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होम्योपैथी डॉक्टरों को मॉडर्न मेडिसिन की अनुमति का विरोध: एमबीबीएस (MBBS) डॉक्टरों ने जताई कड़ी आपत्ति l

महाराष्ट्र सरकार द्वारा होम्योपैथी (BHMS) डॉक्टरों को निर्धारित प्रशिक्षण के बाद आधुनिक चिकित्सा के कुछ हिस्सों का अभ्यास करने की अनुमति देने के फैसले के खिलाफ राज्यभर के एलोपैथिक डॉक्टरों का विरोध तेज हो गया है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) और अन्य चिकित्सक संगठनों का कहना है कि यह निर्णय मरीजों की सुरक्षा और चिकित्सा व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। वहीं सरकार का दावा है कि यह कदम ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी दूर करने और लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से उठाया गया है।

Kashish Rai07 अग. 2026, 05:32 PM IST
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होम्योपैथी डॉक्टरों को मॉडर्न मेडिसिन की अनुमति का विरोध: एमबीबीएस (MBBS) डॉक्टरों ने जताई कड़ी आपत्ति l

महाराष्ट्र में स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विवाद इन दिनों चर्चा का केंद्र बना हुआ है। राज्य सरकार द्वारा होम्योपैथी डॉक्टरों को विशेष प्रशिक्षण के बाद आधुनिक चिकित्सा के कुछ पहलुओं में कार्य करने की अनुमति देने के निर्णय ने एलोपैथिक डॉक्टरों के बीच असंतोष पैदा कर दिया है। इसी फैसले के विरोध में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) सहित कई डॉक्टर संगठनों ने राज्यभर में प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं और सरकार से इस निर्णय को तत्काल वापस लेने की मांग की है।


चिकित्सकों का कहना है कि आधुनिक चिकित्सा केवल दवाइयां लिखने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे वर्षों का अध्ययन, क्लीनिकल प्रशिक्षण और अस्पतालों में व्यावहारिक अनुभव शामिल होता है। उनका मानना है कि किसी अन्य चिकित्सा पद्धति से जुड़े डॉक्टरों को सीमित प्रशिक्षण देकर आधुनिक चिकित्सा का अधिकार देना चिकित्सा शिक्षा के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। इससे इलाज की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है और मरीजों की जान जोखिम में पड़ सकती है।


डॉक्टर संगठनों का यह भी आरोप है कि सरकार डॉक्टरों की वास्तविक कमी को दूर करने के बजाय आसान रास्ता अपनाने की कोशिश कर रही है। उनका कहना है कि यदि ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी है तो सरकार को सरकारी अस्पतालों में रिक्त पद भरने, नए मेडिकल कॉलेज शुरू करने और विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। इससे स्वास्थ्य सेवाओं में स्थायी सुधार होगा।

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन का कहना है कि चिकित्सा की प्रत्येक पद्धति—एलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेद या यूनानी—की अपनी अलग शिक्षा, सिद्धांत और उपचार प्रणाली है। इन्हें आपस में मिलाने से भ्रम की स्थिति पैदा होगी और मरीजों के उपचार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। संगठन ने इसे "मिक्सोपैथी" का मामला बताते हुए सरकार से स्पष्ट नीति और नियम बनाने की मांग की है।


दूसरी ओर, महाराष्ट्र सरकार का कहना है कि राज्य के अनेक ग्रामीण, आदिवासी और दुर्गम इलाकों में योग्य डॉक्टरों की भारी कमी है। इन क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में लगातार कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार का तर्क है कि विशेष प्रशिक्षण प्राप्त होम्योपैथी डॉक्टर सीमित दायरे में आधुनिक चिकित्सा की कुछ सेवाएं देकर इस कमी को काफी हद तक दूर कर सकते हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि बिना प्रशिक्षण के किसी भी डॉक्टर को आधुनिक चिकित्सा का अधिकार नहीं दिया जाएगा। हालांकि इस स्पष्टीकरण के बावजूद डॉक्टर संगठनों का विरोध थमता नजर नहीं आ रहा है। विभिन्न जिलों में चिकित्सकों ने प्रदर्शन, धरना और सांकेतिक कार्य बहिष्कार जैसे कदम उठाए हैं। उनका कहना है कि जब तक सरकार इस फैसले पर पुनर्विचार नहीं करती और चिकित्सा विशेषज्ञों के साथ विस्तृत चर्चा नहीं करती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।


स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल डॉक्टरों और सरकार के बीच का नहीं है, बल्कि यह मरीजों की सुरक्षा, चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता और देश की स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा गंभीर विषय है। यदि सरकार और डॉक्टर संगठनों के बीच जल्द सहमति नहीं बनती है, तो इसका असर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और मरीजों पर भी पड़ सकता है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सरकार की अगली रणनीति और डॉक्टरों के आंदोलन की दिशा पूरे राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण साबित होगी।