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लॉ कॉलेजों को BCI नियंत्रित कर सकता है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने उठाया बड़ा सवाल, कहा- ‘कानूनी शिक्षा के विशेषज्ञ कौन हैं?’
सुप्रीम कोर्ट ने लॉ कॉलेजों और कानूनी शिक्षा के नियमन में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की भूमिका को लेकर अहम सवाल उठाया है। अदालत ने पूछा कि BCI को लॉ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को नियंत्रित करने का अधिकार किस वैधानिक प्रावधान के तहत मिला है और क्या वह कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में नियामक की भूमिका निभा सकता है। मामले में कोर्ट ने BCI से जवाब मांगा है।

नई दिल्ली।
सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की ओर से लॉ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के नियमन को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल उठाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि अदालत यह जांचेगी कि क्या BCI को कानून के तहत लॉ कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को नियंत्रित करने और उनका नियमन करने का अधिकार प्राप्त है। मामले में कोर्ट ने BCI को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी BCI-PEARL FIRST ट्रस्ट के कामकाज और इस ट्रस्ट द्वारा लॉ संस्थानों की स्थापना को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आई। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने BCI के ट्रस्ट के गठन, उसकी संपत्तियों और उसके माध्यम से लॉ कॉलेजों की स्थापना को लेकर सवाल उठाए। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने BCI की वैधानिक भूमिका और कानूनी शिक्षा के नियमन के बीच अंतर पर सवाल किया। उन्होंने पूछा कि जब BCI मूल रूप से कानूनी पेशे और वकालत के लिए लाइसेंस प्राप्त करने वाले अधिवक्ताओं के नियमन से जुड़ी संस्था है, तो क्या उसका अधिकार लॉ स्कूल या विश्वविद्यालय के शैक्षणिक और प्रशासनिक नियंत्रण तक भी विस्तारित हो सकता है।
पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि कानूनी शिक्षा को नियंत्रित करने के लिए BCI को विशेषज्ञ संस्था क्यों माना जाए, जबकि इस क्षेत्र में कानून के विद्वान और शिक्षाविद भी मौजूद हैं। अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि BCI सामान्य दिशा-निर्देश तय कर सकता है, जैसे कानून की पढ़ाई चार या पांच साल की हो, लेकिन इससे आगे जाकर शैक्षणिक संस्थानों पर नियंत्रण का सवाल अलग है। याचिकाकर्ता प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि वर्ष 2016 में BCI ने अपने पुराने ट्रस्ट को समाप्त करने और उसकी धनराशि नए ट्रस्ट में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया था। उन्होंने BCI-PEARL FIRST ट्रस्ट के गठन और उससे जुड़े वित्तीय तथा प्रशासनिक पहलुओं पर भी सवाल उठाए। उनके अनुसार, इसी ट्रस्ट के माध्यम से गोवा और आंध्र प्रदेश में लॉ कॉलेज स्थापित किए गए। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि संबंधित कानूनों के तहत इन संस्थानों की कार्यकारी परिषद में 35 में से 27 सदस्यों को BCI द्वारा नामित किए जाने का प्रावधान है। उनका कहना था कि यदि कोई संस्था स्वयं लॉ कॉलेज चलाती है और साथ ही उसी क्षेत्र की नियामक भी है, तो इससे नियामक और संस्थान के बीच हितों के टकराव का सवाल पैदा होता है।
BCI की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्ण कुमार ने अदालत को बताया कि आजीवन ट्रस्टी बनाए जाने की व्यवस्था को बाद में समाप्त कर दिया गया है और अब ट्रस्टी का कार्यकाल BCI में उसके पद से जुड़ा रहेगा। इस तरह BCI की ओर से ट्रस्ट की संरचना में किए गए बदलावों का भी अदालत के सामने उल्लेख किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन मुद्दों पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। अदालत ने BCI से जवाब मांगा है और आगे की सुनवाई में यह जांच की जाएगी कि Advocates Act, 1961 के तहत BCI की वैधानिक शक्तियां कानून की शिक्षा देने वाले संस्थानों के प्रत्यक्ष नियमन और नियंत्रण तक कितनी विस्तृत हैं। मामले का शीर्षक Girish Mittal v. Bar Council of India है और यह W.P.(C) No. 1115/2026 के तहत लंबित है।
