासिक गुजारा भत्ते की याचिका को खारिज कर दिया, हालांकि उसके नाबालिग बच्चे के लिए 1,000 रुपये के मेंटेनेंस को बरकरार रखा है।
Vindhya Dubey19 जुल. 2026, 06:31 PM IST

यह फैसला देश में वैवाहिक विवादों और भरण-पोषण के मामलों में एक बड़ी कानूनी नजीर स्थापित करता है, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि कानून के लाभकारी प्रावधानों का लाभ कोई भी व्यक्ति धोखाधड़ी या तथ्यों को छिपाकर नहीं उठा सकता। अदालत ने यह साफ कर दिया कि जब बुनियादी रिश्ता ही धोखे पर आधारित हो, तो महिला को कानूनी रूप से ब्याहता पत्नी की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता और न ही वह बेहद संक्षिप्त अवधि के सहजीवन के आधार पर लिव-इन रिलेशनशिप की सुरक्षा का दावा कर सकती है।
मामले के विवरण के अनुसार, इस केस से जुड़े जोड़े का विवाह 28 जनवरी 2009 को हुआ था। शादी के कुछ समय बाद ही दोनों में अनबन हो गई और महिला अपने मायके चली गई, जहां उसने एक बेटे को जन्म दिया। महिला ने आरोप लगाया था कि उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और घर से निकाल दिया गया। इसके विपरीत, पति ने अदालत में दलील दी कि महिला पहले से शादीशुदा थी और उसने अपने पहले पति से कानूनी रूप से तलाक लिए बिना ही उससे दूसरी शादी रचाई थी, जिसके कारण निचली अदालत ने इस विवाह को अमान्य (शून्य) घोषित कर दिया था।
इससे पहले, भिवंडी मजिस्ट्रेट कोर्ट ने साल 2015 में महिला के लिए दो हजार रुपये और उसके बेटे के लिए एक हजार रुपये का भरण-पोषण तय किया था। इसके बाद पति ने सत्र न्यायालय (सेशंस कोर्ट) का रुख किया, जिसने तथ्यों की समीक्षा करते हुए महिला के मेंटेनेंस को तो बंद कर दिया लेकिन बच्चे के गुजारे भत्ते को जारी रखा। इसके खिलाफ महिला ने बॉम्बे हाई कोर्ट में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत याचिका दायर की थी।
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति एम.एम. साठे ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 जैसी धर्मनिरपेक्ष और लाभकारी कानूनी व्यवस्था के तहत कोई भी पक्ष अपने स्वयं के गलत कृत्यों का फायदा नहीं उठा सकता। अदालत ने फैसले में दर्ज किया कि तथ्यों को छिपाना और धोखा देना याचिकाकर्ता के मामले को पूरी तरह से कमजोर करता है। कानून में पत्नी शब्द का अर्थ केवल वैध रूप से विवाहित महिला से है, न कि कपटपूर्ण विवाह करने वाली महिला से।
महिला ने वैकल्पिक तौर पर लिव-इन रिलेशनशिप के आधार पर भी मेंटेनेंस की मांग की थी, जिसे हाई कोर्ट ने पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि महिला अपने कथित दूसरे पति के साथ मात्र तीन महीने से कुछ दिन ज्यादा रही है और इसके बाद दोनों के बीच लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हो गई। अदालत के अनुसार, इतने कम समय के सहजीवन को एक तर्कसंगत और लंबी अवधि का वैवाहिक संबंध नहीं माना जा सकता, जो लिव-इन रिलेशनशिप के मानकों को पूरा करता हो।
