महिला-सुरक्षा
लिव-इन रिलेशनशिप में महिलाओं को भी मिलेगी IPC 498A की सुरक्षा, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A का उद्देश्य महिलाओं को घरेलू उत्पीड़न से बचाना है, न कि केवल वैध विवाह तक इसकी सीमाएं तय करना। अदालत ने इस भेदभाव को संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के अधिकार के विपरीत बताते हुए "पति" शब्द की व्यापक व्याख्या की और स्पष्ट किया कि यह संरक्षण उन लिव-इन रिश्तों पर भी लागू होगा जो वास्तव में "शादी जैसे रिश्ते" की श्रेणी में आते हैं।

नई दिल्ली, 3 अगस्त 2026।
देश में लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े कानूनों की दिशा बदलने वाले एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (3 अगस्त) को कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 की धारा 498A का संरक्षण केवल विधिक रूप से विवाहित महिलाओं तक सीमित नहीं रहेगा। यदि कोई महिला ऐसे "शादी जैसे रिश्ते" (Relationship in the Nature of Marriage) में रह रही है, जिसमें विवाह करने का स्पष्ट इरादा और वैवाहिक जीवन जैसी परिस्थितियां मौजूद हों, तो उसे भी घरेलू क्रूरता के खिलाफ धारा 498A के तहत कानूनी सुरक्षा प्राप्त होगी।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि केवल इस आधार पर किसी महिला को कानूनी सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसका रिश्ता औपचारिक विवाह में नहीं बदला। अदालत ने कहा कि ऐसा भेद संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार के विपरीत होगा।
क्या था पूरा मामला?
मामला कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले से जुड़ा था, जिसमें एक व्यक्ति के खिलाफ IPC की धारा 498A के तहत दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार किया गया था। आरोपी का तर्क था कि शिकायतकर्ता से उसका कोई वैध विवाह नहीं हुआ था, इसलिए उसके खिलाफ धारा 498A लागू नहीं हो सकती। वहीं महिला का कहना था कि दोनों लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे और उनका रिश्ता पूरी तरह विवाह जैसा था।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने माना था कि धारा 498A में प्रयुक्त "पति" शब्द की व्याख्या केवल तकनीकी रूप से वैध विवाह तक सीमित नहीं हो सकती। इसी आदेश को चुनौती देते हुए आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 498A का मूल उद्देश्य महिलाओं को घरेलू क्रूरता, मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न से बचाना है। यदि कोई महिला विवाह जैसे संबंध में रहते हुए प्रताड़ना झेलती है, तो केवल औपचारिक विवाह न होने के कारण उसे कानून के संरक्षण से बाहर नहीं रखा जा सकता। अदालत ने कहा कि यह मान लेना कि घरेलू क्रूरता केवल वैध विवाह के बाद ही संभव है, कानून के उद्देश्य को अत्यधिक संकीर्ण तरीके से देखने जैसा होगा।
अनुच्छेद 14 और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर जोर
पीठ ने कहा कि जब संविधान प्रत्येक वयस्क को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने और उसके साथ रहने की स्वतंत्रता देता है, तो उसी संबंध में उत्पीड़न होने पर कानूनी सुरक्षा से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने K.S. Puttaswamy बनाम Union of India (2017) और Shafin Jahan बनाम Asokan K.M. (2018) के फैसलों का उल्लेख करते हुए निजता, गरिमा और पसंद के रिश्ते को मौलिक अधिकारों का हिस्सा बताया।
किन लिव-इन रिश्तों पर लागू होगा फैसला?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय हर लिव-इन रिलेशनशिप पर स्वतः लागू नहीं होगा। केवल वही संबंध इस संरक्षण के दायरे में आएंगे—
जो वास्तव में "Relationship in the Nature of Marriage" हों।
जिनमें दोनों पक्ष बालिग हों।
रिश्ता आपसी सहमति से बना हो।
दोनों के बीच विवाह करने का स्पष्ट इरादा और वैवाहिक जीवन जैसी परिस्थितियां मौजूद हों।
गिरफ्तारी को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश
अदालत ने कहा कि इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि ऐसे मामलों में स्वतः गिरफ्तारी की जाएगी। पुलिस को Arnesh Kumar बनाम State of Bihar मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करना होगा। यानी किसी भी आरोपी या उसके परिजनों की गिरफ्तारी से पहले आवश्यक प्रारंभिक जांच और कानूनी प्रक्रिया अपनाना अनिवार्य रहेगा।
फैसले के प्रमुख निष्कर्ष
IPC की धारा 498A "शादी जैसे रिश्ते" वाले लिव-इन रिलेशनशिप पर भी लागू होगी।
संरक्षण केवल वास्तविक वैवाहिक प्रकृति वाले संबंधों तक सीमित रहेगा।
दोनों पक्षों का बालिग होना और रिश्ता आपसी सहमति से होना आवश्यक होगा।
यह विस्तृत व्याख्या फिलहाल केवल IPC की धारा 498A तक सीमित रहेगी और अन्य कानूनी प्रावधानों पर स्वतः लागू नहीं होगी।
गिरफ्तारी से पहले Arnesh Kumar फैसले के दिशा-निर्देशों का पालन अनिवार्य होगा।
फैसले का महत्व
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं के अधिकारों को महत्वपूर्ण कानूनी संरक्षण प्रदान करेगा। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि केवल लिव-इन रिलेशनशिप का दावा कर देने मात्र से धारा 498A लागू नहीं होगी। प्रत्येक मामले में अदालत यह जांच करेगी कि संबंधित रिश्ता वास्तव में "शादी जैसे रिश्ते" की कानूनी कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं।
मामले का शीर्षक: X & Ors. vs State of Karnataka & Anr.
