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बिहार में पहली बार TAS-1 सर्वे पास; 57 में से 55 इकाइयों ने हासिल की सफलता
बिहार ने दशकों से राज्य के कई परिवारों को प्रभावित करने वाली लिम्फैटिक फाइलेरियासिस यानी लसीका फाइलेरियासिस के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। वर्ष 2004 में मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन यानी MDA अभियान शुरू होने के बाद पहली बार बिहार ने ट्रांसमिशन असेसमेंट सर्वे यानी TAS-1 को सफलतापूर्वक पार किया है। यह उपलब्धि राज्य के फाइलेरियासिस उन्मूलन कार्यक्रम के लिए एक बड़ा मील का पत्थर मानी जा रही है।

TAS एक मानकीकृत सर्वेक्षण है, जिसके जरिए यह पता लगाया जाता है कि किसी क्षेत्र में लिम्फैटिक फाइलेरियासिस का संक्रमण उस स्तर से नीचे पहुंच गया है या नहीं, जहां नए संक्रमण को रोकना संभव हो। किसी क्षेत्र के TAS में सफल होने के बाद राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत वहां मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन यानी सामूहिक दवा सेवन अभियान को बंद करने और पोस्ट-MDA सर्विलांस यानी दवा अभियान के बाद लगातार निगरानी के चरण में जाने का रास्ता खुलता है। बिहार की यह सफलता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत ने वर्ष 2027 तक लिम्फैटिक फाइलेरियासिस को सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में समाप्त करने का लक्ष्य रखा है। मई 2026 तक देश के 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 350 जिलों में यह बीमारी स्थानिक यानी एंडेमिक रूप में मौजूद है।
बिहार देश के सबसे चुनौतीपूर्ण राज्यों में शामिल
बिहार में फाइलेरियासिस उन्मूलन की चुनौती काफी बड़ी रही है। राज्य के सभी 38 जिले और 592 कार्यान्वयन इकाइयां यानी Implementation Units इस बीमारी के लिए एंडेमिक घोषित क्षेत्रों में शामिल हैं। ऐसे में चार जिलों अररिया, मधेपुरा, सुपौल और किशनगंज का TAS-1 के लिए पात्र होना और उसके बाद सर्वेक्षण के परिणामों में बड़ी सफलता हासिल करना राज्य के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इन चार जिलों को TAS-1 के लिए तभी चुना गया जब उन्होंने निर्धारित कड़े पात्रता मानकों को पूरा किया। इनमें कई प्रभावी दौर के MDA अभियान, दवा सेवन का उच्च कवरेज और प्री-असेसमेंट सर्वेक्षण में आवश्यक मानकों को सफलतापूर्वक पूरा करना शामिल था। 57 कार्यान्वयन इकाइयों में से 55 ने पास किया TAS-1 इन चार जिलों में कुल 57 कार्यान्वयन इकाइयों का TAS-1 के तहत मूल्यांकन किया गया। इनमें से 55 कार्यान्वयन इकाइयों ने निर्धारित मानकों के अनुसार सर्वेक्षण सफलतापूर्वक पास कर लिया।
अररिया, मधेपुरा और सुपौल की सभी कार्यान्वयन इकाइयां TAS-1 में सफल रहीं। इसका सीधा परिणाम यह हुआ कि इन तीन जिलों में MDA अभियान को बंद करने और पोस्ट-MDA सर्विलांस के अगले चरण में जाने की अनुमति मिल गई। वहीं किशनगंज की दो कार्यान्वयन इकाइयां निर्धारित सीमा से मामूली अंतर से पीछे रह गईं। इसका मतलब यह है कि इन क्षेत्रों में फाइलेरियासिस संक्रमण को लेकर अतिरिक्त निगरानी और आवश्यक कार्यक्रम संबंधी कार्रवाई की जरूरत बनी हुई है।
दवा बांटने से आगे बढ़कर वास्तविक सेवन पर जोर
बिहार की इस सफलता के पीछे पिछले कई वर्षों में कार्यक्रम के क्रियान्वयन की गुणवत्ता में किए गए सुधारों की बड़ी भूमिका रही है। इन सुधारों में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव Directly Observed Treatment यानी DOT पर विशेष जोर देना रहा। इस व्यवस्था में स्वास्थ्यकर्मी केवल लोगों तक दवाएं पहुंचाने या बांटने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि यह सुनिश्चित करते हैं कि लाभार्थी प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी की मौजूदगी में दवा का सेवन भी करे। फाइलेरियासिस उन्मूलन कार्यक्रमों के सामने लंबे समय से एक महत्वपूर्ण चुनौती यह रही है कि दवाओं के वितरण के आंकड़े हमेशा वास्तविक दवा सेवन को नहीं दर्शाते। किसी परिवार तक दवा पहुंच जाना और उस परिवार के सदस्य का वास्तव में दवा खाना दो अलग-अलग बातें हैं। बिहार ने इसी अंतर को कम करने के लिए दवा वितरण के साथ वास्तविक सेवन की निगरानी पर जोर दिया। इससे अभियान की प्रभावशीलता बढ़ी और दवा सेवन का कवरेज लगातार बेहतर हुआ।
फ्रंटलाइन स्वास्थ्यकर्मियों ने परिवारों के साथ बढ़ाया संवाद
MDA के दौरान फ्रंटलाइन स्वास्थ्यकर्मियों ने परिवारों के साथ अधिक समय बिताया। उन्होंने लोगों के सवालों के जवाब दिए, दवाओं से जुड़े भ्रम और गलतफहमियों को दूर किया तथा लोगों को निर्धारित दवाएं लेने के लिए प्रोत्साहित किया। फील्ड स्तर पर निगरानी व्यवस्था को मजबूत किया गया और वास्तविक समय में मिलने वाली जानकारी का इस्तेमाल अभियान के दौरान ही कमियों को पहचानने और सुधारने के लिए किया गया। इस रणनीति से उपचार कवरेज में लगातार सुधार हुआ और अंततः फाइलेरियासिस संक्रमण में मापने योग्य कमी दर्ज की गई। अररिया के जिला वेक्टर जनित रोग पदाधिकारी ने इस उपलब्धि को कार्यक्रम की गुणवत्ता से जोड़ते हुए कहा कि वर्षों के लगातार प्रयास के बाद यह सफलता मिली है। टीमों ने केवल दवाओं का वितरण सुनिश्चित नहीं किया, बल्कि लोगों द्वारा दवाओं के वास्तविक सेवन पर भी ध्यान दिया और अब उसके परिणाम दिखाई दे रहे हैं।
समुदाय का भरोसा बना अभियान की बड़ी ताकत
फाइलेरियासिस उन्मूलन अभियान में केवल दवाओं और स्वास्थ्य व्यवस्था की भूमिका नहीं होती। लोगों की भागीदारी और भरोसा भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
बिहार में स्वास्थ्यकर्मियों ने लोगों के बीच जाकर दवाओं के लाभ समझाए, संभावित दुष्प्रभावों को लेकर मौजूद आशंकाओं को दूर किया और सामूहिक दवा सेवन कार्यक्रम के प्रति विश्वास पैदा किया। पहले कई इलाकों में दवाओं को लेकर लोगों में झिझक और भ्रम देखने को मिलता था। इसके कारण MDA अभियानों में वास्तविक भागीदारी प्रभावित होती थी। लेकिन लगातार संवाद और जागरूकता के कारण इस बार लोगों की भागीदारी और भरोसा बढ़ा। स्कूल आधारित परीक्षण के दौरान अपने बच्चे के साथ शामिल एक अभिभावक ने बताया कि पहले लोग दवाओं को लेकर आश्वस्त नहीं थे। इस बार स्वास्थ्यकर्मियों ने परिवारों के साथ रहकर पूरी जानकारी दी और दवाओं के महत्व को समझाया। इससे लोगों में यह उम्मीद बढ़ी कि उनके बच्चों को भविष्य में इस बीमारी से सुरक्षित रखा जा सकता है।
कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर्स ने मजबूत की जांच व्यवस्था
बिहार की TAS-1 सफलता राज्य के फ्रंटलाइन स्वास्थ्यकर्मियों की बढ़ती क्षमता को भी दर्शाती है। TAS के दौरान कुछ ऐसे क्षेत्रों में जहां प्रयोगशाला से जुड़े प्रशिक्षित कर्मचारियों की उपलब्धता सीमित थी, वहां प्रशिक्षित Community Health Officers यानी CHOs ने लिम्फैटिक फाइलेरियासिस की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रशिक्षित CHOs ने LF एंटीजन टेस्टिंग को उच्च सटीकता के साथ किया और बहुत कम संख्या में अमान्य परिणाम सामने आए। TAS जैसे सर्वेक्षणों में जांच की गुणवत्ता बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इसी आधार पर किसी क्षेत्र में संक्रमण की स्थिति का आकलन किया जाता है। इस अनुभव ने यह भी दिखाया कि यदि फ्रंटलाइन स्वास्थ्यकर्मियों को उचित प्रशिक्षण और जिम्मेदारी दी जाए तो वे राज्य की बीमारी निगरानी प्रणाली को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
WHO ने तकनीकी सहयोग दिया
बिहार के फाइलेरियासिस उन्मूलन कार्यक्रम को विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO ने लगातार तकनीकी सहयोग प्रदान किया। यह सहयोग बिहार सरकार और National Centre for Vector Borne Diseases Control यानी NCVBDC के नेतृत्व में चलाए जा रहे कार्यक्रम के साथ किया गया। MDA अभियानों के दौरान WHO ने राज्य और जिला स्तर की टीमों को माइक्रोप्लानिंग, प्रशिक्षण, स्वतंत्र निगरानी तथा फील्ड से मिले निष्कर्षों के आधार पर सुधारात्मक कदम उठाने में सहयोग दिया। TAS के दौरान भी WHO की भूमिका महत्वपूर्ण रही। संगठन ने सर्वेक्षण की योजना बनाने, गुणवत्ता सुनिश्चित करने, प्रयोगशाला कर्मियों और Community Health Officers को प्रशिक्षण देने तथा सभी मूल्यांकन इकाइयों में मॉनिटरिंग टीमों की तैनाती में तकनीकी और पर्यवेक्षण संबंधी सहायता प्रदान की। फील्ड मॉनिटरिंग के दौरान राज्य और जिला स्वास्थ्य अधिकारियों ने NCVBDC के मार्गदर्शन में TAS-1 की निगरानी की। WHO की टीमों ने भी तकनीकी और सुपरवाइजरी सहयोग दिया ताकि सर्वेक्षण की गुणवत्ता और रिपोर्टिंग के मानकों को मजबूत रखा जा सके।
सफलता के बाद भी निगरानी जरूरी
TAS-1 में सफलता मिलने के बाद MDA बंद करने का रास्ता खुलता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि फाइलेरियासिस के खिलाफ निगरानी पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। पोस्ट-MDA सर्विलांस के दौरान यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संक्रमण दोबारा न बढ़े। लगातार निगरानी के जरिए संभावित नए संक्रमणों की पहचान और आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी।
बिहार की उपलब्धि यह बताती है कि लंबे समय से किसी क्षेत्र में मौजूद सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती को भी लगातार प्रयास, मजबूत कार्यक्रम प्रबंधन, प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों, बेहतर निगरानी और समुदाय के भरोसे के जरिए नियंत्रित किया जा सकता है। इस सफलता में केवल दवा उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं था। दवा का वास्तविक सेवन सुनिश्चित करना, लोगों की आशंकाओं को दूर करना, स्वास्थ्यकर्मियों को प्रशिक्षित करना, फील्ड मॉनिटरिंग मजबूत करना और सर्वेक्षण की गुणवत्ता बनाए रखना इस पूरी प्रक्रिया के महत्वपूर्ण हिस्से रहे। हर सफल जिला एक बड़ी आबादी को भविष्य के संक्रमण से बचाने की दिशा में आगे बढ़ता है। फाइलेरियासिस ऐसी बीमारी है जो गंभीर मामलों में जीवनभर विकलांगता का कारण बन सकती है। बीमारी का उन्मूलन होने से परिवारों पर इलाज का आर्थिक बोझ कम हो सकता है, कामकाजी दिनों के नुकसान में कमी आ सकती है और बीमारी से जुड़े सामाजिक कलंक और बहिष्कार को भी कम किया जा सकता है।
बिहार की TAS-1 सफलता इसलिए एक जिले या चार जिलों की उपलब्धि भर नहीं है। यह भारत के वर्ष 2027 तक लिम्फैटिक फाइलेरियासिस को सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में खत्म करने के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आगे की चुनौती यह सुनिश्चित करना होगी कि TAS में हासिल की गई सफलता लंबे समय तक कायम रहे। इसके लिए पोस्ट-MDA सर्विलांस, मजबूत निगरानी, समुदाय की भागीदारी और स्वास्थ्यकर्मियों की निरंतर क्षमता निर्माण को बनाए रखना होगा। बिहार का अनुभव यह संदेश देता है कि पीढ़ियों से चली आ रही किसी बीमारी के खिलाफ लड़ाई में निरंतरता और कार्यक्रम की गुणवत्ता निर्णायक भूमिका निभा सकती है। आज फाइलेरियासिस उन्मूलन की दिशा में आगे बढ़ता हर जिला उन बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में एक कदम है, जिन्हें यह बीमारी जीवनभर की विकलांगता से बचा सकती है। साथ ही यह उन परिवारों को आर्थिक और सामाजिक राहत देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है, जो वर्षों से इस बीमारी के बोझ का सामना करते आए हैं।
