महिला-सुरक्षा

पारिवारिक विवाद में नौकरी को हथियार बनाना ठीक नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान जताई चिंता

क्या वैवाहिक विवाद के दौरान पति के नियोक्ता (Employer) को शिकायत भेजना उचित है? इस बढ़ती प्रवृत्ति पर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि ऐसे कदम पति की नौकरी पर असर डाल सकते हैं, जिसका सीधा प्रभाव भरण-पोषण (Maintenance) और पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति पर पड़ सकता है.

Sonali21 जुल. 2026, 07:08 PM IST
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पारिवारिक विवाद में नौकरी को हथियार बनाना ठीक नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवादों के दौरान पति के नियोक्ता (Employer) को शिकायत भेजने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। 16 जुलाई 2026 को जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत के सामने पहले भी ऐसे मामले आए हैं, जिनमें पत्नियों द्वारा पति के नियोक्ता (Employer) को शिकायत भेजे जाने के बाद उनकी नौकरी प्रभावित हुई या समाप्त हो गई। अदालत ने कहा कि यदि पति की नौकरी चली जाती है, तो इसका सीधा असर भरण-पोषण (Maintenance) के भुगतान पर पड़ेगा, जिससे अंततः पत्नी और बच्चों को भी नुकसान हो सकता है।

क्या था मामला?
सुप्रीम कोर्ट एक महिला द्वारा दायर ट्रांसफर याचिका पर सुनवाई कर रहा था। महिला ने अपने पति के मित्र द्वारा उसके खिलाफ दायर मानहानि (Defamation) के मुकदमे को दूसरे राज्य में स्थानांतरित करने की मांग की थी। सुनवाई के दौरान यह मुद्दा उठा कि वैवाहिक मुकदमों के दौरान कई बार पत्नियां पति के नियोक्ता (Employer) को शिकायत भेजती हैं, जिससे उसकी नौकरी प्रभावित होती है।
पत्नी की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि उनकी मुवक्किल ने पति के नियोक्ता (Employer) को शिकायत दुर्भावना से नहीं भेजी थी। उन्होंने कहा कि पति ने उसके खिलाफ चोरी की झूठी शिकायत दर्ज कराई थी और कथित चोरी की वस्तु का पता लगाने तथा अपना बचाव करने के उद्देश्य से ही नियोक्ता (Employer) से संपर्क किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने कहा कि अदालत के सामने पहले भी ऐसे कई मामले आए हैं, जिनमें वैवाहिक विवाद लंबित रहने के दौरान पत्नियों ने पति के नियोक्ता (Employer) को शिकायतें भेजीं और उसके परिणामस्वरूप पति की नौकरी चली गई। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में यह भी सोचना होगा कि यदि पति बेरोजगार हो जाएगा, तो वह भरण-पोषण (Maintenance) की राशि कैसे देगा। इसलिए ऐसे कदमों के दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यह सुनवाई के दौरान की गई मौखिक टिप्पणी (Oral Observation) थी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कोई अंतिम कानूनी सिद्धांत या बाध्यकारी निर्देश जारी नहीं किया है।

अदालतों का अब तक क्या रहा है दृष्टिकोण?
भारतीय अदालतें पहले भी स्पष्ट कर चुकी हैं कि यदि किसी व्यक्ति के नियोक्ता (Employer) को दुर्भावनापूर्ण या झूठे आरोपों के साथ शिकायत भेजकर उसकी प्रतिष्ठा या नौकरी को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया जाता है, तो परिस्थितियों के अनुसार यह मानहानि (Defamation) या अन्य कानूनी कार्रवाई का आधार बन सकता है। वहीं, यदि शिकायत वास्तविक तथ्यों और सद्भावना के आधार पर की गई हो, तो उसका मूल्यांकन प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के अनुसार किया जाता है। इसलिए इस विषय पर कोई एक समान नियम नहीं है और हर मामले का फैसला उसके तथ्यों के आधार पर किया जाता है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि वैवाहिक विवादों में कानूनी अधिकारों का प्रयोग करते समय ऐसे कदमों से बचना चाहिए, जिनका अनावश्यक प्रभाव किसी पक्ष की आजीविका पर पड़े और जिसका नुकसान अंततः दोनों पक्षों तथा बच्चों को उठाना पड़े।