health
महाराष्ट्र का नया हेल्थकेयर बिल: रेट डिस्प्ले अनिवार्य, लेकिन इलाज की कीमतों पर नियंत्रण नहीं
महाराष्ट्र में मरीजों के अधिकार और अस्पतालों की जवाबदेही को मजबूत करने के लिए सरकार नया हेल्थकेयर बिल लेकर आई है। महाराष्ट्र क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) बिल, 2026 में अस्पतालों की फीस को पारदर्शी बनाने, मरीजों को आइटमाइज्ड बिल देने और इमरजेंसी में बिना एडवांस जमा किए इलाज शुरू करने जैसे कई अहम प्रावधान किए गए हैं। हालांकि, स्वास्थ्य अधिकार समूहों का कहना है कि बिल कीमतें दिखाने की व्यवस्था तो करता है, लेकिन अस्पतालों द्वारा वसूले जाने वाले शुल्क की अधिकतम सीमा तय नहीं करता।

मुंबई: महाराष्ट्र सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से महाराष्ट्र क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) बिल, 2026 विधानसभा में पेश किया है। यह प्रस्तावित कानून राज्य में लागू करीब 77 साल पुराने महाराष्ट्र नर्सिंग होम्स रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1949 की जगह लेने के लिए लाया गया है। बिल में अस्पतालों और अन्य स्वास्थ्य संस्थानों का अनिवार्य पंजीकरण, न्यूनतम मानक और मरीजों के अधिकारों को मजबूत करने जैसे प्रावधान किए गए हैं। हालांकि, स्वास्थ्य अधिकार समूहों ने बिल को लेकर एक अहम सवाल उठाया है। उनके मुताबिक प्रस्तावित कानून अस्पतालों की फीस को पारदर्शी तो बनाता है, लेकिन इलाज और अस्पताल सेवाओं के लिए अधिकतम या मानकीकृत दर तय नहीं करता। यानी मरीज को यह जानकारी मिल सकेगी कि अस्पताल किसी सेवा के लिए कितना शुल्क ले रहा है, लेकिन उस शुल्क की अधिकतम सीमा कानून में निर्धारित नहीं की गई है।
प्रस्तावित बिल का दायरा केवल अस्पतालों तक सीमित नहीं रहेगा। इसके तहत अस्पताल, नर्सिंग होम, मैटरनिटी होम, क्लीनिक, प्रयोगशालाएं और डायग्नोस्टिक सेंटर शामिल होंगे। इसके अलावा एक्स-रे, अल्ट्रासोनोग्राफी, CT स्कैन, MRI और PET स्कैन जैसी डायग्नोस्टिक सेवाएं भी इसके दायरे में आएंगी। बिल में एलोपैथी के साथ-साथ आयुर्वेद, होम्योपैथी, सिद्ध और यूनानी जैसी मान्यता प्राप्त चिकित्सा प्रणालियों के तहत सेवाएं देने वाले संस्थानों को भी शामिल किया गया है। बिल में Patient Rights Charter का प्रावधान किया गया है। इसके तहत मरीज को अपनी बीमारी, जांच, प्रस्तावित इलाज और अनुमानित खर्च के बारे में जानकारी पाने का अधिकार होगा। मरीज अपने मेडिकल रिकॉर्ड और केस पेपर की कॉपी भी प्राप्त कर सकेगा। इसके अलावा किसी जांच या प्रक्रिया से पहले सूचित सहमति (Informed Consent) देने या मना करने का अधिकार होगा और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ डॉक्टर से दूसरी राय यानी Second Opinion लेने का अधिकार भी दिया गया है।
मरीज की निजता, गोपनीयता, गरिमा और बिना भेदभाव के इलाज का अधिकार भी बिल में शामिल है।
तीन भाषाओं में दिखानी होगी कीमत
प्रस्तावित कानून की एक महत्वपूर्ण विशेषता रेट डिस्प्ले है। क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स को अपनी सेवाओं की दरें मराठी, हिंदी और अंग्रेजी में प्रदर्शित करनी होंगी। इन दरों को ऑनलाइन भी उपलब्ध कराने का प्रावधान है। इसके साथ मरीज को आइटमाइज्ड बिल यानी इलाज के दौरान ली गई अलग-अलग सेवाओं और शुल्क का विस्तृत बिल देना होगा। अस्पताल प्रदर्शित दर से अधिक शुल्क नहीं ले सकेगा। यही इस बिल को लेकर सबसे बड़ा सवाल है। बिल में अस्पतालों को अपनी दरें सार्वजनिक करने और उसी के अनुसार बिल देने की व्यवस्था है, लेकिन सरकार द्वारा अस्पताल सेवाओं के लिए अधिकतम या मानकीकृत शुल्क निर्धारित करने का स्पष्ट प्रावधान नहीं है। स्वास्थ्य अधिकार समूहों का कहना है कि केवल रेट प्रदर्शित करने से इलाज सस्ता या किफायती होना सुनिश्चित नहीं होता। उनका तर्क है कि मरीज को कीमत की जानकारी मिलने के साथ-साथ यह सुरक्षा भी मिलनी चाहिए कि अस्पताल किसी सेवा के लिए मनमाना या अत्यधिक शुल्क न वसूल सके।
इमरजेंसी मरीजों के लिए राहत
बिल में आपात स्थिति वाले मरीजों के लिए भी महत्वपूर्ण प्रावधान प्रस्तावित हैं। अस्पतालों को ऐसे मरीजों को स्थिर करने और जरूरी बेसिक लाइफ सपोर्ट देने की व्यवस्था करनी होगी, भले ही मरीज तत्काल भुगतान करने की स्थिति में न हो। जरूरत पड़ने पर मरीज को दूसरे अस्पताल में भेजने से पहले Golden Hour Protocol का पालन करने का भी प्रावधान है। प्रस्तावित कानून के तहत क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया जाएगा। इसके लिए अस्थायी और स्थायी पंजीकरण की व्यवस्था होगी। स्थायी पंजीकरण की वैधता पांच साल होगी। इसके लिए संस्थान को निर्धारित इंफ्रास्ट्रक्चर, सेवाओं, कर्मचारियों, रिकॉर्ड और रिपोर्टिंग से जुड़े मानकों का पालन करना होगा।
प्राधिकरण को संस्थानों का निरीक्षण करने और नियमों का उल्लंघन होने पर कार्रवाई करने की शक्तियां भी दी जाएंगी।
स्वास्थ्य अधिकार समूहों ने किन प्रावधानों पर सवाल उठाए?
जन आरोग्य अभियान (JAA) समेत स्वास्थ्य अधिकार समूहों ने कहा है कि प्रस्तावित बिल में 2021 के नियमों के तहत मौजूद कुछ मरीज सुरक्षा प्रावधान शामिल नहीं हैं। समूहों ने खास तौर पर अस्पताल द्वारा बकाया बिल के कारण मरीज को रोकने या मृत व्यक्ति का शव रोकने से संबंधित सुरक्षा, महिला मरीज की जांच के दौरान महिला अटेंडेंट की सुविधा, HIV से पीड़ित लोगों के लिए स्पष्ट सुरक्षा और डॉक्टरों की योग्यता एवं रजिस्ट्रेशन नंबर प्रदर्शित करने जैसे प्रावधानों की अनुपस्थिति पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने यह भी कहा है कि मरीजों को उचित डिस्चार्ज समरी देने और अपनी पसंद के प्रदाता से दवा या डायग्नोस्टिक टेस्ट लेने के अधिकार जैसे मुद्दों को भी स्पष्ट रूप से शामिल किया जाना चाहिए। स्वास्थ्य अधिकार समूहों की एक बड़ी चिंता ग्रिवांस रिड्रेसल सिस्टम को लेकर है। उनके अनुसार 2021 के नियमों में जिला और शहर स्तर पर शिकायत सेल तथा टोल-फ्री व्यवस्था का प्रावधान था। भर्ती मरीजों की शिकायतों को जल्द सुनने की व्यवस्था भी थी। आलोचकों का कहना है कि नए बिल में इसी तरह की स्पष्ट जिला-स्तरीय शिकायत निवारण व्यवस्था नहीं दिखाई देती। वे मरीजों, महिलाओं के संगठनों, नर्सों, डॉक्टरों और सिविल सोसायटी की भागीदारी वाली जिला स्तरीय समितियों की मांग कर रहे हैं।
फिलहाल बिल Joint Legislative Committee (JPC) के पास है, जहां हितधारकों की आपत्तियों और सुझावों पर विचार किया जा रहा है। समिति बिल में बदलाव की सिफारिश कर सकती है। इसके बाद इसे राज्य विधानमंडल के आगामी शीतकालीन सत्र में आगे बढ़ाए जाने की संभावना है। महाराष्ट्र का प्रस्तावित Clinical Establishments Bill स्वास्थ्य क्षेत्र को एक समान नियामक ढांचे में लाने की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है। रेट डिस्प्ले, आइटमाइज्ड बिल, मेडिकल रिकॉर्ड तक पहुंच, सूचित सहमति और इमरजेंसी इलाज जैसे प्रावधान मरीजों के अधिकारों को मजबूत कर सकते हैं। लेकिन स्वास्थ्य अधिकार समूहों की आपत्तियां बताती हैं कि पारदर्शिता और कीमतों पर नियंत्रण दो अलग-अलग चीजें हैं। जब तक अस्पतालों की सेवाओं के लिए मानकीकृत या अधिकतम दरों और प्रभावी शिकायत निवारण की स्पष्ट व्यवस्था नहीं होती, तब तक मरीजों पर इलाज के बढ़ते खर्च का सवाल पूरी तरह हल नहीं होगा।
