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धारा 125 CrPC के मामलों में देरी नहीं होगी, धारा 340 की अर्जी फैसला रोकने का आधार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

गुज़ारा-भत्ते के मामलों में देरी की कोशिशों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रोक लगाते हुए कहा है कि धारा 125 CrPC के तहत सुरक्षित रखे गए फैसले को धारा 340 CrPC की अर्जी के नाम पर लंबित नहीं रखा जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि दोनों कार्यवाहियां अलग-अलग हैं और एक का दूसरे के फैसले पर कोई असर नहीं पड़ता।

Sonali20 जुल. 2026, 09:57 PM IST
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धारा 125 CrPC के मामलों में देरी नहीं होगी, धारा 340 की अर्जी फैसला रोकने का आधार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुजारा-भत्ते (मेंटेनेंस) से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण कानूनी स्पष्टता देते हुए कहा है कि यदि किसी मामले में धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत फैसला सुरक्षित रखे जाने के बाद धारा 340 CrPC के तहत झूठे साक्ष्य या जालसाजी के आरोपों संबंधी अर्जी दायर की जाती है, तो केवल इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट अपने निर्णय को टालने के लिए बाध्य नहीं होगा। अदालत ने कहा कि धारा 340 की कार्यवाही स्वतंत्र प्रकृति की होती है और उसका निस्तारण अलग से किया जा सकता है।
13 जुलाई 2026 को न्यायमूर्ति लक्ष्मी कांत शुक्ला की एकलपीठ ने उमेश विद्यार्थी बनाम मधुबाला एवं अन्य (क्रिमिनल रिवीजन संख्या 5330/2025) मामले में यह फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने पति द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट, सोनभद्र के आदेश को बरकरार रखा।
मामले के अनुसार, पत्नी ने धारा 125 CrPC के तहत गुजारा-भत्ते की मांग की थी। फैमिली कोर्ट ने पति को आवेदन की तिथि से 15,000 रुपये प्रतिमाह तथा आदेश की तिथि से 20,000 रुपये प्रतिमाह गुजारा-भत्ता देने का निर्देश दिया था। इसके बाद पति ने हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि पत्नी ने फर्जी दस्तावेज पेश किए हैं और इस संबंध में धारा 340 CrPC के तहत आवेदन लंबित होने के बावजूद फैमिली कोर्ट ने फैसला सुना दिया।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि धारा 340 CrPC का आवेदन अंतिम बहस पूरी होने और फैसला सुरक्षित रखे जाने के बाद दायर किया गया था। ऐसे में ट्रायल कोर्ट द्वारा पहले से सुरक्षित निर्णय सुनाने में कोई कानूनी त्रुटि नहीं थी। अदालत ने कहा कि केवल इस प्रकार का आवेदन दाखिल कर देने से न्यायालय पर फैसला टालने का दायित्व नहीं आ जाता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी पक्ष को धारा 340 CrPC के तहत कार्रवाई करनी है, तो वह कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ सकता है। लेकिन उस प्रक्रिया का उपयोग धारा 125 CrPC के तहत लंबित गुजारा-भत्ते की कार्यवाही को अनावश्यक रूप से लंबा करने के लिए नहीं किया जा सकता।
गुजारा-भत्ते की राशि पर भी हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार किया। अदालत ने कहा कि फैमिली कोर्ट ने पति की आय, आर्थिक स्थिति और उपलब्ध साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए राशि निर्धारित की थी। इसलिए आदेश में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि, मनमानी या अधिकार क्षेत्र संबंधी गलती नहीं पाई गई। परिणामस्वरूप पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी गई।