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NLU प्रयागराज में जातिगत भेदभाव के आरोपों पर इलाहाबाद HC सख्त, न्यायिक जांच के आदेश पर लगाई रोक

NLU प्रयागराज में जातिगत भेदभाव और अपमान के आरोपों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिंगल जज के न्यायिक अधिकारियों से जांच कराने के आदेश पर रोक लगा दी है। डिवीजन बेंच ने प्रथम दृष्टया कहा कि यूनिवर्सिटी की Equal Opportunity Cell को इन आरोपों की जांच का अवसर दिया जाना चाहिए था। कोर्ट ने मामले में आगे की कार्यवाही अगली सुनवाई तक रोक दी है।

Sonali28 सित. 2026, 08:41 PM IST
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NLU प्रयागराज में जातिगत भेदभाव के आरोपों पर इलाहाबाद HC सख्त, न्यायिक जांच के आदेश पर लगाई रोक

प्रयागराज। 

डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, प्रयागराज में जातिगत अपमान और भेदभाव के आरोपों से जुड़े मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिंगल जज के उस आदेश पर सवाल उठाए हैं, जिसमें आरोपों की जांच के लिए न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त किया गया था। जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस कुनाल रवि सिंह की खंडपीठ ने प्रथम दृष्टया कहा कि यूनिवर्सिटी की Equal Opportunity Cell को शिकायतों की जांच करने का अवसर दिया जाना चाहिए था। डिवीजन बेंच ने मामले में आगे की कार्यवाही पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। यह मामला यूनिवर्सिटी के दो छात्रों की शिकायतों से जुड़ा है। इनमें एक पीएचडी रिसर्च स्कॉलर और पांचवें सेमेस्टर का बीए एलएलबी (ऑनर्स) छात्र शामिल है। दोनों ने लॉ विभाग के प्रमुख और बॉयज हॉस्टल के वार्डन के खिलाफ जाति के आधार पर अपमान और भेदभाव के आरोप लगाए हैं।

‘जातिगत अपमान और प्रतिशोध’ का लगाया आरोप

पांचवें सेमेस्टर के छात्र ने 20 अगस्त 2026 को यूनिवर्सिटी के कुलपति को शिकायत दी थी। छात्र का आरोप था कि संबंधित शिक्षक ने अपनी अकादमिक और प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल “जातिगत अपमान और प्रतिशोध” के साधन के रूप में किया। शिकायत में छात्र ने आरोप लगाया कि चौथे सेमेस्टर की शुरुआत में शिक्षक ने उससे कहा था कि जिसने Constitutional Law में सबसे ज्यादा अंक हासिल किए हैं, वह अब उनके विषय में सबसे ज्यादा अंक हासिल करके दिखाए। छात्र ने दावा किया कि उसकी उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन उसकी जाति के कारण अधिक सख्ती से किया गया। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि संबंधित फैकल्टी सदस्य ने सार्वजनिक रूप से जाति और आरक्षण को लेकर अपमानजनक टिप्पणियां कीं। छात्र के अनुसार, उससे कथित तौर पर पूछा गया था, “तुम तो अच्छी फैमिली से हो, तुम्हें रिजर्वेशन क्यों चाहिए?”

छात्र ने आरक्षित वर्ग के तहत नियुक्त एक फैकल्टी सदस्य को लेकर कथित टिप्पणियों का भी शिकायत में उल्लेख किया।

सिंगल जज ने न्यायिक अधिकारियों से जांच का दिया था आदेश

मामले की पहले सुनवाई कर रहे सिंगल जज ने आरोपों को गंभीर मानते हुए निष्पक्ष जांच की आवश्यकता बताई थी। हालांकि, अदालत ने उस समय स्पष्ट किया था कि वह आरोपों की सत्यता पर कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं कर रही है। सिंगल जज ने प्रयागराज जिला न्यायालय की स्मॉल कॉज कोर्ट की जज अर्चना सिंह-I और प्रयागराज के स्पेशल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट अरुण कुमार यादव को जांच अधिकारी नियुक्त किया था। उन्हें यह पता लगाने के लिए जांच करने को कहा गया था कि क्या SC-ST समुदाय से जुड़े छात्रों को संबंधित व्यक्ति या यूनिवर्सिटी में कार्यरत किसी अन्य व्यक्ति द्वारा जातिगत अपमान या भेदभाव का सामना करना पड़ा।

डिवीजन बेंच ने उठाया जांच की प्रक्रिया पर सवाल

सिंगल जज के आदेश के खिलाफ विशेष अपील डिवीजन बेंच के सामने दाखिल की गई। सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि यूनिवर्सिटी में पहले से ही Equal Opportunity Cell मौजूद है। यह भी बताया गया कि छात्रों ने शुरुआत में इसी संस्थागत व्यवस्था के तहत शिकायत की जांच कराने की मांग की थी और संबंधित व्यक्ति को जांच प्रक्रिया से बाहर रखने की बात कही थी। अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि ऐसी स्थिति में जांच यूनिवर्सिटी की निर्धारित संस्थागत व्यवस्था के तहत होनी चाहिए थी, न कि न्यायिक अधिकारियों के माध्यम से। वहीं यूनिवर्सिटी की ओर से कहा गया कि रिट कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कोर्ट द्वारा प्रस्तावित समिति के गठन पर उसने सहमति जताई थी। छात्रों की ओर से भी कोर्ट को बताया गया कि उन्होंने शुरुआत में Equal Opportunity Cell के नियमों के तहत जांच की मांग की थी। हालांकि, बाद में यूनिवर्सिटी द्वारा कोर्ट के प्रस्ताव पर सहमति जताने के बाद उन्होंने न्यायिक अधिकारियों से जांच पर आपत्ति नहीं की।

अगली सुनवाई तक कार्यवाही पर रोक

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस कुनाल रवि सिंह की पीठ ने सिंगल जज के आदेश के तहत चल रही आगे की कार्यवाही पर अगली सूचीबद्ध सुनवाई तक रोक लगा दी। डिवीजन बेंच ने प्रथम दृष्टया यह सवाल उठाया कि जब यूनिवर्सिटी में Equal Opportunity Cell पहले से मौजूद है और छात्रों ने भी उस व्यवस्था के तहत जांच की मांग की थी, तो आरोपों की जांच के लिए सीधे न्यायिक अधिकारियों को नियुक्त करने का आदेश क्यों दिया गया। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस स्तर पर जातिगत भेदभाव के आरोप सही हैं या गलत, इस पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। मामला अब विशेष अपील में आगे सुना जाएगा।

केस: Dr. Rajendra Prasad National Law University, Prayagraj से संबंधित विशेष अपील
पीठ: जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस कुनाल रवि सिंह